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राहुल के अध्यक्ष बनने से मजबूत होगी कांग्रेस, मोदी को मिलेगी चुनौती

कांग्रेस सबसे बुरे दौर में है और अब कांग्रेस की डूबती नैया को राहुल गांधी तब संभालने जा रहे हैं जब वह डगमगा रही है। पहले भी ऐसे कई मौके आये हैं जब महत्वपूर्ण मुद्दों पर राहुल गांधी की चुप्पी जनता को अखरती रही है। असल में राहुल गांधी पार्टी में नए प्रयोग करना चाहते थे लेकिन चाटुकारों से घिरे रहने और गलत सलाहकारों के कारण हमेशा उन्हें मुंह की खानी पड़ी। पार्टी के ही कई कनिष्ठ पदाधिकारियों ने कभी राहुल को पप्पू तो कभी नासमझ और अपरिपक्व नेता बताते हुए पार्टी को अलविदा कह दिया है। हालांकि राहुल गांधी इससे विचलित नहीं हुए हैं लेकिन फिर भी उन्होंने पहले मंत्री पद स्वीकारने और फिर अध्यक्ष पद संभालने में देर तो कर ही दी है।
हुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना निश्चित हो चुका है। अब वह कांग्रेस के सर्वेसर्वा बनने वाले हैं और उम्मीद है कि चाटुकारों से दूर रहकर वह जमीन से जुड़े नेताओं और सलाहकारों की बदौलत एक बार फिर मृतप्राय कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करेंगे। राहुल गांधी तीसरी बार लोकसभा के सांसद बने हैं। राहुल 2004 में पहली बार लोकसभा के सांसद चुने गये थे और उसी दौरान कांग्रेस सत्ता में लौटी थी। किसी ने कांग्रेस के जीतने का अनुमान नहीं लगाया था। चुनाव सोनिया गांधी की अगुवाई में लड़ा गया था लेकिन कांग्रेस के जीतने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए इस कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के दावेदार का मुद्दा ही नहीं था। सारे मीडिया चैनल और समाचार पत्र भाजपा को जिताने में जुटे थे क्योंकि भाजपा ने गठबंधन दलों के साथ अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पांच साल सफलतापूर्वक सरकार चलाई थी।
कांग्रेस के जीतते ही सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ आवाजें उठने लगीं लेकिन राहुल गांधी चुप्पी साध गये और अंतत: सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का चुनाव किया और उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया। उन्होंने राहुल गांधी को बार-बार मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्यौता दिया लेकिन राहुल गांधी चुप्पी साध गये। राहुल गांधी मंत्रिमंडल में शामिल होते और अपनी योग्यता सिद्ध करते तो शायद 2009 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार होते लेकिन ऐसा नहीं हो सका। 2009 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस की जीत हुई और मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने। इस दौरान सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और कई मंत्री जेल भी गये। मनमोहन सिंह राहुल गांधी को बार-बार मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए न्यौता देते रहे लेकिन राहुल गांधी कभी तैयार नहीं हुए और अंतत: कांग्रेस की सबसे करारी हार हुई और भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई।
कांग्रेस सबसे बुरे दौर में है और अब कांग्रेस की डूबती नैया को राहुल गांधी तब संभालने जा रहे हैं जब वह डगमगा रही है। पहले भी ऐसे कई मौके आये हैं जब महत्वपूर्ण मुद्दों पर राहुल गांधी की चुप्पी जनता को अखरती रही है। असल में राहुल गांधी पार्टी में नए प्रयोग करना चाहते थे लेकिन चाटुकारों से घिरे रहने और गलत सलाहकारों के कारण हमेशा उन्हें मुंह की खानी पड़ी। पार्टी के ही कई कनिष्ठ पदाधिकारियों ने कभी राहुल को पप्पू तो कभी नासमझ और अपरिपक्व नेता बताते हुए पार्टी को अलविदा कह दिया है। हालांकि राहुल गांधी इससे विचलित नहीं हुए हैं लेकिन फिर भी उन्होंने पहले मंत्री पद स्वीकारने और फिर अध्यक्ष पद संभालने में देर तो कर ही दी है। हालांकि उन्हें 2013 में ही पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया गया था और पार्टी में उनकी नम्बर दो की हैसियत थी और पार्टी अध्यक्ष पद पर उनकी मां ही विराजमान थीं और इस नाते उन्हें बहुत से विशेष अधिकार हासिल थे। लेकिन उन्होंने हड़बड़ी नहीं दिखाई और शायद ऐसा सोनिया गांधी ने अपने वरिष्ठ सलाहकारों की सलाह पर राहुल को करने की सलाह दी होगी।
