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गुंडागर्दी का नया लाइसेंस करणी सेना

पिछले दिनों पूरे देश में पद्मावत फिल्म के विरोध के नाम पर करणी सेना ने जो तांडव मचाया उससे कई सवाल खड़े हो गए। सबसे अहम सवाल यह कि वह कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते कई राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर चंद गुंडों के सामने नतमस्तक हो गईं। एक बात तो तय है कि बिना सरकार की सहमति के राजपूतों की रहनुमाई करने वाली करणी सेना इतना हौसला न कर पाती। करणी सेना के बहाने सबने अपने हित साधे। पद्मावत के बहाने करणी सेना अपना प्रचार-प्रसार करने में लगी रही तो वही फिल्म की मुफ्त में पब्लिसिटी हो गई। वहीं राजस्थान व मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों की सरकारों ने मौन सहमति देकर अपना वोट बैंक साधने में जुटी दिखीं। कुल मिलाकर सबने अपने हित साधे और एक बार फिर मूर्ख बनी जनता।

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत शुरु से विवादों में रही। इस मुद्दे पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। फिल्म रिलीज होने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया भी सामने आ चुकी है कि यह फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक कथा पर बनी है, फिर भी करणी सेना लगातार विरोध कर रही है और एक बात लगातार अलाप रही है कि फिल्म में इतिहास से छेड़छाड़ की गई है। यदि दर्शकों से लेकर फिल्म समीक्षक तक कह रहे हैं कि फिल्म काल्पनिक स्टोरी पर बनी है फिर भी करणी सेना सुनने को तैयार नहीं है तो यह निश्चित ही सामान्य विरोध नहीं है। दरअसल, इस फिल्म पर करणी सेना की शुरू से नजर थी। राजस्थान में शूटिंग के दौरान करणी सेना ने संजय लीला भंसाली और उनकी टीम पर हमला किया था। मजबूरन भंसाली को शूटिंग दूसरी जगह करनी पड़ी थी। उस समय भी लोगों ने करणी सेना को खरी-खोटी सुनाया था, लेकिन वह चुप होने को तैयार नहीं थी। वह तो बस मौके की फिराक में थी। फिल्म बनकर तैयार हुई और रिलीज का समय आया तो फिर करणी सेना का जमीर जाग उठा। राजपूतों की रहनुमाई करने वाली करणी सेना रानी पद्मावती की अस्मिता की रक्षा करने के लिए सडक़ पर उतर गई। भंसाली बार-बार फिल्म देखने की जिरह करते रहे लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं हुआ। दरअसल, यह सबकुछ सुनियोजित था। हिंसक हो चुके विरोध के इस ड्रामे के पीछे एक ऐसे जातीय समूह की पहचान का संकट है जिसके अंदर अपने साथ हो रहे अन्याय की गहरी भावना घर कर गई है। यही नहीं, इसके साथ ही मौजूदा समय में बढ़ी मुस्लिम विरोधी भावना इस आग में घी का काम कर रही है। अवसरवादी हिंदुत्व संगठन इस हंगामे में शामिल हो गए हैं। यहां तक कि यह पता चलने पर कि यह फिल्म राजपूतों का बखान करती है, करणी सेना पीछे हटने को तैयार नहीं है। इसकी वजह यह है कि वास्तव में उनको कभी भी फिल्म से मतलब नहीं था। वे अपने समुदाय की पहचान के संकट और उसके अंदर बनी अन्याय की भावना को भुनाने के लिए काम कर रहे हैं। इसके पीछे असल में बस ध्यान हासिल करने की ही कोशिश है। सबसे हास्यास्पद स्थिति तो यह रही कि कई राज्यों में राजपूत बिरादरी जो विवाद के पहले करणी सेना का नाम तक नहीं सुना थी वह मल्टीप्लेक्स में तोडफ़ोड़ करने पहुंच गई।

इन सारे सवालों का जवाब है पहचान की राजनीति। यह उनके लिए अपनी पहचान को जाहिर करने, अपने को एक अलग जातीय समूह के रूप में पेश करने का मौका है। पद्मावत ने उन्हें अपना गुस्सा बाहर निकलने का मौका दिया है, जो काफी समय से दबा हुआ था। इसके पहले तमाम जातीय समूह ऐसा करते रहे हैं। राजस्थान में आरक्षण हासिल करने के लिए गुर्जर ऐसा कर चुके हैं। गुर्जरों ने अपने विरोध से सरकार को झुकने को मजबूर कर दिया था। हरियाणा का प्रभावी जाति समूह जाट अक्सर आंदोलनरत रहता है। वे भी नौकरियों में आरक्षण की मांग करते रहे हैं। गुजरात के पटेल अपने आंदोलन के लिए चर्चा में रहते हैं। पटेलों के लिए पिछला साल काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। ऐसे ही महाराष्ट्र में मराठाओं में इसी तरह का गौरव आंदोलन चलता रहा है। फिर क्या राजपूतों को
पद्मावत के नाम पर यह मौका मिल गया। पूरे देश की मीडिया से लेकर आम लोगों की जुबान पर उनकी चर्चा है। चैनलों के प्राइम टाइम में उन्हें जगह मिल रही है। सही तरीके से बात न रख पाने वाले उनके प्रतिनिधि टीवी पर अपमानित हो रहे हैं लेकिन सच यह है कि इससे राजपूतों का आंदोलन बढ़ रहा है और उनके अंदर यह भावना कायम हो रही है कि नए भारत में उनके लिए जगह नहीं है। टीवी एंकर उन्हें कायर कह रहे हैं, फिर भी वे खुशी से टीवी पर आ रहे हैं। असल में वे कोई राजपूत नेता नहीं हैं, वे ऐसे लोग हैं जिन्हें नेता बनने का अवसर मिल गया है। पद्मावत ने उन्हें यह सौभाग्य दिया है। रही-सही कसर सरकार ने अपनी सहमति देकर पूरी कर दी। फिल्म निर्माताओं के खिलाफ थानों में शिकायतें दी गई हैं। राजपूत संगठनों ने फिल्म में रानी पद्मावती का किरदार निभाने वाली दीपिका पादुकोण की नाक काटने तक की धमकी दे रखी है और कमाल देखिए कि सरकारें खामोश हैं। दिल्ली की भी और ज्यादातर राज्यों की भी। बीजेपी भी चुप, तो कांग्रेस भी कन्नी काट रही है। जाहिर है यह राजपूताना शान के लिए नहीं बल्कि उस वोट के लिए जो वहां आने से हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टï कहा था कि राज्य सरकारें कानून-व्यवस्था संभाले और फिल्म रिलीज करें। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी राज्यों को फिल्म प्रदर्शित करने का आदेश देने के बावजूद राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और गोवा के थिएटर मालिकों ने इसे दिखाने से मना कर दिया है। इसके लिए उन्होंने हिंसा को कारण बताया। जिस तरह से चार राज्यों में सुरक्षा का हवाला देकर फिल्म रिलीज नहीं हुआ उससे साफ है  कि वोट से बड़ा इस देश में कुछ नहीं है। ऐसा नहीं है तो फिर राज्य सरकारें और पुलिस तंत्र नकारा है कि वह चंद गुंडों को रोकने में सक्षम नहीं हैं।

 

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