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दो दिन की चांदनी पर करोडों कुर्बान

देहरादून। बहुत शोर होता है कि गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाया जाए। यह बात जुदा है कि दिल से पूछे तो खुद प्रदेश की ज्यादातर आबादी इसके हक में नहीं होगी। इनमें आम लोग ही नहीं बल्कि मंत्री, विधायक, नौकरशाह और कारोबारी तथा बड़ी कम्पनियां भी शामिल हैं। पहाड़ और मिट्टी के साथ ही पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले भी नहीं चाहते हैं कि राजधानी को देहरादून से कहीं ले जाया जाए। ऐसा भूकंप के नजरिये से इसके बहुत संवेदनशील होने के चलते माना जाता है। नई राजधानी बसाने पर होने वाला खर्च तो कारण है ही। सरकार चाहे बीजेपी की हो या फिर कांग्रेस की, किसी की मंशा देहरादून से राजधानी को गैरसैण ले जाने की कभी नहीं रही। व्यावहारिक रूप से भले यह सही हो, लेकिन हकीकत यह है कि राजधानी बहुत संवेदनशील मुद्दा है जो मन से नहीं भी चाहते हैं वे भी राजधानी गैरसैण ले जाने का खुल कर विरोध नहीं करते हैं या फिर साहस नहीं कर पाते हैं। यही वजह है कि बीजेपी की सरकार भी गैरसैण करती रहती है पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही है कि उसको स्थाई राजधानी बनाया जाए। बीच का रास्ता निकालते हुए उसने गैरसैण को गर्मियों की राजधानी बनाने का ऐलान किया है लेकिन लगता है यह भी सिर्फ राजनीतिक मजबूरी भर बन कर रह जाने वाला है। सरकार का गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का फैसला आलोचना के घेरे में रहा है। आलोचक कहते हैं कि राज्य को दो राजधानी क्यों चाहिए?

