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नगर निगम में करोड़ों के घोटालों की जांच दफन सरकार बदलने के बाद भी दोषियों पर कार्रवाई नहीं

प्रचार विभाग से लेकर अभियंत्रण विभाग तक में किया गया था करोड़ों का खेल
टेंडर घोटाले पर आज भी शासन स्तर पर कार्रवाई लंबित, बाबू आज भी चल रहा निलंबित
ट्री गार्ड घोटाले की फाइल कर दी गई गायब, घोटालों को दबाने में बड़े-बड़े रसूखदारों का हाथ

वीकएंड टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। राजधानी के नगर निगम में तमाम घोटाले सामने आये, लेकिन दोषियों के खिलाफ आज तक कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद ऐसा लग रहा था कि अब घोटाला करने वालों को बख्शा नहीं जायेगा, लेकिन नगर निगम से लेकर शासन तक लंबिंत तमाम जांच और कार्रवाई आज भी ठंडे बस्ते में हैं। दिखावे की कार्रवाई के लिए एक-दो बाबुओं को निलंबित जरूर किया गया, लेकिन किसी बड़े पर अफसर या अभियंता पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई। यही नहीं पिछले तीन साल से अधिक समय से नगर निगम लखनऊ की जिम्मेदारी संभाल रहे नगर आयुक्त उदयराज सिंह आज भी डटे हैं, जबकि उनके कार्यकाल में तमाम घोटाले उजागर हुये।
2016 में नगर निगम की अनुमति के बिना कई गुना ट्री-गार्ड लगाने का मामला सामने आया था, लेकिन घोटाले की फाइल को ही दबा दिया गया। शहर में लगे अधिक ट्री गार्डों को कम दिखाकर नगर निगम को हर साल 80 लाख का चूना लगाया जा रहा था। इस मामले की जांच की जिम्मेदारी तत्कालीन अपर नगर आयुक्त अवनीश कुमार सक्सेना को दी गई थी, लेकिन स्थानांतरण होने पर सक्सेना ने जांच किसी और से कराने का अनुरोध किया था और फाइल प्रचार विभाग को वापस कर दी थी। इसके बाद जांच अपर नगर आयुक्त पीके श्रीवास्तव को दी गई, लेकिन फाइल उनके पास नहीं पहुंची। जांच में पाया गया था कि सिग्मा एजेंसी को 2400 ट्री गार्ड लगाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन सर्वे में छह हजार ट्री गार्ड लगाए थे। वहीं, हरियाली संस्था को शहर में 2000 ट्री गार्ड लगाने की अनुमति थी, लेकिन संस्था ने बिना अनुमति इसके अतिरिक्ट 5000 अवैध ट्री गार्ड लगा लिये। गिनती में कुल 7000 ट्री गार्ड मिले थे। सेटेलाइट संस्था के भी चार सौ ट्री गार्ड अधिक मिले थे।
नगर निगम के दो कर अधीक्षकों के द्वारा जांच में गड़बड़ी पकड़ी गई थी। प्रचार निरीक्षकों को चार्जशीट दी गई थी। लेकिन बाद में फाइल को दबा दिया गया। इस मामले में आज तक कुछ नहीं हुआ। दूसरी ओर 2015 में नगर निगम में टेंडर घोटाला प्रकाश में आया था, जिसमें बाबू राजेंद्र यादव ने प्रचार विभाग की मिलीभगत से टेंडर प्रकाशन में फर्जीवाड़ा किया। टेंडर अखबारों में छपवाने की बजाए अखबारों की डमी तैयार की गयी और उसी डमी को फर्जीवाड़ा करने के लिए फाइलों में लगाया गया। गोपनीयता से किये गये इस फर्जीवाड़े में तमाम चहेते ठेकेदारों को नगर निगम से काम दिलाया गया, जिसमें तमाम अभियंताओं की मिलीभगत का अंदेशा साफ नजर आ रहा था। इस मामले में एक बाबू पर कार्रवाई करते हुए अभियंताओं के खिलाफ जांच बैठा दी। नगर आयुक्त के अनुसार जांच रिपोर्ट शासन भेज दी गई लेकिन उन पर कार्रवाई लम्बित है। दोषी अभियंताओं पर आज तक कार्रवाई नहीं हो सकी। वहीं, बाबू राजेंद्र आज भी निलंबित चल रहे हंै।
2015 में चारबाग, आलमबाग और पॉलीटेक्निक फुट ओवर ब्रिज पर विज्ञापन का टेंडर नहीं कराया गया। नगर निगम के एक वरिष्ठ अफसर के निर्देश पर तीनों फुटओवर ब्रिजों पर बिना टेंडर के ही विज्ञापन लगता रहा। इसके जरिए विभाग को करीब 48 लाख का चूना लगाया गया। अफसरों और प्रचार एजेंसियों के द्वारा अवैध प्रचार कर खूब बंदरबांट किया गया। मामला मीडिया में आया तो अफसरों ने अपनी गर्दन बचाने के लिए अवैध प्रचार हटवा दिया। कार्रवाई के नाम पर एजेंसी का खाता सीज कर दिया। यही नहीं टेंडर न करने के जिम्मेदार अधिशाषी अभियंता के खिलाफ जांच बैठा दी। इस मामले में भी जांच अधिकारी तत्कालीन अपर नगर आयुक्त अवनीश सक्सेना को ही बनाया गया। जिन्होंने जांच पूरी करके नगर आयुक्त को भेज दिया लेकिन नगर आयुक्त उदयराज सिंह का कहना है कि उनको किसी भी प्रकार की जांच रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि नगर निगम में प्रचार से लेकर अभियंत्रण विभाग में कितने बड़े पैमाने में घोटाले हुये।

टेंडर मामले में रिपोर्ट शासन भेज दी गई है। अब शासन स्तर से कार्रवाई होनी है। प्रचार संबंधी मामलों की जानकारी मुझे नहीं है।
उदयराज सिंह, नगर आयुक्त

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