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जेल जायेंगे सिडकुल के लुटेरे

देहरादून। लुट गया सिडकुल शीर्षक के साथ वीकएंड टाइम्स में खुलासे (2 दिसंबर 17) के बाद सरकार न सिर्फ जागी बल्कि लुटेरों की तलाश और उनको जेल भेजने के लिए मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति का गठन भी कर दिया। उत्पल की प्रतिष्ठा न सिर्फ अच्छी है बल्कि सख्त फैसले लेने के लिए भी वे जाने जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सिडकुल को लूटने वालों में बड़े राजनेता, नौकरशाह, इंजीनियर और ठेकेदार शामिल हैं, लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपनी जीरो टॉलरेंस नीति पर लगातार ऊंगली उठने के बाद इस बार कोई लिहाज करने को तैयार नहीं हैं इसलिए उन्होंने जांच समिति को बारीकी से जांच कर लुटेरों और उनके आकाओं को चिह्नित करने का फरमान सुनाया है। इसके बाद तय लग रहा है कि लुटेरों की शामत आने वाली है। बस यही आशंका जताई जा रही है कि सरकार फटाफट कार्रवाई को अंजाम देती रही। सिडकुल घोटाले पर जांच आयोग की रिपोर्ट के हाल के बाद यह सोचना गलत भी नहीं है। इतना जरूर है कि जांच की आग में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी के भी कई विधायकों और नेताओं के झुलसने की संभावना जताई जा रही है।

