You Are Here: Home » Front Page » चक्रव्यूह में त्रिवेंद्र !

चक्रव्यूह में त्रिवेंद्र !

देहरादून। मुख्यमंत्री की कुर्सी उत्तराखंड में कभी भी फूलों की सेज नहीं रही लेकिन जब त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के मुखिया बने तो लगा कि वह आराम से पांच साल गुजारेंगे और निर्बाध तरीके से ऐसा करने वाले वह पहले मुख्यमंत्री होंगे। इसकी उम्मीद इसलिए भी थी कि त्रिवेंद्र पर संघ के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के कडक़ अध्यक्ष अमित शाह का आशीर्वाद है। ऐसे में जब पिछले दिनों विधायकों का एक बड़ा समूह दिल्ली डेरा डालने पहुंच गया तो लगने लगा था कि त्रिवेंद्र के लिए भी कठिन दिनों की शुरुआत हो चुकी है। इस समस्या से वह शायद निकल भी आएं क्योंकि आला कमान और संघ का आशीर्वाद रहने तक उनका बाल भी बांका होना मुमकिन नहीं है लेकिन अब चुनाव आयोग का ताजा फरमान उनके लिए परेशानी का बड़ा कारण बन सकता है। आयोग के पास देहरादून के रघुनाथ सिंह नेगी ने त्रिवेंद्र के खिलाफ कई संवेदनशील शिकायतें पहुंचाई हैं। ये इतनी सशक्त दिख रही हैं कि आयोग इसकी कुछ जांच सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज को सौंपने को मजबूर हो गया है। ये आरोप ऐसे नहीं हैं कि उनको हवा में उड़ाया जा सके। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री अपनी आयु को लेकर भी निशाने पर हैं। यह भी कोई छोटा मामला नहीं माना जा रहा है। कहने की जरुरत नहीं कि त्रिवेंद्र की इस घेराबंदी के पीछे बीजेपी की ही एक ऐसी लॉबी का नाम उभर रहा है, जो कभी उनके साथ होता था। पार्टी नेतृत्व इस मामले को जल्द नहीं सुलटा पाया तो तय है कि लोकसभा चुनाव में साल 2009 दोहराया जाना कोई नामुमकिन जैसा कार्य नहीं होगा।

