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बदइन्तजामी से नेपाली सितारों की बेइज्जती

राजेश हमाल के कार्यक्रम में खाली रहा पंडाल
> आयोजकों से खफा दिखे कलाकार और लोग
> पेशेवर आयोजन के लिए दिया सेना का मैदान

देहरादून। देहरादून में डाकरा कैंट में नेपाल के कलाकारों की जैसी बेइज्जती हुई, उसकी मिसाल पहले कभी नहीं मिली। न तो कलाकारों के प्रदर्शन पर ताली बजाने वाले थे और न ही आयोजन स्थल पर इतने लोग ही थे कि कलाकार खुशी-खुशी अपने हुनर का प्रदर्शन करते। देहरादून को नेपाल में बहुत सम्मान हासिल है। इसकी कई वजह है। इसके चलते नेपाल के कलाकार हो या कोई भी अन्य व्यक्ति देहरादून आने को बेहद उत्सुक ही नहीं रहते बल्कि बहुत उम्मीदों के साथ आते हैं। नेपाल के सुपर स्टार में राजेश हमाल का नाम लिया जाता है और लम्बे समय तक उन्होंने नेपाली फिल्म उद्योग में बतौर महानायक राज किया है। उनको तब बहुत निराशा हुई जब वह आयोजन स्थल पर पहुंचे और मु_ी भर लोग ही वहां थे। उनसे पहले पहुंचे कलाकार भी बहुत निराश हुए। पूरा पंडाल खाली था और जब वे अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे तो तालियों तक के लिए वे तरस गए।
हमाल को नेपाल का मिथुन चक्रवर्ती भी कहा जाता है। लम्बे समय तक उन्होंने वहां के सिल्वर स्क्रीन पर एकछत्र राज किया है। राजेश ने अपने वक्तव्य में अपनी निराशा को जाहिर भी कर दी। उन्हें जब बोलने का मौका मिला तो कह दिया कि देहरादून के बारे में उन्होंने सुना था कि यह दूसरा नेपाल है, लेकिन पंडाल खाली देख कर उनको निराशा और ताज्जुब हुआ। हमाल को कई गानों पर प्रदर्शन करना था, लेकिन माहौल न होने के कारण कुछ मिनट बाद ही उन्होंने अपना प्रदर्शन खत्म कर दिया। उन्होंने चंद गानों पर ही नृत्य पेश किये। अपनी फिल्मों के कुछ संवाद भी बोले। नेपाल की नायका निशिता शाही और अन्य कलाकारों का प्रदर्शन भी अधिक देर नहीं चला। जब दर्शक बिल्कुल भी नहीं आए तो शाम को प्रवेश निशुल्क कर दिया गया,लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और लोग फिर भी नहीं आए। वैसे ज्यादातर लोगों को आयोजन के बारे में प्रचार के अभाव में कुछ पता ही नहीं था।
मुख्य अतिथि मसूरी विधानसभा के विधायक गणेश जोशी ने भी दाद देने वालों और दर्शकों की गैर मौजूदगी तथा खाली पंडाल को नोटिस किया। उन्होंने इस पर नेपाली कलाकारों के सम्मुख खेद जताया और कहा अगली बार वह खुद काठमांडू जाकर उनको निमंत्रित करेंगे। तब आयोजन भव्य होगा। आयोजन भारत-नेपाल मैत्री के नाम पर सेना के महेंद्र ग्राउंड पर किया गया। सेना के इस फैसले पर भी इसलिए ऊंगली उठाई जा सकती है कि इस आयोजन का मकसद पैसा कमाना था। इसके लिए बाकायदा टिकट बेचे गए। इसकी जानकारी कर महकमे को भी नहीं थी। सेना से जब खेल प्रतियोगिता के आयोजन के लिए मैदान मांगा जाता है तो अनेक तरह से आयोजकों को परेशान किया जाता है। ऐसे कई मौके आए हैं जब सेना के सब एरिया मुख्यालय ने बिना कोई वजह बताये प्रतियोगिता की समाप्ति के बाद गारंटी मनी तक नहीं लौटाई। सेना का महेद्र ग्राउंड, जिस पर नेपाल के कलाकारों का व्यावसायिक आयोजन किया गया था, को सेना का व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए दिया जाना, उसके फैसले पर ऊंगली उठाता है। हैरानी की बात यह है कि ब्रिटिश युग में जिस मैदान का इस्तेमाल सेना के जवानों की परेड और कसम परेड के लिए होता था, उसका इस्तेमाल करने की अनुमति अब खेल आयोजकों का बामुश्किल मिलती है। इसके बजाए सेना अन्य आयोजनों के लिए मैदान खुशी-खुशी दे देती है। नेपाल के नामी कलाकारों के देहरादून आने का प्रचार भी नहीं किया गया था।
आयोजकों ने गोरखाली समाज के प्रमुख लोगों को भी विश्वास में नहीं लिया। इसके कारण लोग आयोजकों से नाराज दिखे। उनका कहना था कि बाहरी कलाकारों के साथ इस तरह का बर्ताव होने से खुद गोरखाली समाज की भी गरिमा गिरती है। सिर्फ पैसे कमाने के लिए इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए।

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