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त्रिवेंद्र के खिलाफ साजिश…

देहरादून। मुख्यमंत्री बनने की लड़ाई जब पिछले साल बीजेपी की भारी बहुमत के बाद सरकार बनने के दौरान चल रही थी तो त्रिवेंद्र सिंह रावत अकेले ऐसे नाम नहीं थे, जो चर्चाओं में थे। उनके साथ ही अजय भट्ट, प्रकाश पन्त, डॉ. धन सिंह रावत, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और बिशन सिंह चुफाल के साथ ही कई दिग्गजों के सियासी गुरु भगत सिंह कोश्यारी के नाम भी मुख्यमंत्री के तौर पर संभावित समझे जा रहे थे। त्रिवेंद्र संघ और पार्टी नेतृत्व की पसंद समझे जा रहे थे, पर यह आशंका थी कि क्या दो चुनाव हारने के बाद भी उनको मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन त्रिवेंद्र ही मुख्यमंत्री बने। उनको मुख्यमंत्री बनाने की सबसे बड़ी वजह उनकी सादगी और साफ पृष्ठभूमि ही समझी जा रही थी। संघ से करीबी की बात की जाए तो ऐसे कई चेहरे हैं, जो संघ से जुड़े हुए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को त्रिवेंद्र की सादगी और पार्टी की निरंतर सेवा भा गई। उनके मुख्यमंत्री बनने से पार्टी के कई सूरमाओं को झटका ही नहीं बल्कि सदमा भी लगा, क्योंकि, त्रिवेंद्र की उम्र अभी 60 साल भी नहीं है और वह सरकार ठीक ठाक भी चला लेते हैं तो उनके पास लम्बा अरसा शीर्ष स्तर पर राजनीति करने के लिए है। ऐसे में बाकियों के लिए उम्मीदें ज्यादा नहीं रह जाती हैं। जिस तरह पिछले कुछ महीनों से त्रिवेंद्र पर लगातार सोशल मीडिया में प्रहार किये जा रहे हैं और उनको नाकाम साबित करने की कोशिश साजिश के स्तर पर चल रही है, वह साबित करती है कि आने वाला वक्त उनके लिए बहुत कठिन साबित होने वाला है।

