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उम्मीदों के पहाड़ पर उत्पल

देहरादून। उत्तराखंड में जितने भी मुख्य सचिव आए हैं, सबकी अपनी-अपनी खासियतें थीं। कोई अपनी भयाक्रांत करने वाली छवि या सख्ती के चलते छाप छोड़ गए तो कोई सरलता और सुलभता के कारण। कोई अपनी फ्री स्टाइल और नतीजेपरक कार्यशैली के चलते तो कोई सुस्ती या फिर आम लोगों से जुड़े मुद्दों और लोगों को नजरअंदाज करने के चलते चर्चाओं में रहे। बहुत कम मुख्य सचिव ऐसे आए, जिनको संतुलित और लोगों के साथ रिश्ते स्थापित करने की खासियत के चलते जाना गया हो और वे विवादों से दूर भी रहे हों। एस रामास्वामी के स्थान पर मुख्य सचिव बनाए गए उत्पल कुमार सिंह ऐसे पहले अफसर हैं, जिनको उनकी कार्यशैली और छवि के कारण जाना जाता है। साथ ही जिन्होंने उनके साथ काम किया है, वे पसंद भी करते हैं। उनको मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत बहुत उम्मीदों के साथ लाए हैं और अब उनसे उम्मीद की जा रही है कि वह प्रदेश के मानचित्र को विकास के क्षेत्र में काफी हद तक बदल डालेंगे। भले यह बहुत मुश्किल चुनौती है लेकिन उनके पास पसंद के नौकरशाहों की टीम है और खुदा न खास्ता वह कामयाब नहीं हो पाए तो उनके पास कोई बहाना नहीं होगा।

