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ट्रिपल इंजन का फायदा तो मिले

जब राज्य में बीजेपी की और केंद्र में यूपीए की सरकार थी तो खूब ग्रीन बोनस मांगा जाता था। तकरीबन 20 हजार करोड़ रूपये का। मुख्यमंत्री थे डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक। उनका दावा वाजिब से ज्यादा जरुरत जैसा दिखता था। जिस राज्य के पास राजस्व के लिए स्रोत अधिक न हो और सिर्फ खनन, शराब और कर ही साधन हो, उसके लिए कहीं न कहीं से पैसे जुटाने की कोशिश करना कहीं से भी अनुचित या अव्यवहारिक नहीं था। निशंक और बीजेपी ग्रीन बोनस का मुद्दा इसलिए भी उठाते रहे कि इसके बहाने वे कांग्रेस पर हमला कर रहे थे। खैर, यूपीए विदा हुआ और बीजेपी जबरदस्त बहुमत के साथ केंद्र में आसीन हुई। लगा ग्रीन बोनस अब वक्त की बात है। यह बात अलग है कि तब सरकार उत्तराखंड में कांग्रेस की आ गई थी और बोनस मिलना तो दूर, पुराने वायदे भी केंद्र से पूरे होने मुश्किल हो गए।
धानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दिग्गज नेता उत्तराखंड में विधानसभा चुनावों के दौरान कहते थे कि जब तक आप डबल इंजन नहीं लगाओगे विकास नहीं होगा। डबल यानि केंद्र में तो बीजेपी है ही राज्य में भी कांग्रेस को भगा कर कमल खिलाओ। देवभूमि के लोगों ने यकीन कर लिया और कमल खिलाने के लिए हाथ को लकवे के शरण में भेज दिया। अब उम्मीद लगाए बैठे हैं उत्तराखंड के लोग कि डबल इंजन का जलवा कब दिखाई देगा। हकीकत तो यह है कि इंजन दोहरा न हो के तिहरा है। उत्तर प्रदेश जिससे टूटकर उत्तराखंड बना और जिसके साथ आज भी उत्तराखंड के कई मामले चल रहे हैं, में भी बीजेपी ही है। इसके चलते उम्मीद की किरण जाग उठी है कि अब उत्तर प्रदेश से जुड़े मुद्दे भी न सिर्फ आसानी से हल होंगे बल्कि उत्तराखंड के साथ वह बड़े भाई का नाता निभाएगा और उसको कई सौगातें देगा। क्या वाकई!
ऐसा हो तो सकता है लेकिन न तो केंद्र से और न ही उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को कोई खास मदद या तिहरे इंजन का असर जैसा देखने को मिल रहा है। जब राज्य में बीजेपी की और केंद्र में यूपीए की सरकार थी तो खूब ग्रीन बोनस मांगा जाता था। तकरीबन 20 हजार करोड़ रूपये का। मुख्यमंत्री थे डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक। उनका दावा वाजिब से ज्यादा जरुरत जैसा दिखता था। जिस राज्य के पास राजस्व के लिए स्रोत अधिक न हो और सिर्फ खनन, शराब और कर ही साधन हो, उसके लिए कहीं न कहीं से पैसे जुटाने की कोशिश करना कहीं से भी अनुचित या अव्यवहारिक नहीं था। निशंक और बीजेपी ग्रीन बोनस का मुद्दा इसलिए भी उठाते रहे कि इसके बहाने वे कांग्रेस पर हमला कर रहे थे। खैर, यूपीए विदा हुआ और बीजेपी जबरदस्त बहुमत के साथ केंद्र में आसीन हुई। लगा ग्रीन बोनस अब वक्त की बात है। यह बात अलग है कि तब सरकार उत्तराखंड में कांग्रेस की आ गई थी और बोनस मिलना तो दूर, पुराने वायदे भी केंद्र से पूरे होने मुश्किल हो गए। इसका सबसे बड़ा उदहारण देहरादून का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम है। ढाई सौ करोड़ रूपये के इस अहम प्रोजेक्ट में ओएनजीसी ने 50 करोड़ रूपये कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी फण्ड से देने थे। केंद्र में सरकार बीजेपी की आ गई और यह पैसा अटक गया। जिसकी आशंका भी थी। आखिर राजीव गांधी के नाम के स्टेडियम को बीजेपी सरकार भला क्यों पैसा देती। कांग्रेस सरकार चुनाव में हार के बाद चली गई तो लगा कि अब तो पैसा मिलना सिर्फ वक्त की बात है। त्रिवेंद्र सरकार आ गई लेकिन आज भी यह पैसा अटका हुआ है। ग्रीन बोनस तो दूर की बात है। दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं दिखती कि यह कभी मिलेगा भी। यह मांग एक किस्म से बेमौत मर चुकी है।