त्रिवेंद्र के मुख्यमंत्री बनने से पहले जिन नामों को लेकर चर्चा सामानांतर चल रही थी, उनमें कांग्रेस से आए सतपाल महाराज और मौजूदा वित्त मंत्री तथा त्रिवेंद्र के हम उम्र प्रकाश पन्त तथा संघ, पार्टी और आला कमान में तगड़ी पहुंच रखने वाले पॉकेट हरक्युलिस समझे जाने वाले डॉ.धन सिंह रावत का नाम भी लिया जा रहा था। नाम तो पूर्व मंत्री और पार्टी अध्यक्ष रह चुके बिशन सिंह चुफाल का भी लिया जा रहा था। हालांकि, उनके नाम को गंभीरता से नहीं लिया गया था। त्रिवेंद्र ने सभी चर्चाओं और कयासों को झटका देते हुए बाजी मार ली थी। खास बात यह है कि महाराज को छोड़ दिया जाए तो सभी नाम एक ही लॉबी जिसके अगुआ भगत सिंह कोश्यारी हैं से जुड़े थे। कोश्यारी खुद भी मुख्यमंत्री बनने की हसरत कायम रखे हुए हैं और इस उम्मीद को छोडऩे को राजी नहीं हैं। अंदरखाने की बात यह है कि कोश्यारी ने विधानसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत के बाद मुख्यमंत्री बनने की कोशिश की थी पर उनके नाम को हाई कमान ने किनारे कर डाला था। बाकी नामों को भी पार्टी नेतृत्व और संघ ने कोई तवज्जो नहीं दी और त्रिवेंद्र सरकार के बॉस बन गए थे। इसके बाद से ही पार्टी में त्रिवेंद्र को हिलाने और कमजोर करने की साजिशें तेजी से चल रही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अब तक की सरकार में उन पर सिर्फ एक ही आरोप है। वह है नौकरशाहों को अपने ऊपर हावी होने देने का।
खास नौकरशाह लॉबी को लेकर पार्टी और अन्य नौकरशाही धड़े में नाराजगी है, लेकिन त्रिवेंद्र अपनी पसंद के नौकरशाहों को तमाम शिकायतों के बावजूद हल्का करने को राजी नहीं है। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वह न दबाव में झुकते हैं न ही किसी को हावी होने देते हैं। काम भी बहुत फूंक-फूंक कर कर रहे हैं, जिससे उनकी सरकार पर कोई आरोप न लगे और उनको हाई कमान तथा जनता की अदालत में जवाब देना पड़े। इसके चलते बेशक सरकार और विकास से जुड़े काम काज धीमे तो हुए ही हैं। इसको लेकर भी विरोधी लॉबी उनके खिलाफ हाई कमान के कान फूंकने में लगा हुआ है। इस लॉबी में पार्टी से जुड़े लगभग 20 विधायक शामिल बताए जाते हैं। यह बात अलग है कि कोई भी खुल कर सरकार या मुख्यमंत्री के खिलाफ जुबान खोल नहीं रहा है। फिर भी विरोधियों को लग रहा है कि जब बीसी खंडूड़ी सरीखे ईमानदारी के पुतले समझे जाने वाले मजबूत नाम को मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल किया जा सकता है तो त्रिवेंद्र को क्यों नहीं। समझा जाता है कि त्रिवेंद्र को हटाने की कोशिश में पार्टी की क्षत्रिय लॉबी से जुड़े लोग ही जुटे हुए हैं। उनको कुछ परंपरागत त्रिवेंद्र विरोधी ब्राह्मण लॉबी का छिपा समर्थन हासिल है।
ये लॉबी त्रिवेंद्र को किसी भी तरह कमजोर कर उनको सत्ताच्युत करने के लिए कोई कोशिश नहीं छोड़ रहे हैं। यह बात अलग है कि पार्टी में त्रिवेंद्र का उच्च नेतृत्व और संघ पर मजबूत पकड़ बनी हुई है। त्रिवेंद्र को अगर परेशानी हो सकती है तो चुनाव आयोग में देहरादून निवासी रघुनाथ सिंह नेगी की तरफ से दायर शिकायत से, जिसमें उन्होंने कई बिन्दुओं पर त्रिवेंद्र को निशाने पर लिया है। नेगी की शिकायत में मजबूती का ही नतीजा है कि आयोग ने सेंट्रल टैक्स ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज को मुख्यमंत्री की अचल संपत्ति की जांच करने के निर्देश दे दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक त्रिवेंद्र ने आयोग में दायर हलफनामे में जितनी कीमत में अचल संपत्ति खरीदना दर्शाया है, वह बेहद कम है। बाजार भाव से वह हैरतनाक तरीके से कम है। इतना ही नहीं इसी शिकायत में यह भी कहा गया है कि हलफनामे में मुख्यमंत्री ने साल 2007, 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में जो उम्र दर्शाई है, वह सामान है, जो संभव नहीं है। यह गंभीर मामला है। ये शिकायत सही पाई जाती है तो पहली बार त्रिवेंद्र संकट में होंगे। ऐसी शिकायतों पर मुख्यमंत्री की कुर्सी भी जा सकती है। समझा जाता है कि नेगी को त्रिवेंद्र विरोधी भाजपाइयों ने ही ये शिकायत करने के लिए राजी किया है। ऐसा उनके खिलाफ शिकायत पर नेतृत्व को कुछ न करते देख किया गया है। त्रिवेंद्र का जन्म 1960 का है। वैसे पार्टी में सीधे तौर पर अगर किसी को त्रिवेंद्र का विरोधी समझा जाता था, तो वह खंडूड़ी और पूर्व मुख्यमंत्री तथा सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक हैं। दोनों ब्राह्मण लॉबी का प्रतिनिधित्व करते हैं पर दोनों की इस बार भूमिका कुछ नहीं दिखाई दे रही है। खंडूड़ी को अपना मुख्यमंत्री बनना तो दूर लोकसभा चुनाव में टिकट मिलना भी नामुमकिन लग रहा है और निशंक अभी पार्टी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते जिससे नेतृत्व को उनसे नाराज होने का मौका मिले। उनके हक में भी उम्र है और वह जानते हैं कि फिलहाल वक्त खराब चल रहा है और खामोशी के साथ बैठने से बेहतर उपाय कोई नहीं है। हालात इस वक्त ऐसे हैं कि नेतृत्व ने तुरंत सख्त और वाजिब कदम नहीं उठाया तो नौ साल पहले की कहानी फिर लिखने की सम्भावना खारिज नहीं की जा सकती है। तब खंडूड़ी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने के लिए पार्टी के सिपहसालारों ने ही ऐसी चालें चली थीं कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी पांचों सीटें हार गई थीं। हालात हाथ से निकलते देख कर ही नेतृत्व ने खंडूड़ी को हटा कर डॉ. निशंक को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। इस बार भी ऐसा हो सकता है अगर त्रिवेंद्र विरोधी लॉबी को कुछ और नहीं सूझेगा। यह देखना अहम होगा कि खुद त्रिवेंद्र और पार्टी नेतृत्व किस तरह इस कठिन हालात से निकल आएंगे।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.