उत्पल उत्तराखंड में पहले भी काफी काम कर चुके हैं और यहीं से वह पांच साल पहले केंद्र सरकार प्रतिनियुक्ति पर गए थे। जिस वक्त वह प्रतिनियुक्ति पर गए थे, उनको राज्य सरकार बनाए रखना चाहती थी लेकिन केंद्र सरकार में जाना तब उत्पल की प्राथमिकता थी। राज्य सरकार को भी केंद्र सरकार को अपने अफसर प्रतिनियुक्ति पर देने होते हैं। ऐसे में उसके पास भी तब बहुत ज्यादा विकल्प नहीं रह जाते हैं किसी अफसर को केंद्र में जाने से रोकने के, जब अफसर और केंद्र दोनों की राय एक हो। उत्पल मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ही नहीं बल्कि लोक निर्माण विभाग और कार्मिक के साथ ही पर्यटन सरीखे अहम महकमे संभाल चुके हैं। उनको ऐसे नौकरशाह के तौर पर जाना जाता है, जो काम और नतीजों से मतलब रखते हैं। फाइलों में योजनाओं को उलझाना उनको कतई पसंद नहीं है। ऐसा करना उत्तराखंड के अफसरों का शगल है। इसके कारण न सिर्फ लोग परेशान हैं बल्कि इससे विकास योजनायें गैर जरूरी तौर पर उलझती भी हैं।
सात साल पहले जब गढ़ी कैंट में कैंट बोर्ड के अधीन आने वाला एक पुल टूट गया था तो उन्होंने इसका निर्माण आपदा निधि से करा दिया था। भले उनको इसके लिए मुख्य सचिव सुभाष कुमार से निर्देश मिले थे, लेकिन राज्य सरकार के अधीन न आने वाले क्षेत्रों से मुताल्लिक कामों को लटका देना अफसरों की आम आदत है। इस पुल की अहमियत इतनी ज्यादा थी कि यह राजपुर रोड, मेख गुरुंग (न्यू कैंट) रोड को चकराता रोड से जोड़ता था। एक महीने से भी ज्यादा समय से इस टूट गए पुल का निर्माण करने में कैंट बोर्ड ने असमर्थता जता दी थी। उत्पल के स्थान पर कोई और अफसर होते तो शायद ही यह पुल बनाया जाता। उनकी सख्ती की भी मिसाल है। एक बार एक युवा पीसीएस अफसर को लम्बी छुट्टी चाहिए थी। उनको संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करनी थी। उस वक्त राज्य में अफसरों की जबरदस्त कमी चल रही थी। उत्पल ने उस अफसर को छुट्टी कम करने पर ही छुट्टी देने की शर्त रखी और वह अफसर मान गया।
उत्पल के लिए अच्छा यह है कि कोई अजूबा नहीं हुआ तो वह अब रिटायर होने तक मुख्य सचिव बने रह सकते हैं। उनको मौजूदा सरकार लाई है। मुख्यमंत्री के बदले जाने की सूरत में ही मुख्य सचिव बदलने की चर्चा होगी। वैसे उनको चुनौती देने वालों में अब अपर मुख्य सचिव डॉ. रणवीर सिंह ही रह गए हैं जो उनके ही बैच (1986) के हैं। रामास्वामी की वापसी के आसार नहीं है। अब तक सिर्फ सुभाष कुमार ही ऐसे अफसर रहे हैं जो दो बार मुख्य सचिव बने। डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया, सुरजीत किशोर दास और आलोक कुमार जैन ने काफी नौकरी बची होने के बावजूद आईएएस की नौकरी छोड़ दी थी जबकि उनके पास काफी वक्त बचा हुआ था। उनको अहसास हो गया था कि न तो उनकी अब वापसी होनी है और न ही आईएएस की सेवा में रह कर कोई फायदा रह गया है। मधुकर गुप्ता और एम रामचंद्रन की नौकरी मुख्य सचिव से हटने के बाद भी बहुत बची थी पर उनकी रूचि केंद्र सरकार में जाने की थी और उन्होंने वहां बड़े-बड़े महकमे संभाले।
रामास्वामी जब मुख्य सचिव बनाए गए थे, तब यह हल्ला था कि डीम्ड रिटायर मान लिए गए पूर्व आईएएस अफसर आरके सिंह को उत्तराखंड लाकर मुख्य सचिव बनाने की साजिश आईएएस अफसरों की एक मजबूत लॉबी कर रही है। इसके चलते रामास्वामी बहुत तनाव में ही नहीं रहे बल्कि उन्होंने सिंह से सम्बंधित सभी सूचनाएं एक ही दिन में सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत हासिल कर लिए थे। उनकी मंशा सिंह के आईएएस बन कर मुख्य सचिव बनने की सूरत में उनके खिलाफ अदालत जाने की थी। यह सब कपोल कल्पना साबित हुई थी, लेकिन यह माना गया था कि रामास्वामी को अफसरों की एक खास लॉबी पसंद नहीं करती है और उनको हटाने की कोशिश चलती रहेगी। तब उत्पल के आने की सम्भावना भी जताई गई थी, लेकिन मुख्य सचिव बनाने की गारंटी न मिलने पर उन्होंने यहां का रुख करना ठीक नहीं समझा था। वैसे उत्पल से वरिष्ठ अनूप वधावन अभी केंद्र सरकार की सेवा में हैं, लेकिन वह भी यहां आने को राजी नहीं हैं। अब जबकि उनसे एक बैच कनिष्ठ मुख्य सचिव बन चुके हैं तो उनके आने की कोई सूरत दिखती ही नहीं। उत्पल को अगर हटा सकते हैं तो वह ओमप्रकाश हैं जो उनसे एक बैच जूनियर हैं। ओमप्रकाश आज की तारीख में सबसे शक्तिशाली नौकरशाह हैं। उत्पल और ओमप्रकाश में सामंजस्य फिलहाल अच्छा है। इससे सरकार के कामकाज को गति मिलने में आसानी रहेगी। ओमप्रकाश के पास न सिर्फ बड़े और अहम महकमे हैं बल्कि वह मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव भी हैं। फिर उनके पास मुख्य सचिव की कुर्सी पर बने रहने के लिए लम्बी सेवा अवधि है। ऐसे में कनिष्ठ नौकरशाह उनसे निश्चित रूप से सहमे रहेंगे। मुख्य सचिव के पास ज्यादा सेवा अवधि न रहने पर मातहत अफसरों का उनको भाव न देना इतिहास रहा है।
प्रदेश के ज्यादातर अफसर आज ओमप्रकाश के साथ हैं और उनके इशारों पर चल रहे हैं। मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव में तालमेल बना रहा तो सरकार की योजनाओं में रफ्तार आना तय है। इसके बावजूद उत्पल के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। राज्य के ज्यादातर अफसर आराम पसंद और निरुत्साही दिखते हैं। वे समय पर दफ्तर नहीं आते और आते हैं तो ज्यादा बैठना पसंद नहीं करते हैं। लोगों से मिलने-जुलने और उनकी समस्याओं से वे ज्यादा वास्ता भी नहीं रखते हैं। अन्य महकमों की फाइलें उनके पास किसी वजह से आने पर उनको लटका देना उनकी आदत बन चुकी है। टीम भावना से ही इस समस्या को दूर किया जा सकेगा। सचिवालय ही नहीं जिलों में भी प्रशासन चुस्त-दुरुस्त करना आसान नहीं है। फाइलों को रफ्तार देने की व्यवस्था बीसी खंडूड़ी के वक्त ही बना दी गई थी, लेकिन वह सब कागज में ही रह गई है। फाइलों का महीनों तक एक ही स्थान पर दब जाना या फिर उनमें नाहक किस्म की आपत्ति लगना आम बात हो चुकी है। पुलिस महकमे में भी उनको परिवर्तन करना पड़ेगा। इस महकमे में भी स्थिरता आ गई है। कानून-व्यवस्था को अधिक चुस्त-दुरुस्त करने की जरुरत अभी और है। उत्पल कब तक तंत्र को पटरी पर लाते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

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