इससे तो बेहतर है कि गैरसैण को स्थाई बना दो या फिर देहरादून को ही इकलौती राजधानी रहने दो। दिखावा करने के लिए क्यों आम लोगों के टैक्स के पैसे को बर्बाद किए जा रहे हैं। जिस तरह सरकार और विपक्ष की कोशिश के चलते भराड़ीसैण में सिर्फ दो दिनों में ही ग्रीष्मकालीन विधानसभा सत्र निबटा दिया गया, उससे जाहिर होता है कि भराड़ीसैण को स्थाई राजधानी बनाना तो दूर कुछ दिन के सत्र के लिए भी राजनेता और सरकार अंदरखाने उसको स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हैं। सत्र के दौरान जब गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पवार ने सदन का बहिष्कार किया तो उनके साथ कोई बाहर नहीं गया। इतना ही नहीं। सत्र पर करोड़ों रूपये खर्च हो गए और मिला क्या? सिर्फ तबादला कानून। बाकी तो साधारण ही मुद्दे थे। इसके लिए करोड़ों रूपये खर्च तो हुए ही, सरकार में कामकाज सचिवालय स्तर पर पूरी तरह बंद रहा अगर सत्र को दो दिन की चांदनी और सिर्फ अंधेरी रात कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
मंत्रियों और अफसरों को भले भराड़ी सैण जाने में औरों की तरह दिक्कत नहीं हुई। उनको पहले ही भेज दिया गया था। कुछ हेलीकॉप्टर से गए और जिनका जुगाड़ नहीं हो पाया वे सडक़ मार्ग से पहुंचे। एक ऐसी जगह जहां मंत्रियों, विधायकों और अफसरों को छोड़ दिया जाए तो बाकी लोगों के लिए न खाने की व्यवस्था सही थी न ही रहने का ही बंदोबस्त था। पत्रकारों को भी सत्र स्थल से बेहद दूर ठहरना पड़ा। सत्र में तबादला कानून को मंजूर कराया गया बाकी ऐसा कुछ काम नहीं हुआ। तबादला कानून को छोड़ दिया जाए तो 3015 करोड़ रूपये के अनुपूरक बजट को पास कराना कोई बड़ी बात सरकार के लिए नहीं थी। यह तो पास होना ही था। हैरानी की बात है कि लोकायुक्तबिल एक बार फिर पास नहीं हुआ। सरकार चाहती तो इसको पास कराना आज की तारीख में बाएं हाथ का खेल है। इससे जाहिर होता है कि सरकार खुद इसको लटकाना चाहती है। प्रवर समिति को सौंप कर वह इसको लटका ही रही है। सत्र दो दिनों में भी सिर्फ नौ घंटे 45 मिनट तक ही चला। भराड़ी सैण में सत्र बुलाये जाने के कारण कांग्रेस के विधायक भले खुल कर विरोध में नहीं आए पर वे भी नहीं चाहते थे कि सत्र ऐसी कठिन हालात में चले। उनकी संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पन्त से दूसरे दिन सत्र शुरू होने से पहले हुई मुलाकात के पीछे भी माना गया कि सरकार और विपक्ष ने सत्र को दो दिनों में ही खत्म करने के लिए मिलीभगत कर ली थी।
यह कहना कि भराड़ीसैण में सत्र बुलाना एक राजनीतिक फैसला भर दिखा और इसके राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे, तो अनुचित नहीं होगा। सत्र बुलाने का फैसला राजनीतिक था तो कांग्रेस विधायक भी वहां रुकने को कतई तैयार नहीं थे। बस दोनों मजबूरी की ढफली बजाते रहे और मिल कर सत्र को साढ़े नौ घंटे में ही निबटा कर भराड़ी सैण से ऐसे भागे, जैसे कैदी जेल से छूट कर भागते हैं। ऐसे में यह कहा जाना कि सत्र बुलाने का क्या फायदा रहा, गलत नहीं होगा। इतना ही नहीं सत्र के चलते देहरादून में मंझोले किस्म के अफसरों ने सचिवालय में काम करना पहले से बंद कर दिया था। साथ ही कई तो सत्र स्थल के लिए जल्दी देहरादून से निकल भी गए थे। यह उनके लिए पिकनिक जैसा था। सत्र को जल्दी खत्म करने में भले सत्ता और कांग्रेस पक्ष में सहमति रही हों, पर दोनों पक्ष इसको लेकर राजनीति का मौका नहीं छोडऩा चाहते हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सत्र को उपलब्धि के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि हमने वादा किया था कि गैरसैण में सत्र जरूर बुलायेंगे। वादा पूरा किया। मौसम भले बहुत अनुकूल नहीं था। नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने सत्र जल्दी खत्म होने पर सरकार को निशाने पर लेने में कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सत्र को लम्बा चलाना चाहती थी पर सरकार नहीं चाहती थी। वह विपक्ष के सवालों का जवाब देने को राजी ही नहीं थी। इतना ही नहीं सत्र बुला तो लिया लेकिन इंतजाम ढंग से नहीं किया। सरकार पर इतनी सर्दी में पहाड़ में आधे-अधूरे इंतजामों के साथ सत्र बुलाने के कारण हमले होना स्वाभाविक था। मुख्यमंत्री रावत ने भी माना कि इंतजामों में कमी रह गई, लेकिन उन्होंने इसको कोई बड़ी दिक्कत या सरकार की नाकामी मानने से इनकार कर दिया। सत्र से हट के सोचा जाए तो दो राजधानी बनाने के फैसले पर इसलिए भी सवाल उठाये जा सकते हैं कि राज्य पहले ही आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है। इसके साथ ही भले कुछ महीनों के लिए ही गैरसैण को राजधानी बनाया जाए, लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को वहां जाना तो पड़ेगा ही। इस पर ही अरबों रूपये का अतिरिक्त खर्च पड़ेगा। फिर मंत्री और अफसर गैरसैण कुछ अरसे के लिए ही सही, रहेंगे, लगता नहीं। वे बहाने बनाकर निकल लेंगे। सिर्फ सत्र के लिए ही वे वहां दिखेंगे। यह राज्य के मंत्रियों और नौकरशाहों का अब तक का रिकॉर्ड बताता है। अफसर देहरादून नहीं छोडऩा चाहते और मंत्री अपना विधानसभा क्षेत्र।
नौकरशाहों को देहरादून में रोके रखने में खुद सरकार का भी योगदान रहता है। मंडलायुक्त और गढ़वाल के डीआईजी का मुख्यालय पौड़ी है लेकिन वे देहरादून ही बैठते रहे हैं। आयुक्तों को सचिवों के तौर पर भी जिम्मेदारी दे दी जाती है, जिससे उनको देहरादून रहने का मौका मिल जाए। फिर देहरादून में ही दो विधानसभा, दो सचिवालय पर काम चल रहा है। अभी इसी पर ऊंगली उठ रही है कि एक ही शहर ही दो-दो अवस्थापना सुविधाओं की दरकार क्यों पड़ रही है। मौजूदा सचिवालय के बगल में ही खाली जमीन पर सचिवालय के विस्तार की योजना भी चल रही है। सिर्फ विधानसभा और सचिवालय के निर्माण में ही करोड़ों रूपये की भारी भरकम राशि लगनी तय है। इस पैसे से और कुछ हो न हो, राजनेताओं, अफसरों और ठेकेदारों की चांदी होनी तय है। उनको उनका कमीशन मिल जाएगा। आम लोगों को राहत तब भी शायद ही मिल सके। अभी तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का फैसला कर सरकार कहीं उत्तराखंड पर एक और अनावश्यक बोझ तो खर्च का नहीं डाल देगी। इससे बेहतर विकल्प तो नौकरशाही और सरकारी तंत्र को कसना होता। यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि पहाड़ के विकास के लिए गैरसैण को राजधानी बनाना जरूरी है? क्या जो शहर राजधानी नहीं होते, वे विकास नहीं करते हैं। जब उत्तराखंड राज्य आन्दोलन चल रहा था तो कहा जाता था कि अलग राज्य बने बिना उत्तराखंड का विकास नहीं होगा। उत्तराखंड राज्य बन गया तो कहा जा रहा है कि विकास के लिए पहाड़ में राजधानी जरूरी है। बिना यह सोचे कि क्या भराड़ी सैण राजधानी का बोझ ढो सकेगा। वैसे गैरसैण को राजधानी बनाने को लेकर सरकार की तरफ से ज्यादातर मंत्रियों के मुंह सिले हुए हैं। भराड़ी सैण में भी सिर्फ मुख्यमंत्री और इने-गिने मंत्री ही इस पर बोलने का हक पाए दिख रहे थे। सत्र के दौरान यह मुद्दा खूब चर्चाओं में रहा भी।

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