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स्मार्ट सिटी के लिए सरकार तो स्मार्ट बने

न दफ्तर, न स्टाफ, न जीओ सीईओ के पास अधिकार तक नहीं

देहरादून। बामुश्किल स्मार्ट सिटी का तमगा हासिल कर पाने वाले देहरादून के लिए लगता है चुनौतियां अभी बहुत है। पहले केंद्र सरकार ने देहरादून को लटकाए रखा और जब वह मेहरबान हुई तो राज्य सरकार न जाने किस नींद में है। अभी तक न तो स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को काम करने के लिए अधिकार दिए गए हैं और न ही उनको दफ्तर ही मिला है। जब दफ्तर ही न हो तो फिर स्टाफ मिलने का सवाल ही नहीं। तीन महीने का अरसा गुजर चुका है लेकिन ऐसा कहीं नहीं लगता कि सरकार को स्मार्ट सिटी पर कार्य जल्दी करने को लेकर जल्दबाजी है। हालात यह है कि देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने का ख्वाब देखने वाली सरकार को पहले स्मार्ट बनना होगा।
देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए राज्य सरकार ने क्या-क्या नहीं किया था। कई बार प्रस्ताव बनाये और केंद्र सरकार को भेजे गए। केंद्र में बीजेपी और राज्य में कांग्रेस सरकार होने के कारण वैसे भी गुंजाइश कम थी कि देहरादून को स्मार्ट सिटी का दर्जा मिलेगा,पर जब उत्तराखंड में बीजेपी सरकार आई तो इसकी पूरी उम्मीद बंध गई थी कि देहरादून को स्मार्ट सिटी योजना में जरूर शरीक किया जाएगा। ऐसा हुआ भी। त्रिवेंद्र सरकार ने आते ही फिर से प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा और इस बार देहरादून को स्मार्ट सिटी योजना में शामिल कर लिया गया। मौजूदा सरकार ने स्मार्ट सिटी परियोजना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भी बदला और दिलीप जावलकर को यह जिम्मेदारी सौंप दी। वह गढ़वाल मंडल के आयुक्त भी हैं। कांग्रेस राज में आर मीनाक्षी सुन्दरम इस जिम्मेदारी को संभाले हुए थे।
इस योजना को साकार करने के लिए उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार को बराबर 500-500 करोड़ रूपये खर्च करने हैं। इसके कारण भी यह शंका उठती है कि क्या यह योजना परवान चढ़ पाएगी। केंद्र सरकार ने अधिकतम 500 करोड़ रूपये ही देने हैं। हर साल सौ करोड़ रूपये। पांच साल की यह परियोजना है। जितने पैसे केंद्र को देने हैं उतने ही राज्य सरकार को खर्च करने हैं। राज्य सरकार आर्थिक मोर्चे पर पहले ही खस्ता हाल है। ऐसे में हर साल 100 करोड़ रूपये इस योजना के लिए निकालना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं होगा। वैसे स्मार्ट सिटी के लिए 100 करोड़ रूपये बहुत ज्यादा नहीं है। इतने कम पैसे में फ्लाई ओवर, पार्किंग्स, सडक़ें, लाइट्स, पार्क, सौन्दर्यीकरण, अंडरपास और ढेर सारी शिफ्टिंग कर पाना स्मार्ट सिटी सीईओ के लिए कतई आसान नहीं होगा। अभी यह बजट भी मिलना तो दूर शासनादेश तक नहीं हुआ है।
शासनादेश के बाद ही सीईओ को कार्य करने के लिए अधिकार हासिल होने हैं। अभी सीईओ महज नाम के सीईओ हैं। उन्होंने हालांकि, शुरूआती दौर के काम शुरू कर दिए हैं, लेकिन सचिवालय स्थित अपने दफ्तर से ही काम कर रहे हैं। उनको अभी तक स्मार्ट सिटी परियोजना का दफ्तर और स्टाफ दोनों ही नहीं दिए गए हैं।
बिना दफ्तर और पैसे के स्मार्ट सिटी योजना पर काम आगे बढ़ेगा, यह सोचना भी फिजूल होगा। शासनादेश क्यों रुका हुआ है और सरकार इस पर देरी क्यों कर रही है, अभी यही साफ नहीं हो पा रहा है। शहरी विकास विभाग को शासनादेश जारी करना है। अभी इस पर कितना वक्त और लगेगा, यह साफ नहीं है। यूं भी स्मार्ट सिटी परियोजना में पूरा शहर शामिल नहीं किया गया है। तकरीबन दो किलोमीटर के दायरे में शामिल वार्डों को ही इसमें शामिल किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक पैसा इतना कम है कि इसमें अधिक वार्ड और क्षेत्र शामिल हो भी नहीं सकता है। जिस तरह केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी को लेकर हंगामा बरपा रखा है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह परियोजना ऊंची दूकान फीका पकवान साबित होने वाली है।

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