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जातीय हिंसा पर सियासत

भले ही भारत के तमाम सियासी दल विकास की राजनीति का दावा करते रहे, लेकिन वे आज भी जाति, धर्म और संप्रदाय की सियासत से बाज नहीं आते हैं। पिछले दिनों पूणे में भीमा-कोरेगांव लड़ाई की वर्षगांठ पर भडक़ी जातीय हिंसा पर सभी दलों ने अपनी-अपनी सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कर दी है। यह मामला जैसे-जैसे तूल पकड़ता जा रहा है, सियासतदां तेजी से सक्रिय हो गए हैं। सभी दल जातीय हिंसा के बहाने वोट बैंक साधने में जुट गए। कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और कुछ अन्य दलों ने इस जातीय हिंसा के लिए भाजपा और संघ को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराया। वहीं भाजपा ने इन आरोपों से इंकार कर दिया। लब्बोलुआब यह कि आरोप-प्रत्यारोप की इस राजनीति का मकसद जाति विशेष के वोट को अपने पक्ष में करना है। जातीय हिंसा के बहाने दलित वोट को अपने पाले में करने में जुटे राजनीतिक दल इस मुद्दे को कितनी हवा दे पाते हैं, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन इतना तय है कि भारत की राजनीति में अभी भी कुछ खास नहीं बदला है।

देश में छोटे से लेकर बड़े मुद्दों तक पर सियासत कोई नई चीज नहीं है। राजनीतिक दलों को मुद्दों की तलाश रहती है। नेताओं को इससे कोई सरोकार नहीं होता कि उनके सियासत से किसका कितना नुकसान हो रहा है। दलितों के नाम पर तो देश में सियासत हमेशा से चरम पर रही है। दलित वोट बैंक को हथियाने के लिए राजनीतिक दल कोई भी पैंतरा आजमाने से नहीं चूकते। दलितों का मसीहा बनने के लिए राजनीतिक दलों के नेताओं में होड़ मची रहती है। ऐसा ही एक मौका भीमा-कोरेगांव लड़ाई की सालगिरह पर भडक़ी जातीय हिंसा से राजनीतिक दलों को मिल गया। जातीय हिंसा की यह चिंगारी पूरे महाराष्टï्र तक फैल गई। इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई थी। इस हिंसा की आंच गुजरात तक पहुंची। ब्रिटिश शासन के दौरान 200 वर्ष पहले हुए एक युद्ध की वर्षगांठ पर एक समुदाय द्वारा जश्न मनाये जाने की घटना पर हुई हिंसा और जातीय संघर्ष ने आधुनिक भारत की हकीकत एक बार फिर बयां कर दी है। यह हिंसा देश की अर्थव्यवस्था, भारत की विश्व में की छवि, औद्योगिककरण और शहरों की समृद्धि के पीछे की सचाई को भी स्पष्टï करता है।
महाराष्ट्र में पुणे के निकट कोरेगांव भीमा नाम की जगह में 200 साल पहले (1 जनवरी 1818 को) दलित समुदाय के लगभग आठ सौ महारों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हजार सैनिकों को एक स्थानीय युद्ध में हरा दिया था। ये महार सैनिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़े थे और इसी युद्ध के बाद पेशवाओं के राज का अंत हुआ था। पेशवा चितपावन ब्राह्मण होते हैं और इस जीत को दलित नेता ब्राह्मणों की हार के जश्न के रूप में मनाते हैं। पिछले कुछ समय से इस ब्रिटिश जीत का जश्न मनाए जाने का विरोध हो रहा है, हालांकि कुछ चिन्तक व इतिहासकार कहते हैं कि यह ब्रिटिश जीत के बजाए दलित स्वाभिमान का एक प्रतीक है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई कुछ घटनाओं के पीछे जातीय समीकरण की भूमिका रही है लेकिन यह भी सच है कि आज की राजनीति में जातीय समीकरण बहुत मायने रखता है। सत्ता तक पहुंचने में जातीय समीकरण की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। वर्तमान में तो दलितों को रिझाने के लिए कांग्रेस, बीजेपी से लेकर अन्य दल भी जतन करते रहते हैं। दलितों की मसीहा कही जाने वाली मायावती की तो पूरी राजनीति ही इनके इर्द-गिर्द घूमती है। मायावती का वोट बैंक दलित समाज है। आज यह कमजोर स्थिति में है। पुणे में हुई जातीय हिंसा को लेकर मायावती भी आक्रामक मुद्रा में दिखी। उन्होंनेहमले की निंदा करते हुए कहा कि यह दलित स्वाभिमान के कुचलने का प्रयास है। महाराष्ट्र की सरकार संवेदनशील होती तो यह हिंसा न होती। उन्होंने हिंसा को भगवा संगठनों द्वारा प्रायोजित बताते हुए इसे राष्ट्रीय चिंता का कारण तक बताया है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस हिंसा को लेकर आरएसएस और बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि भारत के लिए आरएसएस और बीजेपी का फासीवादी दृष्टिïकोण यही है कि दलितों को भारतीय समाज में निम्न स्तर पर ही बने रहना चाहिए। राहुल गांधी ने उना की घटना और रोहित वेमुला का भी जिक्र किया। कांग्रेस अध्यक्ष ने लिखा, ‘उना, रोहित वेमुला और अब भीमा-कोरेगांव प्रतिरोध के सशक्त प्रतीक हैं।’ इस बयान के बाद भाजपा ने राहुल गांधी पर राजनीतिक लाभ के मकसद से जातीय हिंसा को हवा देने के लिए उकसावे के मॉडल पर काम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास की राजनीति के आगे पस्त हो जाएंगे। भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल दलित वोटों पर निशाना साधती रही है जबकि मोदी समुदाय की प्रगति पर ध्यान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि राहुल अपने परिवार और पार्टी की तरफ से माफी मांगे। इसके अलावा संसद में भी इस मुद्दे पर तीखी नोकझोंक हुई। विपक्षी दल ने सरकार पर जमकर हमला किए। फिलहाल जातीय हिंसा को लेकर देश में एक बार फिर दलित राजनीति गरमा गई है और
सियासी दल इसे एक मौके के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

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