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विदा हुए….जनरल

अपमान और उपेक्षा के बाद ऐलान
कभी बीजेपी के ब्रांड थे, आज बोझ

चेतन गुरुंग

देहरादून। आज से ढाई दशक पहले की बात है। तब सेना से मेजर जनरल के रैंक से रिटायर होने के बाद बीजेपी ज्वाइन कर चुके और फिर लोकसभा चुनाव में पहली ही जंग जीत कर देहरादून आए भुवन चन्द्र खंडूड़ी का लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में पार्टी के लोगों ने भारी उत्साह के साथ स्वागत किया था। उनमें लोग महानायक देख रहे थे। ऐसे महानायक जो देश में राजनीति और सिस्टम को बदलने का दम रखते हों। जब वह पहली बार केंद्र में मंत्री बने और फिर जब उत्तराखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी पहली बार संभाली, तब भी लोगों में वैसा ही उत्साह और खुशी उनको लेकर थी जो पहली बार देखने को मिली थी। फिर मोदी-अमित शाह दौर आया बीजेपी में। इसके साथ ही खंडूड़ी का दौर ही नहीं गया बल्कि लगा जो सम्मान और प्रतिष्ठा जीवन भर कमाई वह मायने नहीं रखती है। शाह के देहरादून दौरे में उनको कुर्सी तक नहीं मिली और मोदी के केदारनाथ दौरे में शिलापट्ट पर नाम तो दूर निमंत्रित तक नहीं किया गया, जबकि वह स्थानीय सांसद हैं। इसके बाद यह साफ हो गया कि सेना के पूर्व आला अफसर अब सियासत में भी अपनी पारी खेल चुके हैं। पार्टी के बुजुर्गतम नेताओं में शुमार खंडूड़ी ने जब यह ऐलान किया कि अब वह पौड़ी से कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे तो किसी को इस पर अचम्भा नहीं हुआ। पार्टी के नेताओं के साथ ही मीडिया को इसका अहसास था कि अगला चुनाव वह शायद ही लड़ पायेंगे। पार्टी उनको इस उम्र में टिकट शायद ही देगी। खंडूड़ी के पास बतौर सांसद अभी डेढ़ साल हैं लेकिन अब उनको पार्टी में गंभीरता से कोई नहीं लेता है। अलबत्ता, इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि खंडूड़ी के बाद अगला नंबर जल्द ही भगत सिंह कोश्यारी का आ सकता है, जो 75 वें साल में चल रहे हैं, हालांकि, उनकी फिटनेस बहुत अच्छी है।
जब से पार्टी की लगाम मोदी और शाह के हाथों में आई है, तब से पार्टी में पुराने और दमदार रहे लोगों को तेजी से किनारे लगाने का दौर चल रहा है। इसके लिए पहले तो 75 साल की उम्र को मानक बनाया गया, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठों को ठिकाने लगाने और पार्टी को पूरी तरह अपने हिसाब से चलाने के लिए अपनाया गया। भले बाद में शाह ने कहा कि ऐसा कोई मानक नहीं है लेकिन जब तक उनका यह बयान आया तब तक सब दिग्गज खुद ही या जबरन ठिकाने लगाए जा चुके थे। इसकी चपेट में खंडूड़ी भी आए। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण कर देश भर में लोकप्रिय हुए खंडूड़ी को मोदी मंत्रिमंडल के लिए शुरू में स्वाभाविक पसंद माना जा रहा था। भला इतने वरिष्ठ और छवि के मामले में खुद से बेहतर खंडूड़ी को मोदी क्यों रखते। सो उनको एकदम किनारे कर उत्तराखंड कोटे से अजय टम्टा को मंत्रिपरिषद में जगह दी गई। टम्टा सरल और सामान्य किस्म के राज्यमंत्री हैं। उनको युवा और अनुसूचित जाति का होने का बता कर खंडूड़ी और उनके साथ ही राज्य के एक और लोकप्रिय नेता पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को भी दरकिनार कर दिया गया।
