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कंगाली के दौर में करोड़ का इजाफा

विधायक निधि बढ़ा तो दी लेकिन इसका ज्यादा फायदा नहीं

देहरादून। उत्तराखंड सरकार हमेशा रोना रोती रहती है कि उसके पास पैसे की कमी है और कमाई भी बहुत कम हो चुकी है। खास तौर पर जीएसटी और नोटबंदी ने सरकार की कमाई पर बहुत अधिक नकारात्मक असर डाला है। ऐसे दौर में सरकार ने विधायक निधि को सीधे एक करोड़ रुपये बढ़ा दिया तो सवाल उठाना लाजिमी है कि ऐसे वक्त में आखिर इसकी कितनी जरुरत थी। वैसे तो पूरी निधि को लेकर ही ऊंगली उठती रहती है कि यह न सिर्फ कमीशनखोरी का बेहतरीन जरिया बन चुका है बल्कि इस मद से होने वाले निर्माणों की गुणवत्ता भी घटिया होती है। इसके बावजूद सभी विधायक, चाहे वे किसी भी दल के हों, निधि में इजाफे को लेकर हमेशा एकमत रहते हैं। लड़ाई के लिए उनके पास दुसरे मुद्दे रहते हैं। विधायक निधि नहीं।
विधायक निधि अभी तक 2.75 करोड़ रूपये थी। इसको भी काफी समझा जाता था। खास तौर पर यह देखते हुए कि मैदानी जिलों में जहां, विधानसभाएं भौगोलिक तौर पर काफी छोटी हैं और केंद्र तथा राज्य सरकार की कई विकास योजनायें एक साथ चल रही हैं। पहाड़ों में भले विधानसभा क्षेत्र भौगोलिक तौर पर बड़े हैं, लेकिन वहां भी सरकारों की कई योजनायें चल रही हैं। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल ने विधायक निधि को बढ़ाकर अब 3.75 करोड़ रूपये कर दिया है, जो निश्चित रूप से बहुत अधिक कही जा सकती है। सरकार के इस फैसले की तारीफ इसलिए भी नहीं की जा सकती है कि अभी सरकार की आर्थिक स्थिति खस्ता है। विधायक निधि को लेकर आम तौर पर यह दावे किए जाते रहते हैं कि इसमें कमीशन 50 फीसदी तक बांटे जाते हैं जो ठेके दिलाते है और जिनके जरिये ठेके मिलते हैं, सभी को इसमें भरपूर मलाई खाने को मिलती है।
सरकार ने जिस तरह अगेती किस्म के गन्ने का मूल्य भी बढ़ा कर 326 रूपये कर दिया, जो उत्तर प्रदेश से एक रूपये ज्यादा है। कुल नौ रूपये का इजाफा सरकार ने प्रति कुंतल किया। इस फैसले को लोकप्रिय फैसला लेने का दबाव माना जा रहा है। मंत्रिमंडल की बैठक में दो और अहम फैसले भी हुए, जिस पर शक की सुई उठती है। मसलन सितारगंज की चीनी मिल को पीपीपी मोड में देने का फैसला और पर्यटन महकमे में केदारनाथ में पुनर्निर्माण कार्य को टुकड़ों में बांट कर ठेके दिया जाना।
चीनी मिल को बगैर खुद ही चलाने की बेहतर और नई कोशिश करने के बजाए निजी हाथों में सौंप दिया जाना, सरकार का आत्मसमर्पण कहा जाएगा। इतना ही नहीं पुनर्निर्माण कार्यों को ठेके में देने के लिए उसको छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना एक किस्म से सिर्फ स्थानीय चहेते किस्म के ऐसे ठेकेदारों को ठेका देने की कोशिश कही जा सकती है, जो बाहरी बड़ी लेकिन सक्षम और काबिल कंपनियों का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। निर्माण कार्यों में इस किस्म की सरकार की कोशिश भविष्य में गुणवत्ता के चलते नुकसान पहुंचा दे तो अचम्भा नहीं होगा। औली में शीतकालीन खेल होने हैं। इसके लिए कई किस्म की उपकरण सरकार खरीदने वाली है। इसकी खरीद में भी कई तरह की छूट सरकार ने दे दी। इससे भी भविष्य में कई तरह के विवाद और भ्रष्टाचार के मामले उठ सकते हैं। वैसे भी ये आयोजन पूरी तरह खेल संघ का है। इसमें सरकार का नए उपकरणों पर खर्च करना, वह भी सरकार की राय के बगैर उचित नहीं कहा जाएगा। सरकार ने शराब निर्माण की ड्यूटी जरूर बढ़ा दी, जिससे उसको कुछ कमाई अतिरिक्त रूप से होगी। बेशक, शराब के शौकीनों के लिए यह बहुत बड़ा झटका साबित होगा। ड्यूटी बढऩे से कीमत बढऩी तय है।

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