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कब्जों के इस खेल में कोई बेदाग नही है

देहरादून। उत्तराखंड राज्य बना तो बाहर के भू माफिया तंत्र ने मिट्टी के मोल जमीनें खरीद कर हीरे के भाव जमीनें बेच मोटा माल कमाया। जो जमीन कभी 20 हजार रूपये नहीं बिकती थीं वो आज करोड़ से नीचे नहीं है। जो शहर की जमीनें हैं उनको तो छू पाना भी ज्यादातर के वश से बाहर है। जब एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने भू कानून बना कर जमीनों की आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाने की कोशिश की थी। उन्होंने गैर उत्तराखंडियों के लिए राज्य में शहर से बाहर 500 गज से ज्यादा जमीन खरीदने पर पाबंदी लगा दी थी। जिसको बाद में बीसी खंडूड़ी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने 300 गज कर दिया था। इसमें सरकार ने छावनी क्षेत्र की जमीनों को शामिल नहीं किया था। इसके चलते बाहरी लोगों के लिए छावनी इलाके में जमीन खरीदना मुश्किल नहीं हुआ। इसका नतीजा यह रहा कि जिस छावनी क्षेत्र में उत्तराखंड राज्य गठन से पहले जमीन बामुश्किल पांच लाख रूपये बीघा थी, वह आज ढाई करोड़ रुपये बीघा हो चुकी है। इसके चलते भू माफिया तंत्र, अफसरों, कर्मचारियों, राजनेताओं और दलालों के साथ मिल कर सरकारी जमीनों को धड़ल्ले से कब्जा कर मुंह मांगी कीमत पर बेच रहे हैं। जिस तरह इस खेल का पता चल चुकने के बावजूद माफिया तत्वों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, उससे यह साफ हो जाता है कि इस बड़े खेल में सभी शामिल हैं।

