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रैबार पर ऐतबार कर घिरी सरकार

देहरादून। मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर रैबार को आयोजित करने की वास्तविक मंशा क्या रही होगी, इसका अंदाज तो किसी को नहीं है, लेकिन एक गैर सरकारी संस्था के आयोजन को सरकारी बना कर सरकार सवालों के घेरे में आ गई। इस बात पर हैरानी जताई जा रही है कि आखिर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत असल आयोजकों के फेर में कैसे आ गए और एक विवाद को जन्म देने का चाहे-अनचाहे फैसला आखिर क्यों कर लिया। इस बात पर भी संदेह जताया जा रहा है कि इसके आयोजन को सफल बनाने के लिए मुख्यमंत्री पर कोई दबाव रहा होगा। बहरहाल, जिस अंदाज में असली आयोजक छिपे रहे और मोटी प्रायोजक राशि बटोर ले गए, कहा जा रहा है, उसको देखते हुए, ऊंगली उठना स्वाभाविक है। आयोजन का मकसद राज्य के विकास के प्रति सबको उनकी जिम्मेदारी का सन्देश देना था, लेकिन सन्देश यह गया कि कुछ लोग खेल कर गए और सरकार इसका शिकार हो गई। समारोह से मीडिया को दूर रखा जाना और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और रॉ चीफ अनिल धस्माना का अंतिम क्षणों पर न आना, भी कई तरह की कानाफूसियों को जन्म दे गया।

