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राजनीति के महानायक मोदी

एक दशक बाद जब इतिहास के पन्नों को पलटा जायेगा तो निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजनीति का ‘महानायक’ कहा जायेगा। ‘महानायक’ का तमगा तो उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में ही मिल गया था लेकिन बीते साढ़े तीन साल में जिस तरह से मोदी के चेहरे पर राज्यों में बीजेपी फतह कर रही है वह अविस्मरणीय है। भारतीय राजनीति में गिने-चुने चेहरे ही रहे है जिनके इर्द-गिर्द पूरी राजनीति केन्द्रित रही हो। कई दशक बाद ऐसा देखने को मिला है कि पूरे देश की राजनीति एक आदमी तक सीमित हो गई है। विरोधियों की लाख कोशिशों के बावजूद मोदी की छवि धूमिल होने के बजाए और चमकती जा रही है। अब तो आलम यह है कि बीजेपी मतलब मोदी। वाकई ऐसा कोई कर सकता है तो वह मोदी ही है। हर बार वह राजनीतिक विश्लेषकों को चौका देते हैं। गुजरात चुनाव से पहले जिस तरह से मोदी के खिलाफ माहौल बना था उससे राजनीतिक पंडित भी हैरान थे लेकिन चुनाव में मोदी ने ऐसा पासा पलटा कि सब चित्त हो गए।

भाजपा के पास वर्तमान में नायक नहीं महानायक है। ऐसा महानायक जो हारी हुई बाजी को बदलने की कुवत रखता है। ऐसा कई बार मोदी ने कर दिखाया है। यह सच है कि आरएसएस के अतीत के महानायक पं. दीनदयाल उपाध्याय हैं तो वर्तमान के नरेन्द्र मोदी। नरेन्द्र मोदी का चेहरा ही आज भाजपा की पहचान है। चुनावों में मिल रही ताबड़तोड़ विजय में मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका को कोई नकार नहीं सकता। ऐसा नहीं कि विरोधियों ने पीएम मोदी के घेरने की कोशिश नहीं की, लेकिन जनता का विश्वास मोदी से नहीं हटा सकी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कौन भूल सकता है। उत्तर प्रदेश में 15 साल से वनवास काट रही बीजेपी के लिए सत्ता में लौटना आसान नहीं था, लेकिन प्रदेश में मोदी लहर चली और चुनाव परिणाम देखकर तो सब के सब भौचक्के रह गए। ऐसा कैसे हुआ सभी जानते हैं। उत्तर प्रदेश की लड़ाई मोदी के लिए उनकी साख और सम्मान की लड़ाई थी। तीन साल पहले वाराणसी से चुनाव लडक़र उन्होंने अपना नाता जोड़ा था। इस चुनाव में उन पर बाहरी होने का आरोप लगा तो गोद लिया बेटा बताकर यूपी का दिल जीत लिया।
चुनाव में सिर्फ जीत मायने रखती है, कितने सीटों से जीते हैं वो मायने नहीं रखता। गुजरात में बीजेपी ने 99 सीटों पर जीत हासिल की। बीजेपी के इस जीत पर तमाम तर्क दिए गये। किसी ने मोदी के लिए खतरे की घंटी बताया तो किसी ने मोदी को सबक लेने की नसीहत दी। कुल मिलाकर गुजरात की जीत मतलब मोदी की जीत है। मोदी को गुजरात की सत्ता छोड़े साढे तीन साल हो गए और उनके गुजरात सेहटने के बाद वहां काफी राजनीतिक उथल-पुथल मचा रहा। गुजरात चुनाव के कुछ महीने पहले से मोदी के विरुद्ध नकारात्मक माहौल था। जीएसटी, नोटबंदी और देश की गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार विरोधी दलों के निशाने पर थी। रही सही कसर व्यापारियों द्वारा जीएसटी के विरोध ने पूरी कर दी थी। पूरा माहौल बीजेपी के खिलाफ था। इतना ही नहीं राजनीतिक पंडितों ने तो हार की भविष्यवाणी भी करनी शुरू कर दी थी। गुजरात में जिस तरह व्यापारी सडक़ पर आ गए थे उससे अंदाजा यही लगाया गया था कि अबकी बार बीजेपी की कश्ती भगवान भरोसे है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में बाजी पलट दी। उन्होंने गुजरात में ताबड़तोड़ रैली की। पीएम मोदी ने खुद गुजरात में 40 चुनावी रैलियां कीं। यहां तक कि चुनावों में पीएम मोदी पर मर्यादा को ताक पर रखने के भी आरोप लगे। इसके अलावा पीएम मोदी का व्यक्तित्व और गुजरात से लगाव भी बड़ी वजह रही। गुजरात पीएम नरेंद्र मोदी की जन्मस्थली है। मोदी इस राज्य की सियासी नब्ज को बेहद अच्छे से समझते हैं। वह खुद कई बार इस राज्य के सीएम रहे। पार्टी को उनके चेहरे के आधार पर ही राज्य में जीत मिली। ऐसे में उनसे बेहतर राज्य की राजनीतिक हवा को कौन समझ सकता है। देश भर में हिंदी में भाषण देने वाले मोदी गृह राज्य जाकर गुजराती में लोगों से संवाद करते दिखे। इसका मकसद गुजराती अस्मिता और गुजरातियों को जोडऩा था, जिसमें पार्टी और पीएम मोदी कामयाब रहे। गुजरात चुनाव में एक बात और सामने आई बीजेपी ने विकास के अलावा उन सारे मुद्दों को भुनाया जिसके लिए बीजेपी जानी जाती है। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीच कहना बीजेपी को फायदा पहुंचा गया। पीएम मोदी ने खुद चुनावी रैलियों में इसे मुद्दा बनाया और अपने को पीडि़त, शोषित और नीच जाति में पैदा हुआ बताकर गुजराती जनमानस में गुजराती अस्मिता को जगाया। इसका असर दूसरे चरण के चुनाव में दिखा। ओबीसी वोटरों में बिखराव हुआ और बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में लामबंद हुआ।
एक कहावत है कि प्यार और जंग में सब जायज है। राजनीति की बिसात पर भी यही फार्मूला लागू होता है। इसलिए आज के परिवेश में राजनीति के स्तर की बात करना बेमानी है।

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