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कौन लिखेगा शौर्य गाथा?

देहरादून। लोकसभा चुनाव के लिए डेढ़ साल का भी वक्त नहीं रह गया है और जिस तरह मेजर जनरल रहे पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी पाश्र्व में जा चुके हैं उससे साफ दिखने लगा है कि वह अपनी सियासी पारी आखिरी बार खेल रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि यमकेश्वर से उनकी बेटी ऋतु खंडूड़ी को विधानसभा का टिकट ही इसीलिए दिया गया कि वह अब अगली बार चुनाव के लिए कोई दावेदारी पेश नहीं करेंगे। यह तो वक्त ही बतायेगा कि इसमें कितनी हकीकत है और कितना फसाना। अलबत्ता, जो हालात दिख रहे हैं, उससे इस तरह की चर्चाओं को बल ही मिल रहा है। अब खंडूड़ी जिनको प्रदेश का अब तक का सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री माना जाता है, नहीं तो फिर उनका उत्तराधिकारी पौड़ी से कौन होगा? पार्टी के पास अभी तक कोई मजबूत नाम बतौर उत्तराधिकारी आधिकारिक तौर पर नहीं है, लेकिन यह भी तय माना जा रहा है कि कम से कम ऋतु के नाम पर तो कोई विचार पार्टी नेतृत्व नहीं करेगा। इस हाल में यह चर्चा और मंथन होना स्वाभाविक है कि फिर पौड़ी से बीजेपी के लिए शौर्य गाथा कौन लिखेगा? कुछ अरसे पहले तक अनाधिकारिक तौर पर दो नाम सियासी आसमान पर उछल रहे थे। ये दो नाम हैं, मौजूद सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और केदारनाथ में अपने काम से छाप छोडऩे वाले कर्नल अजय कोठियाल। अब इस कड़ी में नया नाम जुड़ता दिख रहा है शौर्य डोभाल का। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की किचन कैबिनेट के खास सदस्य और पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो चीफ तथा मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे शौर्य ने बीजेपी को औपचारिक तौर पर ज्वाइन कर लिया है। शौर्य आते ही मीडिया और सियासी दुनिया में स्थान हासिल करने में सफल हो गए हैं।