दोनों राज्यों के बीच परिवहन सम्बन्धी करार भी तभी से लटका हुआ है जबसे उत्तराखंड का गठन हुआ। इसके चलते कई तरह की समस्याएं और दिक्कतें उत्तराखंड को हो रही है। इसमें बसों के फेरे और परमिट सम्बन्धी मामले हैं, जो लटके हुए हैं। करार को लेकर कई बार तारीखें तय होती रही हैं लेकिन हर बार उत्तर प्रदेश की तरफ से इसको लटकाया जाता रहा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के साथ ही यह योगी आदित्यनाथ जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो यह उम्मीद मजबूत हो गई कि उत्तराखंड को अब काफी आसानी होंगी, लेकिन योगी से भी उत्तराखंड को कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा है। योगी ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं प्रदर्शित किया है, जिससे लगे कि उत्तराखंड के साथ उनका विशेष स्नेह है। इतना ही नहीं हरिद्वार का होटल अलकनंदा का कब्जा उत्तराखंड को देना भी अभी तक उत्तर प्रदेश का गवारा नहीं हो रहा है। यह मामला उच्चतम न्यायालय में चल रहा है। उत्तर प्रदेश चाहे तो यह मामला अदालत के बाहर खत्म हो सकता है। इसके बावजूद वह इस होटल और हरिद्वार के वीआईपी घाट पर कब्जा छोडऩे को राजी नहीं हो रहा है।
यह तो बात हो रही है उत्तर प्रदेश से जुड़े मुद्दों पर। केंद्र की मोदी सरकार भी लगता है वह वादा भूल गई है जो प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनाव के दौरान किये थे यानि, डबल इंजन का फायदा देने का। उत्तराखंड में 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जंगल है। औद्योगिक निवेश भी प्रभावित हो रहा है। जीएसटी और नोटबंदी ने हालत और खराब कर दी है। केंद्र सरकार उस उत्तराखंड में अपनी सरकार होने के बावजूद कोई अतिरिक्त मदद देती नजर नहीं आ रही, जो चीन और नेपाल की सीमा पर है। कभी उत्तराखंड को न सिर्फ विशेष औद्योगिक पैकेज मिला हुआ था बल्कि अधिकतर योजनायें 90:10 में मिली हुई थी। यानि, 90 फीसदी पैसा केंद्र सरकार का और सिर्फ 10 फीसदी पैसा ही राज्य सरकार का लगता था। बीजेपी के नेता दावा करते थे कि डबल इंजन लगा तो यही योजना फिर से लागू होगी। इसका फायदा राज्य के विकास में होगा। आज आलम यह है कि केंद्र सरकार सिर्फ 50:50 फीसदी में ही योजनायें देने को राजी दिखती है। हाल ही में एक योजना का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था। शहरी विकास से जुड़ी योजना थी। केंद्र ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसमें राज्य सरकार ने अपनी खस्ता आर्थिक स्थिति को आधार बना कर केंद्र से 90:10 के अनुपात में मंजूरी देने का अनुरोध किया था। उत्तराखंड को डबल इंजन का फायदा देने को केंद्र कहीं से राजी नहीं दिखाई दिया।
केंद्र में अगर राज्य का कोई मजबूत प्रतिनिधि हो तो बहुत मदद कई मामलों में मिलती है। जब वाजपेयी सरकार थी तो बीसी खंडूड़ी पहले राज्यमंत्री फिर कैबिनेट मंत्री बने थे। खंडूड़ी ने उत्तराखंड को कई राष्ट्रीय राजमार्ग दिए। देश भर में इतना काम अपने मंत्रालय में किया कि उनके साथ ही उत्तराखंड का भी खूब नाम हुआ था। आज भले राज्य से बीजेपी को पांचों लोक सभा सीटें मिली हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व के नाम पर सिर्फ अजय टम्टा को राज्यमंत्री बनाया हुआ है, वह भी तकरीबन महत्वहीन महकमे का। टम्टा की प्रतिष्ठा ऐसी है भी नहीं कि केंद्र सरकार में उत्तराखंड के मुद्दों को मजबूती से उठा सके या फिर केन्द्रीय नेतृत्व के सामने यहां के मामलों को पूरी ताकत के साथ उठायें। उनको मंत्रिपरिषद में रख कर मोदी ने कोई अहसान उत्तराखंड में नहीं किया है। जिस राज्य से सौ फीसदी सीटें पार्टी को मिली हों और राज्य की सीमाएं दो देशों से मिलती हों और कई तरफ की दिक्कतें राज्य के सामने हो तो केंद्र से राज्य को अधिक अपेक्षाएं होना स्वाभाविक है।
बेहतर होता टम्टा को मंत्रिमंडल में शरीक किया जाता या फिर एक और नाम को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता। भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. निशंक सशक्त प्रतिनिधित्व राज्य को देने में पूरी तरह सक्षम हैं। खंडूड़ी बुजुर्ग मान लिए गए हैं और महारानी माला राज्यलक्ष्मी को नेतृत्व मंत्री बनाने लायक शायद नहीं समझता है, इसलिए वैसे भी ये दो नाम ही बचते हैं। कहने का मतलब यह कि एक ही नाम को मंत्री बनाते, लेकिन कम से कम कैबिनेट का दर्जा तो मिलता। विडंबना है कि ऐसा कुछ न तो हो रहा है और न होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में कैसे मान लें कि उत्तराखंड को डबल इंजन का फायदा मिल रहा है या मिलेगा। ये तो छल जैसा लग रहा कुछ। उम्मीद है कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव के नतीजों के बाद मोदी इस दिशा में कुछ ध्यान देंगे।

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