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खतरे में न्यायपालिका !

देश के इतिहास में जो अब तक नहीं हुआ वो 12 जनवरी को हुआ। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चार न्यायधीशों ने बकायदा प्रेस कांफ्रेस कर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पूरे देश मे हडक़ंप मच गया। तरह-तरह के सवाल उठने लगे। ऐसा नही होना चाहिए था, वैसा नही होना चाहिए था। यहां सवाल उठता है कि क्या न्यायधीश को अपनी बात रखने का हक नहीं हैं। जब विकसित देशों में न्यायधीश प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हंै तो भारत के न्यायधीश क्यों नहीं कर सकते। जाहिर है जो अब तक नहीं हुआ यदि वो अब हो रहा है तो इसके पीछे बड़ी वजह होगी। जिस न्यायपालिका के कामकाज पर सवाल उठने पर बहुत से लोगों को खतरा दिख रहा है क्या वो न्यायपालिका की कार्यप्रणाली से संतुष्ट है। देश में अनेकों उदाहरण मौजूद है जो कोर्ट की कार्यप्रणाली से आजिज आ चुके हैं। अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल का सुसाइड नोट इसका जीता-जागता उदाहरण है। दूर जाने की जरूरत नहीं, चारों न्यायाधीशों ने जज लोया मामले पर भी अपनी आवाज उठायी। चूंकि सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर खुद न्यायधीश ने सवाल खड़ा किया है इसलिए मामला बड़ा हो गया है।

निश्चित ही 12 जनवरी 2018 न्यायपालिका के इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली घटना है। देश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि न्यायाधीश मीडिया के पास आए और अपनी बात कहें। अभी तक तो यही धारणा है कि जिसे कहीं न्याय नहीं मिलता उसे कोर्ट में न्याय मिलता है, लेकिन यदि ऐसी घटना होती है तो निश्चित ही इसके पीछे बड़ी वजह होगी। सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जस्टिस बाहर आते हैं और प्रेस के सामने कहते हैं कि ‘इस देश में बहुत से बुद्धिमान लोग हैं जो विवेकपूर्ण बातें करते रहते हैं। हम नहीं चाहते कि ये बुद्धिमान लोग 20 साल बाद ये कहें कि जस्टिस चेलामेश्वर, गोगोई, लोकुर और कुरियन जोसेफ ने अपनी आत्मा बेच दी और संविधान के हिसाब से सही कदम नहीं उठाया।’ जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमारे सारे प्रयास फेल हो गए। हम सभी ने समझाने का प्रयास किया कि जब तक इस संस्थान को बचाया नहीं जाएगा, भारत में लोकतंत्र को नहीं बचाया जा सकता है। जजों का इस तरह सडक़ पर आना मुल्क को चेतावनी दे रहा है। मेडिकल कॉलेज और जज लोया की सुनवाई के मामले में गठित बेंच ने जजों को अपना फर्ज निभाने के लिए प्रेरित किया है या कोई और वजह है, यह उन चार जजों के जवाब पर निर्भर करेगा। प्रेस कांफ्रेंस के बाद जिस तरह देश में भूचाल आया वह देखने लायक था। सरकार से लेकर न्यायपालिका में हडक़ंप मच गया। सब अपने-अपने हिसाब से इस स्थिति का आंकलन कर रहे थे। जस्टिस चेलामेश्वर ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि उन्होंने चीफ जस्टिस को सारे हालात से अवगत कराया लेकिन उन्होंने कोई सुनवाई नहीं की। उन्होंने वह पत्र भी सार्वजनिक किया जो चीफ जस्टिस को भेजा गया था लेकिन दो महीने पहले चीफ जस्टिस को लिखे पत्र पर भी आधी अधूरी ही चर्चा हुई। हालांकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस मामले में पहल की और 16 जजों से 13 जनवरी से लेकर 14 जनवरी रात तक मुलाकात की। बार काउंसिल ऑफ इंडिया का कहना है कि राजनीतिक दल इससे दूर रहें और मीडिया ने भी कुछ अटकलें फैलाईं जो उचित नहीं थी। अटार्नी जनरल ने भी बताया कि चाय मीटिंग में सभी जज मौजूद थे और मामला सुलझ गया। अच्छी बात है लेकिन बात केस की सुनवाई के लिए बेंच के गठन और मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर को लेकर हुई थी, इस पर क्या बात हुई, कोई ठोस जानकारी नहीं है। उम्मीद की जा सकती है कि किसी सही वक्त पर सुप्रीम कोर्ट देश को बताएगा कि किस तरह से मामला सुलझा लिया गया, क्या प्रक्रियाएं बनी हैं या बनने वाली हैं जिससे लोगों को संस्थान में भरोसा और बेहतर हो।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वारा कोर्ट प्रशासन से लेकर चीफ जस्टिस के कामकाज पर सवाल खड़ा करने से संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है। सुप्रीम कोर्ट न्याय की आखिरी मंजिल है। जिसे वहां इंसाफ नहीं मिला, उसे फिर कभी नहीं मिलेगा। जाहिर है इतने जिम्मेदार संवैधानिक पीठ पर सवाल उठना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। पिछले साल अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने अपने सुसाइड नोट में वकील, राजनेता और जजों पर रिश्वत मांगने के आरोप लगाए थे लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। यदि उसी समय इस पर ध्यान दिया गया होता तो शायद आज यह नौबत न आती कि खुद मौजूदा चार जजों को मीडिया के सामने आना पड़ता और साथी जज लोया के लिए बोलना पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश द्वारा कोर्ट प्रशासन से लेकर चीफ जस्टिस के कामकाज पर सवाल खड़ा करने से संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है। सुप्रीम कोर्ट न्याय की आखिरी मंजिल है। जिसे वहां इंसाफ नहीं मिला, उसे फिर कभी नहीं मिलेगा। जाहिर है इतने जिम्मेदार संवैधानिक पीठ पर सवाल उठना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। पिछले साल अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने अपने सुसाइड नोट में वकील, राजनेता और जजों पर रिश्वत मांगने के आरोप लगाए थे लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।

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