उत्तराखंड राज्य गठन के चंद साल बाद ही अस्तित्व में आए सिडकुल ने शुरूआती सालों में देश के बड़े उद्योगों को उत्तराखंड के सितारगंज, देहरादून और हरिद्वार सरीखे शहरों में यूनिट स्थापित करने के लिए आमंत्रित करने और स्थापित करने में सफलता तो पाई साथ ही भ्रष्टाचार की राह भी तैयार कर दी थी। नतीजा यह हुआ कि जिस मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के राज में सिडकुल का गठन हुआ और उद्योगों ने रफ्तार पाई उन्हीं के कार्यकाल में एल्डिको-सिडकुल घोटाला भी हुआ। जब बीजेपी सरकार में आई तो उस वक्त के मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ने जांच आयोग का गठन कर दिया था। यह साल 2007 की बात है। यह रिपोर्ट खंडूड़ी के दो बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद धूल ही खाती रही। किसी भी अफसर, ठेकेदार, इंजीनियर या नौकरशाह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक आईएएस अफसर के खिलाफ सतर्कता जांच की फाइल चली तो उसको भी दफन कर दिया गया। प्रतिनियुक्ति पर आए दो आईएएस अफसरों को जरूर इस घोटाले के बाद वापिस उनके कॉडर भेज दिया गया। कुछ और आईएएस अफसरों पर तब दाग लगे थे। उनमें भी एक प्रतिनियुक्ति वाले थे और एक उत्तराखंड काडर के थे। दोनों का कुछ नहीं बिगड़ा। यह घोटाला तब 400 करोड़ का माना गया था। आज भी यह रिपोर्ट सरकार में जंग खा रही है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र चाहें तो इस पर आज भी कार्रवाई कर सकते हैं।
सिडकुल के अफसरों और नौकरशाहों को सरकार की पिछली जांच रिपोर्ट को लेकर बरती गई लापरवाही और नकारत्मकता ने ही बढ़ावा दिया। उन्होंने जब देखा कि जब पिछली बार जांच आयोग के बावजूद किसी का कुछ नहीं बिगड़ा तो उनका ही क्या बिगड़ सकता है। इसके बाद राजनेताओं, नौकरशाहों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के गठजोड़ ने उस सिडकुल को तकरीबन कंगाल कर डाला और दिवालियापन की हद तक पहुंचा दिया, जिसको प्रदेश में औद्योगिक क्रांति के लिए जाना जाता था। आज सिडकुल के पास अंटी में चवन्नी नहीं है। वह कर्ज लेकर काम कर रहा है। सरकार का पारा तब चढ़ा जब उसको पता चला कि सिडकुल के अफसरों ने आकाओं के इशारों पर ठेकेदारों को साढ़े छह सौ करोड़ तक के निर्माण कार्यों का ठेका बांट दिया, जबकि पैसे हैं नहीं। सितारगंज, काशीपुर समेत अन्य स्थानों पर जहां प्लाटिंग की भी गई वहां प्लाट बिक भी नहीं रहे। नोटबंदी और जीएसटी के युग में अभी प्लाट बिकने की उम्मीद दिख भी नहीं रही। सूत्रों के मुताबिक, अफसरों ने राजनेताओं, जिनमें मंत्री और विधायक भी शामिल हैं, ने महज अपने हिस्से का कमीशन लेने के लिए सिडकुल की तरफ से ठेके खुल कर बांट डाले। उन्होंने अपना कमीशन पहले ही ले लिया, भुगतान भले बाद में होता रहे। भुगतान तो ठेकेदारों को टेंडर मिलने के बाद होना ही है। नहीं तो उनके पास अदालत जा कर पैसा लेने का विकल्प तो है ही।
इस खेल में ऐसा नहीं है कि सिर्फ पिछली कांग्रेस सरकार के लोगों और अफसरों का ही हाथ है। बीजेपी के भी कई नेताओं के नाम ठेकेदार के तौर पर सामने आ रहे हैं। जांच में इन सबका खुलासा हो सकता है। सिडकुल में चल रहे घोटाले के खेल से अभी तक 700 करोड़ रूपये का कारोबार प्रभावित हुआ है। ऐसा सूत्र बता रहे हैं। सिडकुल में जब नई प्रबन्ध निदेशक सौजन्या जावलकर आईं, तो उन्होंने ठेकों और टेंडर के साथ ही कंपनी की बैलेंस शीट को भी गौर से देखा। तब उनका माथा ठनका। फिर जब गहराई से ठेकों और टेंडर का परीक्षण किया तो पारा चढ़ गया। तब तक वीक एंड टाइम्स ने भी सिडकुल में चल रहे खेल का खुलासा कर दिया। इसके बाद सौजन्या ने पूरी रिपोर्ट मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री को दी। मुख्यमंत्री ने माजरा समझा और मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति को जांच सौंप दी। सिडकुल में सिर्फ टेंडर सरीखे घोटाले ही नहीं हुए हैं। वहां की नियुक्तियों पर भी ऊंगली उठती रही है। माना जाता है कि सिडकुल में महज पांच साल पहले ठेके पर आए और बाद में उप महाप्रबंधक बन गए एक अफसर की नियुक्ति पूरी तरह साजिश कर की गई।
उसको न सिर्फ गलत तरीके से नियुक्तिदी गई बल्कि कांग्रेस राज में मुख्यमंत्री के खासमखास रंजीत सिंह रावत का आशीर्वाद होने के कारण सिडकुल उसके इशारों पर चलने लगा। प्रबंध निदेशकों के लिए भी उसकी राय को काटना मुश्किल हो गया था। इस अफसर के पास आज बेहिसाब संपत्ति है। एक स्थानीय टीवी चैनल में उसकी भी सहभागिता होने का शोर है। चैनल का मालिक सिडकुल के ठेके लेने वाले उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के महाप्रबंधक एसए शर्मा, जो आयकर छापे में अरबों की संपत्ति पकड़े जाने के बाद खुद निलंबित चल रहा है, का चेला है। सूत्रों के मुताबिक सिडकुल के शातिर अफसर के इशारे पर ही शर्मा इस ठेकेदार को ठेके देता था। इस ठेकेदार के बारे में प्रचलित है कि जिस भी नौकरशाह या राजनेता ने उसको पहले कभी आगे बढ़ाया, उसकी फोन काल तक उठाना तब बंद कर देता है, जब वे किसी काम के नहीं रहते हैं। वह तुरंत ही नए शिकार को तलाशता है।
आजकल आईएफएस अफसर और जिका प्रोजेक्ट के बॉस अनूप मलिक के साथ उसका याराना बहुत चर्चाओं में है। दोनों के परिवार साथ ही घूमने जा रहे हैं और दावतें कर रहे हैं। इसकी तसवीरें वायरल हो रही हैं। मुख्य सचिव और जांच समिति जब सिडकुल के ताजा घोटाले की जांच करेंगे तो उम्मीद जताई जा रही है कि इन पहलुओं पर भी जरूर गौर करेंगे और नए संभावित घोटालों को रोकने की भी कोशिश करेंगे। मुख्यमंत्री रावत ने साफ कह दिया है कि जिस तरह एनएच-74 के घोटालेबाज जेल भेजे जा रहे हैं, उसी तरह सिडकुल के घोटाले बाजों को भी बख्शा नहीं जाएगा। उनको जेल भेजने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

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