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लुट गया सिडकुल !

देहरादून। उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो इसकी वास्तविक स्थापना कांग्रेस राज में एनडी तिवारी ने की थी। उन्होंने देखा कि राज्य के पास खाली जमीन बहुत कम है और जंगल ज्यादा हैं। जंगल को छेड़ नहीं सकते थे और खाली जमीनें बंजर या बेकार पड़ी थी। बात 2003 की है। केंद्र सरकार में कई अहम मंत्रालय और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके दूरदृष्टि के मालिक तिवारी को लगा कि उत्तराखंड को चलाने के लिए राजस्व और रोजगार दोनों की जरूरत है। रोजगार नहीं होगा तो नौजवान पलायन कर जाएंगे और राजस्व नहीं होगा तो राज्य का दिवाला निकल जाएगा। उन्होंने तब के मुख्य सचिव मधुकर गुप्ता, वन एवं ग्राम्य विकास आयुक्त डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया और कुछ विशेषज्ञों के साथ मिल कर तब सिडकुल की स्थापना की। इसका मकसद था राज्य में औद्योगिक निवेश के लिए माहौल बनाना। उद्योगों को निमंत्रित करना। इसके लिए फालतू पड़ी जमीनों को सिडकुल को स्थानांतरित किया गया। केंद्र सरकार से औद्योगिक पैकेज भी मिला। बस क्या था। गाड़ी और योजना चल निकली। देश भर के बड़े-बड़े उद्योग उत्तराखंड आने लगे और जिस जमीन को कोई पूछ नहीं रहा था, वह सोना बरसाने लगी। इतना कि बहुचर्चित साढ़े चार सौ करोड़ रूपये का सिडकुल घोटाला सामने आ गया, जिसमें जमीन खुर्द-बुर्द करने का ही संगीन आरोप था। फिर भी तब तक सिडकुल के खाते में पैसे बरसने लगे थे। जब यह सरकारी कंपनी प्रदेश की सबसे ज्यादा कमाऊ कंपनी बनी। बस तभी से इस पर नौकरशाहों और राजनेताओं की नजर लगने लगी। आज यह कंपनी कुप्रबंधन और राजनेताओं के दखल के चलते न सिर्फ कंगाली की ओर है, बल्कि डूबने की कगार पर भी आ गई है।

इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, तकरीबन 650 करोड़ रूपये के निर्माण का ठेका बिना सोचे समझे और आंख मूंद के दे दिया जाना और अंटी में पैसा न होना। मामले का खुलासा तब हुआ जब नई प्रबंध निदेशक सौजन्य जावलकर ने बैलेंस शीट की रिपोर्ट ली। अब उन्होंने जिम्मेदार लोगों को कसना शुरू किया है लेकिन कंपनी के शातिर खिलाड़ी भी अपने राजनीतिक आकाओं के चक्कर लगाने लग पड़े हैं। फिलहाल, कंपनी की खस्ता हालत को देख कर एक ही शब्द निकलता है,अरे, लुट गया है सिडकुल।
सिडकुल के पास जो खजाना था, वह शुरू में तो सरकार की नजर में आया और फिर तेजी से छिनना शुरू हुआ। जो पैसा राज्य में औद्योगिक विकास और अवस्थापना के लिए खर्च होना था, वह सरकार की अन्य योजनाओं और कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च होने लगा। जिस वक्त राज्य को छठा वेतन आयोग दिया गया तब भी सिडकुल के खजाने को खाली किया गया और जब भी कई योजनाओं के लिए पैसे की कमी पड़ी, सिडकुल का खजाना ही खाली किया गया। फिर निर्माण और अन्य योजनाओं के बहाने इसको सिर्फ लूटा ही नहीं गया बल्कि लूटने वालों के खिलाफ भी कोई कार्रवाई सरकार ने कभी नहीं की। दिखावे के लिए सिडकुल जांच आयोग का गठन बीजेपी की खंडूड़ी सरकार ने किया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट यूं ही दबी रह गई। जो जिम्मेदार समझे जाते थे, वे या तो रिटायर हो गए या फिर उत्तराखंड से ही चले गए। न मंत्री रहे न उस दौर के मुख्यमंत्री तिवारी ही इस हाल में हैं कि उनसे उनके बयान भी लिए जा सके।
इस कम्पनी को सिर्फ लूटा ही नहीं गया, बल्कि पिछली सरकार में उप महाप्रबंधक पद पर नियुक्ति भी पूरी तरह से गलत तरीके से की गई। इतने अहम पद के लिए सिर्फ एक आवेदन आया। यह इसलिए कि आवेदन कम आए इसके लिए व्यवस्था ही ऐसी की गई थी। एक आवेदन आने की सूरत में आवेदन को निरस्त कर दुबारा आमंत्रित किया जाता है लेकिन इस पद पर इकलौते नाम को ही नियुक्ति दे दी गई। सूत्रों के मुताबिक सिडकुल में अब इसी अफसर का जलवा है। वह जिसको चाहता है उसको ठेके मिलते हैं, और प्लाट आवंटित होता रहा है। पिछली कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री हरीश रावत के खासमखास और औद्योगिक सलाहकार रंजीत रावत के करीबी इस अफसर का नाम अब करोड़पतियों में लिया जाता है, जबकि उनकी नौकरी को पांच साल भी नहीं हुए हैं। इस अफसर के पास भारी संपत्ति होने की शिकायत सतर्कता विभाग को भी मिली है। यह हैरानी की बात है कि सतर्कता विभाग ने अभी तक इस अफसर के खिलाफ जांच शुरू नहीं की है, जबकि पांच हजार रूपये की रिश्वत लेने में कई कर्मचारी गिरफ्तार होकर जेल जा चुके हैं।
सिडकुल में कुप्रबंधन की मिसाल यह भी है कि यहां ठेके खुल कर बांटे जा रहे हैं। ठेके लेने वाले भी कोई मामूली लोग नहीं हैं। इनमें कई तो विधायक हैं। इनमें बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों के विधायक हैं। जिस विधायक की चली उसी ने ठेके लिए और अपने चहेतों को बांट दिया। जाहिर है कि इसमें जम कर मोटा कमीशन लिया गया। सिडकुल में कमीशन के खेल का ही नतीजा है कि यहां के ज्यादातर काम करने का ठेका उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को मिलता रहा है। जो कमीशन खुल कर बांटने के नाम पर बदनाम है। इसके महाप्रबंधक एसए शर्मा इन दिनों आयकर विभाग के छापे के बाद निलंबित चल रहे हैं और अरबों रूपये के स्वामी साबित हुए। ठेके देने का आलम यह है कि कम्पनी अपनी बैलेंस शीट तक शायद नहीं देख रही है। कंपनी ने 650 करोड़ का ठेका तो दे दिया, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि काम होने पर भुगतान कैसे होगा। नई प्रबंध निदेशक सौजन्या ने इस मामले में कम्पनी के अफसरों की बैठक बुला कर उनको डांट भी जम कर पिलाई है। सौजन्या ने तेवर से अफसरों की घिग्घी बंध तो गई है पर वह इस मामले में कितना प्रभावी कदम उठा पाती हैं, यह देखने वाली बात है। प्रबंध निदेशक के पूछे जाने पर पुराने अफसरों ने सफाई दी कि जमीन बेच कर भुगतान करने की सोच के साथ निर्माण के ठेके बांटे गए हैं। प्रबंध निदेशक का पारा इसलिए भी गर्म हुआ कि ठेके देते समय कम्पनी ने यह शर्त कहीं नहीं लिखी है कि जमीन बिकने पर ही भुगतान किया जाएगा। जाहिर है कि सिर्फ ठेके देने और कमीशनखोरी तक में सिडकुल अफसरों की दिलचस्पी रही है। जिनको ठेके दिए गए हैं वे भुगतान के लिए कोर्ट तक चले जाएंगे, यह तय है यानि, सिडकुल की जेब ढीली तो होना अवश्यम्भावी है। अफसरों के लालच के चलते कम्पनी को बैंक से कर्ज लेकर कार्य करने पड़ रहे हैं। जिस कम्पनी ने कभी सरकार को पैसे दिए हों, उसका खुद कर्ज में डूबना अद्भुत है।
सूत्रों के अनुसार सिडकुल का चहेता निर्माण निगम भी निर्माण कार्यों के लिए उस ठेकेदार को चुनता रहा है, जो खुद निलंबित हो चुके महाप्रबंधक शर्मा के साथ आयकर छापे में फंसा हुआ है। अब इस ठेकेदार पर इन दिनों जिका और इसके प्रमुख अनूप मलिक की नजरें इनायत है। सिडकुल के काम करने का अजीबोगरीब अंदाज यह भी है कि जिका के दफ्तर के लिए सिडकुल परिसर में किराए में जगह दे दी गई है। यह जगह सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग से जुड़े दफ्तरों के लिए ही इस्तेमाल हो सकती हैं। सिडकुल प्रबंधन के पास इसका जवाब भी नहीं है।

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