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संत दामाजी की दया पर एक बादशाह भरी सभा में हुआ शर्मिंदा

तेरहवीं शताब्दी में भारत में भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों गोलकुंडा-बेदरशाही के अंतर्गत मंगलबेड़ा प्रांत का कारोबार संत दामाजी के जिम्मे था। अकाल में भूखे लोगों की चीत्कार उनसे सुनी न गई और उन्होंने बादशाह की अनुमति के बगैर अन्न भंडार प्रजा के लिए खोल दिया। संत दामाजी के सहायक सूबेदार से यह न देखा गया। उसने मामला बादशाह को पत्र लिखकर बताया तो बादशाह ने सिपाहियों को दामाजी को पकड़ लाने की आज्ञा दी। तभी हाथ में थैली और कंधे पर कंबल लिए एक किशोर बादशाह के दरबार में आया और बताया कि वह मंगलबेड़ा में दामाजी पंत के पास से आया है।
बादशाह ने उसके आने का उदï्देश्य पूछा। किशोर ने जवाब दिया कि उसका नाम बिठू है और वह दामाजी की दया पर पला है। उसने कहा- आपकी प्रजा भूख से मर रही थी और आपकी अनुमति लेने में विलंब होता इसलिए उन्होंने भंडार खोलकर सबके प्राण बचाये। मैं उसी अन्न का मूल्य चुकाने आया हूं। कृपया इसे सरकारी खजाने में जमा करें। यह सुनकर बादशाह को बड़ा पश्चाताप हुआ कि उन्होंने व्यर्थ ही एक बेकसूर को बंदी बनाने की आज्ञा दी।
उधर खजांची ने जैसे ही उसकी थैली उड़ेली, वह फिर भर गई। उसने फिर उड़ेली, वह फिर भर गई। इस तरह दो-तीन बार हुआ। आखिर उसने अनाज की पूरी कीमत गिनकर बाकी उसे लौटा दिए। उसके जाने के बाद खजांची ने वह बात बादशाह को बताई। बादशाह से न रहा गया। वह बिठू के दर्शन के लिए उतावला हो गया और तुरंत मंगलबेड़ा के लिए रवाना हुआ। वहां पहुंचने पर उसने दामाजी से बिठू को बुलाने को कहा। दामाजी की समझ में कुछ भी न आया। तब बादशाह ने पूरा किस्सा सुनाया। दामाजी ने बादशाह से कहा कि वे बड़े ही भाग्यवान हैं, जो स्वयं भगवान ने उन्हें दर्शन दिए।

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