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बदले राहुल ने उड़ायी सबकी नींद

कुछ समय पहले तक इस सोच को हास्यास्पद माना जाता था कि मोदी के लिए राहुल गांधी चुनौती बन सकते हैं। इतना ही नहीं यह भी मजाक बनाया जाता था कि अगर चुनाव प्रचार में राहुल गांधी उतरे तो बीजेपी की जीत पक्की हैं लेकिन इन दिनों माहौल बदल गया है। यह सौ फीसदी सच  है कि राहुल भले ही पूरी तरह से मोदी के लिए चुनौती नहीं बन पाए हैं लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल धीरे-धीरे चुनौती बनने की दिशा में अग्रसर हैं। राहुल अब गंभीर राजनीति की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं। राजनीति के परिपक्व खिलाड़ी बने राहुल को पता है कि उन्हें कब और कितना बोलना हैं। इस बदले माहौल को राहुल चुनावी जीत में कितना तब्दील कर पायेंगे यह तो भविष्य बतायेगा लेकिन आज की तारीख में राहुल के पास खोने को बहुत कम हैं और हासिल करने को बहुत ज्यादा, जबकि मोदी का मामला ठीक इसके उलट हैं। छ समय पहले तक इस सोच को हास्यास्पद माना जाता था कि मोदी के लिए राहुल गांधी चुनौती बन सकते हैं। इतना ही नहीं यह भी मजाक बनाया जाता था कि अगर चुनाव प्रचार में राहुल गांधी उतरे तो बीजेपी की जीत पक्की हैं लेकिन इन दिनों माहौल बदल गया है। यह सौ फीसदी सच  है कि राहुल भले ही पूरी तरह से मोदी के लिए चुनौती नहीं बन पाए हैं लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल धीरे-धीरे चुनौती बनने की दिशा में अग्रसर हैं। राहुल अब गंभीर राजनीति की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं। राजनीति के परिपक्व खिलाड़ी बने राहुल को पता है कि उन्हें कब और कितना बोलना हैं। इस बदले माहौल को राहुल चुनावी जीत में कितना तब्दील कर पायेंगे यह तो भविष्य बतायेगा लेकिन आज की तारीख में राहुल के पास खोने को बहुत कम हैं और हासिल करने को बहुत ज्यादा, जबकि मोदी का मामला ठीक इसके उलट हैं। 

गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी का अलग रूप दिखा। परिपक्व, आक्रामक राहुल जब जनता से रूबरू हुए तो राजनैतिक पंडितों के साथ-साथ भाजपा के दिग्गज भी हैरान हुए। राहुल गांधी को अनेक उपमाओं से विराजने वाली भाजपा उनके आक्रामक तेवर से चिंतित दिखी। दो महीने पहले तक राहुल को कोई गंभीरता से नहीं लेता था, उनकी पार्टी के लोग भी नहीं। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। पार्टी कार्यकर्ता भी राहुल की परिपक्वता और आक्रामकता देख उत्साह से भरे हुए हैं। जिस तरह से वे बेहतर भाषण दे रहे हैं, सधे शब्दों में सवालों के जवाब दे रहे हैं उससे कांग्रेस खेमे के साथ-साथ विपक्षी दलों में भी उनकी चर्चा शुरु हो गई है। गुजरात चुनाव में राहुल पूरी तैयारी के साथ उतरे हैं। अब वह जान गए हैं कि विपक्ष को चित करने के लिए उन्हीं के हथियार का इस्तेमाल करना होगा। शायद इसीलिए उनकी पीआर और सोशल मीडिया टीम जुट गई है। पिछले दिनों राहुल के बारे में कई खुलासे हुए,  मसलन निर्भया के परिवार की मदद और खेल के प्रति उनकी रूचि। उनकी टीम सोशल मीडिया पर पूरी तरह से सक्रिय हो गई है कि राहुल की इमेज को कैसे दुरुस्त किया जाए, इसका असर भी दिख रहा है। अब तो मीडिया में भी मोदी वर्सेज राहुल की बात चलने लगी है। पिछले दिनों सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती पर एक तस्वीर सामने आयी थी जिसमें आक्रामक मुद्रा में राहुल प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़े हैं। वह तस्वीर खूब वायरल हुई। सभी ने अपने-अपने सियासी अर्थ तलाशे लेकिन इस बहाने राहुल चर्चा में खूब रहे।  अब राहुल शायद समझने लगे हैं कि इवेंट मैनेजमेंट, प्रचार तंत्र, नाटकीय भाषण और बीजेपी-आरएसएस संगठन के मुकाबले मोदी के सामने उनका टिकना कठिन है, वह यह भी जानते हैं कि मोदी मौजूदा चुनौतियों से उबरने में सक्षम हैं। यही वजह है कि वह धीरे-धीरे अपनी एक अलग कहानी गढऩे में लगे हैं। अभी जो हालात है वह राहुल के लिए करो या मरो वाली भी है। सुषुप्तावस्था में पड़ी कांग्रेस में जान फूंकने की जिम्मेदारी राहुल की है। केंद्र से लेकर राज्यों में कांग्रेस की क्या स्थिति है इससे राहुल अंजान नहीं हैं। उन्हें अच्छे से पता है कि यदि अभी नहीं तो कभी नहीं। 47 साल के राहुल करीब डेढ़ दशक से राजनीति में है। सांसद से राजनीति में अपनी पारी की शुुरुआत करने वाले राहुल न तो कभी मुख्यमंत्री बने और न ही मंत्री। शायद इसीलिए उनकी प्रधानमंत्री की दावेदारी को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब हालात बदल रहे हैं। राहुल अपनी शहजादे की छवि मिटाने के लिए जी-जान से जुटे हैं। काफी हद तक इसमें सफलता भी मिली है। गुजरात में ऐसा देखने को मिल रहा है। अब उनके भाषणों में अपने पूर्वजों का जिक्र नहीं होता, वह भाजपा की आक्रामकता और चुभते कटाक्षों का जवाब देने के लिए नई भाषा गढ़ रहे हैं। जनता भी इसे पंसद कर रही है। शायद इसीलिए भाजपा की चिंता बढ़ गई है। गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट है तो राहुल के लिए भी है। मोदी को अपनी प्रतिष्ठïा बचानी है तो राहुल को अपनी प्रतिष्ठïा बनानी है। गुजरात की सत्ता में 15 साल से बीजेपी है। केन्द्र में बीजेपी है। देश के कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है। ऐसे में बीजेपी की कुछ सीटें भी कम होती है तो उससे प्रतिष्ठïा प्रभावित होगी। 15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस को दस सीटों पर भी बढ़त मिलती है तो उसके लिए संजीवनी साबित होगी। पार्टी के साथ-साथ राहुल के लिए भी बहुत कुछ पाने जैसा होगा।  

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