असल में सोनिया गांधी की चिंता पार्टी के पुराने सिंडीकेट्स को लेकर है जो राहुल को असफल करार देने की पुरजोर कोशिश करते लेकिन अब सारे कांटे दूर हो चुके हैं और राहुल का कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय है और 2019 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ही कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। कुछ लोग कांग्रेस को मृतप्राय मानने लगे हैं लेकिन कांग्रेस की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वह कभी भी पुनर्जीवित हो सकती है। बस उसे सशक्त नेतृत्व की जरूरत है जो सभी वर्गों को लेकर साथ चले न कि किसी एक समुदाय या सम्प्रदाय के तुष्टीकरण की नीति अपनाए।
गुजरात चुनावों से पहले कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का नाम तय है। राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने से निश्चित रूप से कांग्रेस को गुजरात में फायदा होगा। हालांकि पार्टी का सत्ता तक पहुंचना अभी मुश्किल लग रहा है और इसका कारण कमजोर क्षेत्रीय नेतृत्व है। राहुल गांधी चुनावों से पूर्व स्थानीय समुदाय के किसी युवा नेता को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान करते हैं तो मतदाताओं का रूझान बदल सकता है और वैसे भी भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार एवं वर्तमान मुख्यमंत्री विजय रूपाणी कोई ज्यादा लोकप्रिय नेता नहीं हैं बल्कि उन्हें अमित शाह की करीबी का फायदा मिला है।
राहुल के अध्यक्ष बनने ही सोनिया गांधी का दौर समाप्त हो जाएगा। इस बात की पूरी संभावना है कि राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद प्रियंका गांधी भी भाई की मदद के लिए अधिकारिक रूप से पार्टी में शामिल होकर जिम्मेदारी संभालेंगी। कहा जा रहा है कि उन्हें महासचिव बनाया जा सकता है। राहुल के पार्टी अध्यक्ष बनने एवं प्रियंका के महासचिव बनने से प्रधानमंत्री पद को लेकर भी उनकी तुलना नहीं होगी बल्कि यह मान लिया जायेगा कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार केवल राहुल गांधी ही हैं। 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस की सोनिया गांधी लगातार 19 वर्षों तक अध्यक्ष रही हैं। कांग्रेस को 2004 में वापस सत्ता में लाने का श्रेय सोनिया को ही जाता है। 1999 के लोकसभा चुनाव में 114 सीटों और 2014 में 44 सीटों के साथ कांग्रेस की सबसे बुरी हार के समय भी सोनिया ही पार्टी की अध्यक्ष थीं। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बावजूद पार्टी उनका सम्मान बरकरार रखते हुए उन्हें पार्टी की आजीवन संरक्षक घोषित कर सकती है। असल में कांग्रेस के दिग्गज नेता 2019 के लोकसभा चुनाव तक पार्टी संरक्षक के तौर पर उनकी मौजूदगी चाहते हैं। राहुल को सोनिया की कार्यशैली से सीखने की जरूरत है ताकि सहयोगी दलों से तालमेल करने में सुविधा हो। सोनिया गांधी ने जहां सहयोगी दलों के साथ अच्छा तालमेल रखा वहीं पार्टी के कई खेमों में बंटा होने के बावजूद पार्टी को एकजुट रखने में सफलता पाई है। सोनिया गांधी ने हर राजनीतिक चुनौती का सामना समझदारी से किया और पार्टी को लगातार एकजुट रखा। जिस वक्त सोनिया गांधी ने पार्टी की जिम्मेदारी संभाली थी, उस वक्त भी पार्टी छिन्न-भिन्न थी और भाजपा लगातार मजबूत हो रही थी लेकिन सोनिया ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी को हराने के लिए अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के साथ मजबूत गठबंधन बनाया था।
अब 47 साल के राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने युवा प्रशंसकों को वोट में बदलने की है। कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी चुप्पी विपक्ष को उन पर हमला बोलने का मौका देती है। इसके अलावा सहयोगी संगठनों को मजबूत करने और पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने की जिम्मेदारी भी उन पर है। पार्टी छोडक़र गये नेताओं को फिर से पार्टी में शामिल कराकर एकजुट करने की जिम्मेदारी भी उन्हें निभानी होगी।
राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती बूढ़ी हो चुकी कांग्रेस का फिर से कायाकल्प करना है। उन्हें अब अपनी नई टीम चुननी है। पुरानी कांग्रेस के ज्यादातर धुरंधर बूढ़े हो चुके हैं। अब तक राहुल गांधी के करीब दो लोग नजर आते हैं वह भी वंशवाद की ही उपज हैं। अब राहुल गांधी को उस कोठरी से बाहर निकलकर जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को तरजीह देनी होगी। हवाई नेताओं और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता और 2019 में तो उनका सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी से होगा। राहुल गांधी को अब विशेष एहतियात बरतनी होगी। राहुल गांधी की क्षमता अब तक किसी ने नहीं देखी है। वह अब तक पर्दे के पीछे रहकर काम करते रहे हैं लेकिन अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को आगे बढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। राहुल गांधी को देशभर से क्षमतावान नेताओं की तलाश कर उन्हें जिम्मेदारी सौंपनी होगी ताकि 2019 का लोकसभा चुनाव अवधारणा के बल पर नहीं बल्कि भाजपा को जमीनी हकीकत पर लडऩा पड़े।
मार्च 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी के विदेशी मूल को मुद्दा बनाकर भाजपा ने खूब हल्ला बोला था और बोफोर्स का मुद्दा दोबारा उछालकर उन्हें घेरने की कोशिश की थी। सोनिया के पार्टी अध्यक्ष बनने के बावजूद पार्टी हार गई थी लेकिन तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कांग्रेस को मजबूत करने में जुटी रहीं और अंतत: पार्टी 10 साल तक लगातार सत्ता में रही। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद मुख्य विपक्षी दल उन्हें घेरने के लिए तमाम कोशिश करेंगे। परिवार एवं राजीव गांधी पर लगे आरोप फिर से हवा में उछलेंगे। राबर्ट वाड्रा और बोफोर्स का जिन्न फिर बोतल से बाहर आयेगा लेकिन राहुल गांधी को परिपक्वता दिखानी होगी।
जनता सत्तारूढ़ भाजपा की कथनी और करनी को परख रही है। बड़े-बड़े दावे और वादे सब हवा-हवाई हो रहे हैं। मतदाता अब भेड़चाल में चल कर वोट नहीं करता, काम की परख करता है। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के वायदे करके सत्ता में आई भाजपा को बेरोजगारी मुंह चिढ़ा रही है। महंगाई और मंदे काम-धंधों से हर कोई परेशान है लेकिन मंत्री गाल बजा-बजाकर सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं। वित्त मंत्री अरूण जेटली पेट्रोल और डीजल से 2 रुपए एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकारी खजाने को 13 हजार करोड़ रूपए का घाटा होने का रोना रो रहे हैं लेकिन वह यह नहीं बता रहे हैं कि एक्साइज डयूटी में 12 रूपए की बढ़ोतरी से सरकार को कितने लाख करोड़ का फायदा हुआ है जो बजट प्लान का हिस्सा ही नहीं है। यह एक्साइज ड्यूटी तब-तब सरकार ने बढ़ाई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटीं हैं लेकिन सरकार ने आम जनता को घटी कीमतों का लाभ न देकर उसका सारा लाभ खुद कमाया है और ऐसा करके आम जनता से छल किया है।
कांग्रेस के नए अध्यक्ष को राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में महारत हासिल करनी होगी। एक तरफ जहां पार्टी को अपनी खोई हुई जमीन दोबारा हासिल करनी है वहीं सत्तारूढ़ भाजपा की हर नाकामी तथा चालाकी को जनता के सामने शीशे की तरह रखना होगा तभी वह रचनात्मक विपक्ष की भूमिका अदा कर पायेगी और जनता के मन में पैठ कर पायेगी। अब तक विपक्ष सत्तारूढ़ भाजपा के सामने कोई चुनौती नहीं रख पाया है। हालांकि गुजरात चुनाव में भाजपा हांफती हुई लग रही है। प्रधानमंत्री समेत तमाम दिग्गज मैदान में हैं और राहुल गांधी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। राहुल गांधी की सभाओं में जुटती भीड़ इस बात की गवाही दे रही है कि लोग उन्हें चाहते हैं लेकिन प्रादेशिक नेतृत्व में भी हीरे तलाशने होंगे। गुजरात और हिमाचल में बेशक कांग्रेस न जीते लेकिन कांग्रेस की मजबूती राहुल के लिए 2019 का संदेश जरूर होगी।

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