समारोह में सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के साथ ही कई बड़े नामों ने शिरकत की, जिसमें कोस्ट गार्ड के महानिदेशक राजेन्द्र सिंह समेत कई और लोग शामिल थे। इसका आयोजन पूरी तरह से गैर राजनीतिक रखा गया था, लेकिन यह तुरन्त ही तब राजनीतिक रंग ले गया, जब इसमें किसी भी गैर भाजपाई को नहीं बुलाया गया। यह पूरी तरह से बीजेपी और सरकार को कार्यक्रम बन कर रह गया, जबकि इसके आयोजक हिलमेन नाम की संस्था थी, जिसके पीछे दिल्ली के एक बहुत ही तेज समझे जाने वाले टीवी चैनल के पत्रकार थे। उनके साथ कुछ और लोग भी थे। इन्होंने किसी तरह सरकार को अपने भरोसे में लिया और इसके आयोजन को इस तरह शक्ल दी कि सभी ने इसको पहले तो सरकारी आयोजन ही माना। यह बात अलग है कि जिस तरह से सरकार के आला नौकरशाह और मंत्री इस आयोजन में शिद्दत से जुटे हुए थे, उससे कहीं से यह नहीं लगा कि इसके पीछे गैर सरकारी संस्था है।
नौकरशाहों ने प्रस्तुतीकरण के जरिये अपने महकमे की योजनाओं और विकास के बारे में बताया। मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह आयोजन की सफलता के लिए कड़ी नजर रखे हुए थे। बड़े-बड़े होर्डिंग्स शहर भर में आयोजन को लेकर लगाए गए थे। शायद आयोजकों को इस बात का इल्म था कि यह आयोजन कहीं न कहीं विवाद का कारण भी हो सकता है। ऐसा न होता तो इतने बड़े आयोजन से आम लोगों के साथ ही मीडिया को भी दूर न रखा जाता। जिस आयोजन को लेकर इतने बड़े स्तर पर तैयारी की गई थी, उसको कवर करने के लिए पत्रकार ही नहीं बुलाए गए। सिर्फ सूचना विभाग की रिलीज के भरोसे पत्रकारों को रहना पड़ा। जैसे ही आयोजन शुरू हुआ, सरकार की दिक्कत भी शुरू हो गई। सोशल मीडिया में सरकार से आयोजन को लेकर ही नहीं बल्कि इसको गुपचुप तरीके से आयोजित करने के कारण भी सवाल पूछे जाने लगे। न सरकार और न ही मूल संस्था ने इसकी कोई सफाई या जवाब देने की जरूरत महसूस की।
देश के कई बड़े नामों ने इस आयोजन में शिरकत की और इनमें एक बेहद अहम नाम शौर्य डोभाल का भी था। शौर्य राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे हैं। यह उनका ही जलवा माना गया जो इतने बड़े लोग आयोजन से जुड़े। किसी की हिम्मत नहीं हुई जो उनको मना कर सके। यह बात संदेह के दायरे में रही कि खुद अजीत डोभाल और रॉ के बॉस अनिल धस्माना आयोजन में नहीं आए। सूत्रों के मुताबिक दोनों को शायद यह महसूस हुआ कि आयोजन में शिरकत करना उचित नहीं रहेगा। दोनों के पास खुफिया इनपुट्स पहुंच गए थे कि आयोजन को लेकर विवाद हो सकता है। ऐसा न होता तो उनके न आने का आयोजक कोई वाजिब कारण बता सकते थे। वैसे हैरानी की बात है कि जिन लोगों को आयोजन में ससम्मान बुलाया गया था,वे सभी उत्तराखंड मूल के थे। उन्होंने विकास और प्रगति की चाह, पहाड़ों में विकास और मूलभूत सुविधाएं तक न होने और रोजगार की तलाश को पलायन का मुख्य कारण बताया। उन्होंने पलायन को रोकने की जरुरत बताई, लेकिन खुद शीर्ष पदों पर तभी पहुंचे, जब वे उत्तराखंड और पहाड़ छोड़ कर गए। इस मुद्दे पर बहस चल रही है कि क्या जो मेहमान बुलाए गए थे, उनको पलायन पर बोलने का हक था? जब खुद ही पहाड़ छोड़ कर चले गए तो दूसरों को किस मुंह से पहाड़ पर रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
वैसे भी यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिसका जवाब या कारण सरकार या किसी और के पास न हो। प्रमुख नाम वाले वक्ताओं ने भी कोई बहुत अहम बात पलायन रोकने पर नहीं बोली। क्या लोगों को नहीं पता कि कितने मंत्री और विधायक ऐसे हैं जो पहाड़ के रहने वाले हैं, सियासत वहीं की करते हैं, लेकिन रहते देहरादून या फिर मैदानी इलाकों में हैं। कइयों की पत्नियां सरकारी महकमे या शिक्षा महकमे में हैं। क्या वे कभी पहाड़ में अपनी मूल तैनाती स्थल पर गए? ऐसे मंत्रियों और विधायकों की गिनती नहीं है जिन्होंने देहरादून में अपने घर बना लिए हैं। वे सिर्फ सियासत की खातिर ही अपने क्षेत्र में जाते हैं। आखिर अपने बच्चों के लिए बेहतर स्कूल और अस्पताल तलाशने वाले सियासी लोग और सरकार के नुमाइंदे यह कब समझेंगे कि यह सिर्फ उनकी नहीं बल्कि हर उत्तराखंडी की जरुरत है। सभी को अधिकार है अपने बच्चों का अच्छा पढ़ाना और उनको बेहतर चिकित्सा व स्वास्थ्य सुविधायें देना। इस पर सिर्फ बड़े और वीआईपी लोगों का ही अधिकार हो गया है या फिर मैदानी जिलों के लोगों को ही यह सुविधा मिल रही है।
पहाड़ों में आज भी चिकित्सक और शिक्षक नहीं हैं। रोजगार नहीं है। सरकार के पास इसका पूरा इनपुट है। उसको क्या रैबार जैसे आयोजन की वाकई दरकार थी क्या? आरोप लग रहे हैं कि इसका आयोजन सिर्फ कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया। इसमें शक नहीं है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा और छवि ढेंचा बीज घोटाले से साफ बाहर निकलने के बाद एकदम साफ है। उनको बिना लाग लपेट के सपाट स्वर में बात करने वाला मुख्यमंत्री माना जाता है। उनको शायद इसका अहसास नहीं रहा होगा कि इस तरह के आयोजन से किस तरह के विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। विपक्षी दल कांग्रेस की भूमिका भी इस आयोजन को लेकर अधपकी जैसी रही। नेता विपक्षी दल डॉ. इंदिरा हृदयेश बजाए आयोजन पर सरकार को घेरने के, यह नाराजगी उठाती दिखी कि इस आयोजन से उनको क्यों दूर रखा गया। उनको बुलाना चाहिए था, चाहे वे आते या न आते। उनको इसके बजाए आयोजन में सरकार की सक्रिय भूमिका पर ऊंगली उठाना चाहिए था। यह पूछा जाना चाहिए था कि गैर सरकारी संस्था को आखिर इतनी तवज्जो कैसे और क्यों दी गई।

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