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विकलांग मरीजों का सहारा लिम्ब सेंटर खुद बन गया बेचारा

कर्मचारियों की कमी से उपकरण के लिए परेशान हो रहे विकलांग मरीज
केजीएमयू प्रशासन की लापरवाही से वर्षों से रिक्त पड़े हैं पद
40 फीसदी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा सेंटर

वीकएंड टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। प्रदेश के नम्बर वन कहे जाने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहेब्लिटेशन (डीपीएमआर) में बेहतर इलाज के लिए नए उपकरणों के लिए पचास लाख का बजट तो मिल गया है लेकिन बरसों से इन्हें चलाने के लिए कर्मचारी उपलब्ध कराने में केजीएमयू प्रशासन कतरा रहा है। अस्पताल में 18 साल से कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की गयी है। वहीं इतने सालों में 60 फीसदी कर्मचारी कम हो चुके हैं। मंत्री और प्रमुख सचिव के आदेशों के बावजूद केजीएमयू प्रशासन सक्रिय नहीं दिख रहा है। इसके कारण विकलांग मरीजों को खासी परेशानी उठानी पड़ रही है। उन्हें समय से उपकरण नहीं मिल पा रहे हैं। मरीजों को उपकरण मिलने की वेटिंग बढ़ती जा रही है।
लिम्ब सेंटर में 17 वर्षों से प्रोस्थेटिक्स और आर्थेटिक्स (कृत्रिम अंग बनाने के विशेषज्ञ)के पद रिक्त चल रहे हैं। प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में नंबर एक कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण बनाने वाले इस विभाग की गत कई वर्षों में हालात बद से बदतर हो गये हैं। इतने सालो में जो कर्मचारी यहां नियुक्त थे वह भी साठ फीसदी कम हो गए है। विभाग की शुरुआत में प्रोस्थेटिक्स और आर्थेटिक्स समेत कुल 226 कर्मचारी थे, जो घटकर मात्र 40 फीसदी के आस-पास रह गये हैं। वर्तमान में विभाग में केवल 50 कर्मचारी हैं। दूसरी ओर विभाग में जल्द ही नये उपकरण आ रहे हैं, लेकिन उनको चलाने के लिए कर्मचारी नहीं हैं। विभाग में हर माह 30 कृत्रिम अंग और 200 सहायक उपकरण बन रहे हैं। कर्मचारियों की कमी की वजह से मरीजों को उपकरणों के लिए वेटिंग मिलती है। विभाग में घुटने के नीचे, घुटने के ऊपर, कूल्हे के ऊपर, कोहनी के ऊपर और कोहनी के नीचे, कंधे के ऊपर, सीने आदि के सहायक उपकरण बनते हैं। इसके अलावा पोलियो, फालिज, लकवा, जन्मजात हाथ और पैरों की विकृतियों के लिए भी उपकरण बनाये जाते हैं। गौरतलब है कि केजीएमयू के डीपीएमआर विभाग की वर्ष 1971 में स्थापना की गई थी। दिव्यांगों, मानसिक रूप से मंद लोगों के लिए चलने-फिरने के सहायक उपकरणों से लेकर फिजियोथेरेपी, इलाज और उनका पुर्नवास किया जाता है। विभाग में मार्केट से काफी सस्ती दरों में कृत्रिम अंग और उपकरण बनाये जाते हैं। बावजूद इसके विभाग केजीएमयू प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है। विभाग की ओर से रिक्त पदों के लिए अब तक 20 से ज्यादा बार मांग भेजी जा चुकी है, लेकिन केजीएमयू प्रशासन उदासीन रवैया अपनाए हुए है।

एक ही प्रोस्थेटिक्स पर आ जाएगा पूरा भार
विभाग का हाल यह है कि वर्ष 2000 के बाद से जितने प्रोस्थेटिक्स और आर्थेटिक्स थे एक-एक करके सेवानिवृत हो गये। विभाग की ओर से 20 से ज्यादा बार पदों की मांग भेजी गई। जिसमें केवल दो टेक्नीशियन के पद का वर्ष 2015 में विज्ञापन निकाला गया जिसे बाद में रद्द कर दिया गया। वर्तमान में वर्कशॉप के इंचार्ज अरविंद निगम और सीनियर प्रोस्थेटिक्स शगुन सिंह रह गई हैं। वर्कशॉप इंचार्ज भी डेढ वर्ष में रिटायर होने वाले हैं।

मात्र छह नियमित कर्मचारी
विभाग में वर्तमान में केवल छह नियमित पद हैं। केवल 13 संविदा कर्मचारियों से काम चलाया जा रहा है। वहीं टेक्नीशियन के भी 39 पद रिक्त चल रहे हैं। जिसकी वजह से कृत्रिम अंगों और उपकरणों का उत्पादन काफी कम हो गया है।

विभाग की वर्कशॉप में काफी पदों की रिक्तियां हैं, दो बार कर्मचारियों की मांग रजिस्ट्रार ऑफिस भेजी जा चुकी है।
-डॉ. एके गुप्ता
विभागाध्यक्ष, डीपीएमआर
यह पद हैं रिक्त
प्रोस्थेटिक्स मास्टर – 3 पद
प्रोस्थेटिक्स सुपरवाइजर – 3 पद
सीनियर प्रोस्थेटिक्स – 1 पद
टेक्नीशियन – 39 पद

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