कोश्यारी को भी खंडूड़ी की तरह संकेत दिए जा रहे हैं कि आपकी पारी अब बस। भले वह न समझ रहे हों या फिर इस उम्मीद में जी रहे हों कि उनका दौर आएगा और मोदी-शाह युग का कभी तो अंत होगा। खंडूड़ी के साथ जो हो रहा है वह ज्यादा दर्दनाक कहा जा सकता है। जिस खंडूड़ी के सामने उनके केंद्र में मंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री (दो बार) रहते मंत्री और पार्टी के नेता तरीके से खड़े तक नहीं हो पाते थे और थर-थर कांपते थे, वे उनको सीट तक नहीं देंगे, यह किसी ने सोचा तक नहीं होगा। जो शाह बात-बात पर पार्टी के नेताओं तो दूर मंत्रियों तक को डपट डालते हैं, उनकी बैठक में उनके ही सामने खंडूड़ी को कोई सीट नहीं दे रहा था और वह खामोशी के साथ देख रहे थे। यह संकेत था कि खंडूड़ी का युग खत्म हो चुका है। खंडूड़ी शायद इस दु:ख के चलते ही शाह की अगली रात को हुई बैठक में आए ही नहीं। कोश्यारी भी इस बैठक में नहीं पहुंचे। दोनों दिग्गजों का इस पार्टी में न पहुंचना क्या यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि उनको अपने भविष्य का अहसास साफ हो चुका है। जब कुछ मिलना ही नहीं तो क्यों शाह से डरना। इन दोनों नेताओं के बगैर कुछ अरसा पहले तक उत्तराखंड की सियासत के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता था। खंडूड़ी के नाम पर तो 2012 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव तक लड़ा था। दोनों का सियासी पराभव तेजी से नीचे होने का एक और उदहारण जल्द ही मोदी के केदारनाथ दौरे में मिला। केंद्र का कोई बड़ा नेता या अपनी सरकार का प्रधानमंत्री उत्तराखंड आए और उनकी मौजूदगी न हो, ऐसा पहले लोग सोच तक नहीं सकते थे, पर मोदी के दौरे में दोनों नदारद थे। खंडूड़ी का दर्द इसलिए ज्यादा कहा जा सकता है या चौंकाता है कि वह तो पौड़ी के सांसद हैं और यह धाम उनके ही क्षेत्र में है। सरकारी प्रोटोकॉल में भी उनका उपस्थित होना अनिवार्य था। इसके बावजूद सरकार और पार्टी ने उनको निमंत्रित तक करना उचित नहीं समझा। यह सीधा-सीधा उनका अपमान था।
खंडूड़ी ने इसके बाद ही यह ऐलान किया कि वह अब कोई चुनाव नहीं लडेंग़े, लेकिन हकीकत यह भी है कि उनको अगले चुनाव में लोकसभा का टिकट मिलेगा, इसी में शक है। भले पार्टी ने अभी कोई मानक टिकट देने का नहीं बनाया है, लेकिन समझा जा रहा है कि पार्टी उनका विकल्प सोच चुकी है। उनकी जगह तब तक रिटायर हो चुकने वाले मौजूदा सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत को पार्टी अपना उम्मीदवार बना सकती है। बिपिन जब भी देहरादून या उत्तराखंड आते हैं तो सेना प्रमुख होने के बावजूद बीजेपी के नेताओं से मिलने में हर्ज नहीं समझते हैं। खंडूड़ी के दूसरे विकल्प के तौर पर राष्ट्रीय पर्वतारोहण संस्थान, उत्तरकाशी के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल को भी देखा जा रहा है। जिस तरह कोठियाल भगवा रंग में दिख रहे हैं, उसको देखते हुए ताज्जुब की बात नहीं कि वह लोक सभा चुनाव से पहले सेना से रिटायरमेंट ले कर चुनाव में उतर जाए। हालांकि, यह सब सिर्फ कयास भर हैं। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि सैनिक और अर्ध सैनिक बाहुल्य वाले उत्तराखंड में बीजेपी के पास सैन्य पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार की कमी नहीं रहने वाली है। इसको देख कर ही पार्टी नेतृत्व को वयोवृद्ध खंडूड़ी की उपेक्षा करने की हिम्मत हो गई। ऐसे में खंडूड़ी ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कहने का फैसला किया है तो इसको उनके दर्द, उपेक्षा और अपमान को और सहन न करने के दृढ़ निश्चय के तौर पर देखा जा रहा है। जिस खंडूड़ी ने प्रदेश को देश में नाम दिया और एक सकारात्मक छवि बनाई, उनका इस तरह सियासत से जाना अलबत्ता, किसी के गले नहीं उतर रहा है। वह निश्चित रूप से अच्छे विदाई के हकदार हैं। बेहतर होता अगर वह केंद्र में मंत्री बनाए जाते और फिर वह ऐलान करते कि बस, अब वह चुनाव नहीं लडेंग़े। उन्होंने अपनी विदाई का ऐलान खुशी-खुशी नहीं किया है। यह भारी मन से और रुंधे गले से किया गया ऐलान है।

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