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कासगंज हिंसा: साजिश या इत्तेफाक

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के कासगंज में हुई साम्प्रदायिक हिंसा से अनेक सवाल खड़े हुए। ऐसा जिला जहां इसके पहले कभी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ वहां इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा होना किसी बड़ी साजिश की तरफ इशारा करता है। जिस तरह से कासगंज हिंसा को लगातार हवा देकर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सुलगाने की साजिश रची गई उससे साफ हो गया कि 2019 लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी हैं। यहां सवाल उठता है कि आखिर यूपी में ऐसा क्यों होता है कि जब भी चुनाव करीब आता है कहीं न कहीं साम्प्रदायिक दंगा हो जाता हैं। पूरे साल अमन-चैन से रहने वाले हिंदू-मुस्लिम अचानक से एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। इतिहास गवाह है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में साम्प्रदायिक दंगों ने अहम भूमिका निभायी है। वोटों के ध्रुवीकरण के लिए समय-समय पर साम्प्रदायिक कार्ड खेलना राजनीतिक दलों की पुरानी आदत में शुमार रहा है। तो क्या कासगंज में जो भी हुआ वह साजिश का नतीजा था या यह सिर्फइत्तेफाक।

कासगंज में 26 जनवरी को विद्यार्थी परिषद एवं हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा बाइक से तिरंगा यात्रा निकालने के दौरान साम्प्रदायिक हिंसा हुई। इस घटना से कई सवाल खड़े हो गए हैं। अब जब सारे तथ्य धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं उससे साफ है कि कासगंज हिंसा से इत्तेफाक कम साजिश की बू ज्यादा आ रही है। जिस दिन हिंसा हुई उस दिन अफवाह उड़ाकर अन्य जगहों पर साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिश की गई। यह तथ्य छुपाया गया कि मुस्लिम भी तिरंगा फहराने के लिए लाइन में लगे हुए थे। इसके अलावा प्रशासन की अनुमति के बिना तिरंगा यात्रा निकालना और उस पर उपद्रवियों द्वारा यह कहना कि अपने देश में तिरंगा यात्रा निकालने के लिए अनुमति की जरूरत क्यों? ऐसे अनेक तथ्य सामने आए हैं जिसकी वजह से कासगंज हिंसा की तस्वीर साफ होती दिख रही है।
उत्तर प्रदेश में दंगे होना कोर्ई नई बात नहीं है। सरकार किसी की भी रहे दंगे होते रहे हैं। बसपा, सपा और भाजपा, सभी के शासन में दंगे हुए हैं और सभी दलों ने जमकर राजनीति भी की है। जिसका जिससे वास्ता रहा वह उसके पक्ष में खड़ा हुआ और अपना वोट पक्का करने में लगा रहा। दरअसल, उत्तर प्रदेश चुनावों में दंगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। वोटों का धुव्रीकरण करने में दंगे बड़े कारगर साबित हुए हैं। अब चूंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होना है तो इस साम्प्रदायिक दंगे पर सियासत सभी को समझ में आ रही है। सबके अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ हैं। लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है यह सभी जानते हैं। इसलिए सभी अपने-अपने मतलब निकालने में लगे हुए हैं।
कासगंज में साम्प्रदायिक हिंसा पर न तो वहां के रहने वालों को विश्वास हो रहा है और न ही आस-पास के लोगों को। कासगंज बेहद शांतिप्रिय शहर है। यहां कभी किसी तरह का विवाद नहीं हुआ है। सांप्रदायिक हिंसा जैसी बात सालों से यहां देखने को नहीं मिली। फिर ऐसा क्या हो गया कि यहां के लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। कासगंज के जातीय समीकरण पर ध्यान दें तो अन्य पिछड़ा वर्ग बहुल इस इलाके में हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी वैसी ही है जैसे प्रदेश के अन्य छोटे जिलों में है। ग्रामीण इलाके में ज्यादातर लोग खेती करते हैं जबकि कस्बे में व्यापार। नौकरीपेशा लोगों की संख्या यहां बहुत ज्यादा नहीं है। कासगंज एटा लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है जबकि इस जिले में तीन विधानसभा सीटें- कासगंज, अमांपुर और पटियाली आती हैं। हालांकि पूरा एटा-कासगंज लोकसभा सीट में ही लोध समुदाय की संख्या सबसे ज्यादा है और इसका असर चुनावी नतीजों में भी दिखता है, लेकिन कासगंज विधानसभा सीट पर इनका असर खासतौर पर है। कासगंज में मुसलमानों की आबादी 10-12 प्रतिशत है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यहां के मुसलमान चुनावों में निर्णायक भूमिका में नहीं होते हैं। 1977 से लेकर अब तक सभी प्रमुख राजनीतिक दल यानी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाजपार्टी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
1993 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा समय में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह भी यहां से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। एटा-कासगंज लोकसभा सीट पर भी इन्हीं तीन अन्य पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों का दबदबा रहा है। 2009 में यहां से कल्याण सिंह सांसद थे जबकि मौजूदा समय में उनके बेटे राजवीर सिंह भारतीय जनता पार्टी से सांसद हैं। कासगज जिलों की तीनों विधानसभा सीटों पर इस वक्त भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अन्य पिछड़ी जातियों का यहां बाहुल्य भले ही हो लेकिन उसके अलावा भी तमाम समुदाय मसलन, दलित, ब्राह्मण, राजपूत और दूसरी जातियां अच्छी खासी संख्या में हैं लेकिन खास बात ये है कि न तो कभी कोई बड़ा जातीय संघर्ष देखने को मिला और न ही सांप्रदायिक संघर्ष। कासगंज के बारे में एक दिलचस्प बात ये है कि 1974 के बाद से जिस भी पार्टी का विधायक जीता है, राज्य में उसी की पार्टी की सरकार बनी है। फिर यहां की फिजा में सांप्रदायिकता का जहर कैसे घुला, इस बात से सभी हैरान हैं।

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