शौर्य सियासी जगत में क्यों आए हैं, इसको समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। न ही यह समझना कि पौड़ी लोकसभा सीट का टिकट हासिल करना उनके लिए बहुत मुश्किल तो कतई नहीं होगा। खास तौर पर यह देखते हुए कि अजीत डोभाल के मायने अब सभी की समझ में आ चुके होंगे। उत्तराखंड की प्रतिभाओं को जिस तरह अचानक देश में तरजीह मिलने लगी है और उनकी उपेक्षा का दौर खत्म दिख रहा है तो सिर्फ डोभाल ही इसके लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं। दिल्ली में शीर्ष स्तर पर यह चर्चा आम है कि डोभाल न तो गलत सलाह प्रधानमंत्री को देते हैं और न ही उनकी सलाह को मोदी दरकिनार ही करते हैं। ऐसे में अजीत अगर अपने बेटे के लिए एक टिकट मांग लेते हैं तो बीजेपी नेतृत्व इसको तवज्जो नहीं देगा, इसकी गुंजाइश नहीं दिखती है। शौर्य को अगर किसी नाम से चुनौती मिल सकती है तो वह नाम जनरल बिपिन रावत है। चुनाव से पहले वह रिटायर हो चुके होंगे। तब वह अपनी अगली पारी सियासत में खेलना जरूर चाहेंगे और वह जीत जाते हैं तो उनका केंद्र में मंत्री बनना भी तय ही होगा। बिल्कुल वैसे ही जैसे खंडूड़ी जो कि पूर्व सेनाधिकारी होने के कारण केंद्र में मंत्री बनाये गए थे। हालांकि, उनके पास सियासी अनुभव तब था नहीं।
रावत पौड़ी से ताल्लुक रखते हैं और वह पौड़ी से चुनाव लडऩे की मंशा जताते हैं तो बीजेपी नेतृत्व को उनके नाम पर विचार तो करना ही पड़ेगा। तब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि शौर्य और बिपिन में पलड़ा किसके हक में झूलता है। यह तय है कि शौर्य को अगर टिकट के लिए कोई टक्कर दे सकता है तो वह रावत ही है। अभी जनरल रावत सेवा में हैं और बेहद अहम कुर्सी पर भी। लिहाजा, उनके नाम पर बहुत ज्यादा चर्चा करना या पोस्ट मार्टम करना सही नहीं है। वैसे आक्रामक तेवरों वाले जनरल बिपिन स्थानीय और पार्टी के लोगों की पसंद बन सकते हैं। एक नाम और इस सीट के लिए गाहे बगाहे आगे आ रहा है। नेहरु पर्वतारोहण संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल पहाड़ में नायक सरीखा दर्जा रखते हैं। केदारनाथ में जो पुनर्वास कार्य हुए, उसके लिए उनको बहुत यश हासिल हो चुका है। ऐसी सम्भावना जताई जा रही है कि वह लोकसभा चुनाव से पहले सेना से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले सकते हैं। इसके बाद वह बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरने की इच्छा रखते हैं। कोठियाल लम्बे समय से जिस तरह पहाड़ से उतरने को तैयार नहीं हैं और अपने रुतबे के बूते तबादला भी रुकवाने में सफल रहे हैं। इतना ही नहीं जिस तरह वह समारोहों में भी जा रहे हैं उससे उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में लोग अटकलें लगा रहे हैं।
इन सबके बीच बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता और नेता खुद को कहीं नहीं पा रहे हैं। शौर्य और बिपिन रावत अगर टिकट के लिए दावा पेश करते हैं तो उनकी हैसियत इसका विरोध करने की नहीं है। बिपिन, शौर्य और कोठियाल आज की तारीख में इस कदर शक्तिशाली हैं कि उनका टिकट कम से कम बीजेपी के स्थानीय लोगों के दबाव में तो नहीं कट सकता है। वे खुद ही न चाहे तभी किसी और को मौका मिलेगा। अब यह सोचना थोड़ा मुश्किल होगा कि इन तीनों में से एक नाम भी टिकट के लिए आगे नहीं आएगा। वैसे तीनों में सबसे ज्यादा विरोध अगर किसी का हो सकता है तो वह नाम शौर्य ही है। इंडिया फाउंडेशन के कर्ता धर्ताओं में शामिल शौर्य आज की तारीख में अपने पिता के कारण बहुत शक्तिशाली हो चुके हैं। उनके संस्था में कई केन्द्रीय मंत्री शामिल हैं। इतना ही नहीं कई विदेशी प्रतिनिधिमंडल और मंत्री, नौकरशाह इंडिया फाउन्डेशन के दफ्तर में भी जरूर जाते हैं, ऐसी चर्चा है। वह संघ के भी करीब बताए जाते हैं।
अगर बिपिन और शौर्य दोनों पौड़ी से ही लडऩा चाहेंगे तो मोदी,अमित शाह और संघ के लिए एक नाम को चुनना वाकई मुश्किल हो जाएगा। इतनी कहानी कहने का मतलब यह है कि पौड़ी और गढ़वाल की सियासत से खंडूड़ी युग अब अस्त हो चुका है। उनकी उम्र भी हो चुकी है और वह अब सियासत में पहले की तरह सक्रिय हैं भी नहीं। उनको पार्टी में वह दर्जा भी नहीं हासिल है जो कभी था। ऐसे में उनके कहने से उनकी बेटी को उनका उत्तराधिकारी बनाया जाएगा, यह सोचना भी नामुमकिन सा है। पौड़ी से ही पूर्व मुख्यमंत्री और अभी हरिद्वार से सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी हैं, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद वह सियासी तौर पर बहुत कमजोर हो चुके हैं। वह हरिद्वार से ही आगे की सियासी पारी खेलना पसंद करेंगे बजाए, पौड़ी से किस्मत आजमाने के। त्रिवेंद्र सिंह रावत मंत्री मंडल के सदस्त सतपाल महाराज भी पौड़ी से हैं जरूर, लेकिन वह खामोशी के साथ अपनी सियासी जिंदगी जी रहे हैं। उनको पता है कि ज्यादा हाथ पैर मारने की सूरत में उनकी मंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडरा सकता है। इसके अलावा उनके पास अब खुश हो कर या फिर मन मार कर ही सही, बीजेपी में रहने के सिवाय विकल्प है भी नहीं। कांग्रेस में तो फिलहाल, उनके लिए दरवाजे सात तालों में बंद है। ऐसे में शौर्य गाथा लिखने वालों में सिर्फ बिपिन,शौर्य और अजय के ही नाम चल रहे हैं। यह बात अलग है कि टिकट मिलने के बाद क्या वे सियासी दुनिया में शौर्य गाथा लिखने में कामयाब हो पायेंगे? गुजरात में बीजेपी की कंपकंपाती जीत ने यह तो जाहिर कर दिया है कि ब्रांड मोदी पर अब पहले जैसा भरोसा नहीं किया जा सकता है यानि, सिर्फ उनके नाम पर चुनाव की वैतरणी पार नहीं हो सकती है।

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