राजधानी और राज्य का सबसे बड़ा छावनी इलाका गढ़ी और डाकरा में करोड़ों रूपये की सरकारी जमीन पर कब्जा कर उसको प्लॉटिंग कर बेचा जा रहा है। डाकरा में कई बड़े नाले जिनकी चौड़ाई 80 फीट तक थी, आज भू माफिया तत्वों के कब्जों के कारण सिर्फ नाली रह गई हैं। ये नाली भी आगे जाकर इसलिए बंद हो गई हैं कि नाले के बीचों-बीच दीवार खड़ी कर दी गई है। भू माफिया लोगों ने नालों को बेच डाला है। इसको खरीदने वाले दो किस्म के लोग हैं। एक वो बाहरी लोग, जिनको जमीन के चरित्र के बारे में और उसके स्वामित्व के बारे में कुछ नहीं पता। दूसरे वे लोग जो नदी-नाले के किनारे छोटा सा जमीन का टुकड़ा खरीदते हैं और फिर उससे दोगुना कब्जा कर लेते हैं। दोनों खेल खूब चल रहा है जो लोग माफिया लोगों से जमीन खरीद रहे हैं, उनके पास जमीन की रजिस्ट्री तो है लेकिन असली दस्तावेज, दाखिल खारिज नहीं है।
ऐसा इसलिए कि उनके पास जो जमीन है, वो सरकारी हैं। ये सभी जमीन नॉन जेड ए श्रेणी की हैं। छावनी क्षेत्र में इस जमीन का मालिक कौन है, अभी तक यही साफ नहीं हो पाया है। यह हैरानी की बात है। कानून के मुताबिक इस जमीन का स्वामित्व सेना, मिलिटरी एस्टेट ऑफिस, छावनी परिषद या फिर राज्य सरकार का होना चाहिए। करोड़ों रूपये की जमीन अवैध कब्जे में चले जाने के बावजूद कोई भी महकमा जागने को राजी नहीं दिख रहा है। अभी भी करोड़ों रुपये की जमीन बची है और हर विभाग यह कह कर बचने की कोशिश कर रहा है कि उनको नहीं पता कि मालिक कौन है। छावनी परिषद भी बगैर स्वामित्व का पता किए सालों से मकान के नक्शे पास करता जा रहा है। रजिस्ट्री महकमे को इससे कोई वास्ता नहीं दिख रहा कि जमीन किसकी है और कौन कैसे बेच रहा है। उसको भी स्टाम्प फीस से मतलब है, लेकिन यह तय है कि यह विभाग भी दूध का धुला नहीं है।
अगर राज्य सरकार की मिलीभगत न हो तो यह खेल कभी का खत्म हो सकता था। रजिस्ट्री विभाग से जमीन के दस्तावेज तहसील में नामांकन के लिए भेजे जाते हैं। वहां जमीन के असली-नकली की जांच की जाती है। इसके बाद फर्जी तरीके से जमीन बेचे जाने का प्रमाण मिलने पर कार्रवाई करने का प्रावधान है। सही होने पर नामांकन हो जाता है। छावनी क्षेत्र में अभी तक किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई हो, ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है। हैरानी की बात है कि नॉन जेड ए की जमीन कैसे इस तरह तेजी से बिक रही है और लोग अवैध कब्जे करते जा रहे हैं। जिनके पास कब्जे हैं, वे मानते हैं कि उनकी जमीन नॉन जेड ए की है। यह भी मानते हैं कि उनके पास दाखिल खारिज भी नहीं है। इनमें से कई जमीनों पर सेना का सीधा स्वामित्व है। सेना भी खामोश बैठी है, यह हैरानी की बात है। इसका मतलब यह भी निकला जा रहा है कि भू माफिया तत्वों का सम्बन्ध सेना के लोगों से भी है। जहां निजी कब्जा नहीं हो रहा, वहां कुछ भी निर्माण हो तो सेना के सशस्त्र जवान उसको तोडऩे पहुंच जाते हैं। जैसा कुछ महीने पहले मिनी मसूरी में शनि मंदिर के सीमा दीवार बनाते समय हुआ था। तब दीवार तोडऩे सेना रातों-रात राइफल लेकर आ गई थी।
बोर्ड ऑफिस से बामुश्किल 50 मीटर दूर स्थित मिनी मसूरी में नाला बिलकुल बंद कर उसकी प्लॉटिंग कर दी गई है। मिनी मसूरी और संजय विहार,संगम विहार के बीच बीच से गुजर रहे विशाल नाले को सेना के एक पूर्व अधिकारी ने पूरी तरह पाट कर अवैध रूप से कब्जा लिया है। इतना ही नहीं उसने जमीन बेच भी दी है। कॉलोनियों की प्लॉटिंग करने वाले लोगों ने नाले-खाले की जमीन बेच कर लोगों को यह छूट भी दे दी कि वे चाहे तो अपना कब्जा नाले की तरफ आगे बढा लें। लोग ऐसा कर भी रहे हैं। सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों की तमाम शिकायतों के बाद बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जाकिर हुसैन ने संजय विहार में जाकर अवैध निर्माण और कब्जों को खुद देखा। उनको स्थानीय लोगों ने बताया कि बोर्ड अपने ही लगाए उस बोर्ड की हिदायतों की रक्षा भी नहीं कर पा रहा है, जिसमें नोटिस बोर्ड के दोनों तरफ 30-30 फुट दूरी तक कब्जा और निर्माण न करने की चेतावनी लिखी गई थी। खुद बोर्ड ने अपनी हिदायतों के परे जाकर अवैध कब्जे वाली जमीनों पर नक्शे पास कर दिए। प्लॉटिंग में भी जम कर बेईमानी का मामला सामने आया। एक स्थानीय शख्स के मुताबिक उससे पैसा तो जेड ए श्रेणी की जमीन के लिए गए, लेकिन धीरे-धीरे उसको कब्जा नॉन जेड ए जमीन का दिया गया, जो सरकारी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कब्जा कराने के लिए सिर्फ माफिया के दलाल आते हैं। माफिया खुद कभी सामने नहीं आता है।
स्थानीय लोगों में अब इस अवैध कब्जों को लेकर गुस्सा है और वे इसके खिलाफ आन्दोलन चलाने की तैयारी में हैं। उन्होंने मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (गृह), सचिव (राजस्व), जिलाधिकारी, पुलिस महानिदेशक, उप महानिरीक्षक (गढ़वाल), एसएसपी और कैंट बोर्ड के सीईओ को संयुक्त दस्तखत वाले ज्ञापन दे कर इस दिशा में उचित और सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि जो काम सरकार, सेना और बोर्ड को करना चाहिए, वह कार्य वे कर रहे हैं। फिर भी कोई इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखा रहा है। क्षेत्र में रहने वाले रमेश घिल्डियाल, भूपेन्द्र गुरुंग और विनोद डंगवाल के मुताबिक अवैध कब्जा करने और कराने वालों के कारण कॉलोनियों और क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का संकट उत्पन्न हो चुका है। पिछले दिनों अवैध कब्जे के बारे में पूछने पर एक स्थानीय युवक को माफिया लोगों ने पीट डाला। इस पर भी पुलिस कुछ नहीं कर रही है। पुलिस महानिदेशक को शिकायत के बाद गढ़ी कैंट थाने की पुलिस ने आकर माफिया लोगों को फिलहाल सरकारी जमीन पर काम बंद करने की चेतावनी दी। स्थानीय लोग चाहते हैं कि अवैध कब्जा करने और कराने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो।

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