हैरत की बात है कि त्रिवेंद्र पर हमले का बड़ा खतरा कांग्रेस की तरफ से नहीं है। पार्टी के भीतर ही ऐसा लग रहा है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ साजिश चल रही है। इसके कई चरण है। इसमें मुख्यमंत्री पर सरकार चलाने में पारंगत न होना, नौकरशाही पर अंकुश या नियंत्रण न होना या फिर नौकरशाह विशेष को लेकर असीम स्नेह और भरोसा रखना तथा मंत्रियों व पार्टी विधायकों में अंदरखाने असंतोष भाव रहना प्रमुख रूप से शामिल है। इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि त्रिवेंद्र ने अभी तक खुद को किसी बड़े आरोप में फंसने से बचाए रखने में सफलता पाई है। कांग्रेस अभी तक उनके खिलाफ कोई ऐसा आरोप नहीं लगा पाई है, जिसके चलते पार्टी, सरकार को दिक्कत हो और त्रिवेंद्र को नेतृत्व को जवाब देना पड़ा हो। इससे कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी के ही लोगों में बेचैनी का आलम है। अंदरखाने की खबर यह है कि जो लोग यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि त्रिवेंद्र को शायद नाकाम रहने पर बीच में ही हटा दिया जाएगा, वे सक्रिय चल रहे हैं। पार्टी मुख्यालय में हाल ही में काठगोदाम के एक कारोबारी का मंत्री के जनता दरबार के दौरान जहर खा लेने और फिर बाद में मौत हो जाने को भी मुख्यमंत्री की नाकामी के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है। उनके खिलाफ साजिश रचने वालों में निश्चित रूप से बड़े नाम शामिल हैं। यह बात अलग है कि पार्टी में यह मानने वाले भी हैं कि कुछ भी हो जाए, त्रिवेंद्र को बदला नहीं जाएगा।
त्रिवेंद्र के खिलाफ सोच रखने वालों में हौसला होने की वजह पार्टी का इतिहास है। बीजेपी सरकार पहले भी दो बार बनी और दोनों बार स्थिरता बहुत बड़ा मुद्दा साबित हुई है। जब राज्य बना और अंतरिम सरकार बनी तो डेढ़ साल के भीतर ही दो मुख्यमंत्री (पहले नित्यानंद स्वामी फिर भगत सिंह कोश्यारी) बनाने पड़े। फिर 2007 में आम चुनाव में जीत कर बीजेपी ने सरकार बनाई तो पहले बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। फिर उनको बीच में हटा कर डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बना के बीजेपी ने अस्थिरता के आरोप को पुख्ता किया। हद तो तब हो गई, जब बीजेपी ने आम चुनाव से महज छह महीने पहले फिर खंडूड़ी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी कर दी। डॉ. निशंक को इसका अंदाज तक नहीं था। उनकी छुट्टी कर दी गई। पार्टी में मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद पाले बैठे और त्रिवेंद्र को अन्दर खाने नापसंद करने वालों को इसी इतिहास से हौसला मिला हुआ है।
त्रिवेंद्र को नाकाम करने की साजिश का हिस्सा मंत्रियों पर उनका नियंत्रण न होना और मंत्रियों का अपने हिसाब से चलने को प्रचारित किया जा रहा है। सतपाल महाराज और डॉ. हरक सिंह रावत के साथ ही अरविन्द पाण्डेय के काम करने के अंदाज को पार्टी और सरकार की नीतियों के विपरीत बताया जा रहा है। हकीकत यह है कि त्रिवेंद्र मंत्रियों पर नाहक अंकुश लगाने के बजाए उनको अधिकार पूर्वक कार्य करने का मौका दे रहे हैं, जिससे कल नाकामी की सूरत में मंत्री अपने पास अधिकार और काम करने की आजादी न होने का फिजूल दावा न कर सके। यह त्रिवेंद्र की मंत्रियों को खुल कर कार्य करने देने की नीति है कि डॉ.धन सिंह रावत अपनी छाप छोड़ पा रहे हैं। इतना जरूर है कि कुछ मंत्रियों के कार्य करने की शैली आपत्तिजनक रही है। कुछ पर महकमों के अफसरों के इशारों पर काम करने और गलत-सलत कदम उठाने के आरोप लग रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री को इसकी पूरी खबर है। वे सिर्फ मंत्रियों को पर्याप्त मौका और अवधि दे रहे हैं। काम करने के लिए.खुद को साबित करने के लिए। सुधर जाने के लिए। इसके बाद मुमकिन है कि वह जल्द ही मंत्री परिषद या मंत्री मंडल में फेर बदल कर दें। तब अच्छा प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कार मिल सकता है जिसमें अहम महकमे सौंपा जाना और खराब प्रदर्शन करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना शामिल हो सकता है।
त्रिवेंद्र के खिलाफ यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि उनके खिलाफ संगठन स्तर पर भी असंतोष तेज है। नौकरशाही संगठन के लोगों की तो छोड़ो मंत्रियों और विधायकों को भी घास नहीं डाल रही है। ऐसी हवा फैलाने वालों की साजिश है कि लोक सभा चुनाव तक माहौल एक दम ही न सिर्फ त्रिवेंद्र के खिलाफ बना दिया जाए बल्कि चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन भी खराब रहे। इससे त्रिवेंद्र को कुर्सी से हटाने की उनकी मुहिम सफल हो सकती है। साल 2009 में लोक सभा चुनाव में बीजेपी राज्य की पांचों लोक सभा सीटें कांग्रेस के हाथों हार गई थी। इस हार की असली वजह थी पार्टी के लोगों का चुनाव के दौरान अपने प्रत्याशियों के लिए काम ही न करना। वे उस वक्त के मुख्यमंत्री खंडूड़ी को हटाने की मुहिम में थे। चुनाव में पार्टी का बदतर प्रदर्शन ही खंडू्रड़ी को हटवा सकता था। पार्टी नेतृत्व का खंडूड़ी के प्रति अपार विश्वास के कारण यह समीकरण बने थे। चुनाव में खराब प्रदर्शन का खामियाजा खंडूड़ी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हट कर भुगतना पड़ा था। त्रिवेंद्र विरोधी भी उसी रणनीति को अपना सकते हैं।
यह बात अलग है कि मोदी-शाह की जोड़ी को उत्तराखंड के खेल की पूरी जानकारी है। कौन क्या खेल और साजिश कर रहा है, दोनों को पूरी रिपोर्ट मिल रही है.पार्टी के बड़े लोगों के मुताबिक ऊपर वालों ने त्रिवेंद्र के खिलाफ साजिश कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने और त्रिवेंद्र को परेशान करने की साजिश करने वालों पर दुनिया नजर रखी हुई है। यह हो सकता है कि पार्टी को लोक सभा चुनाव में उम्मीदों के मुताबिक नतीजे न मिलने पर त्रिवेंद्र की बजाए उन पर ही कार्रवाई का फरसा गिरे।

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