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रिपोर्ट कार्ड से कसे जाएंगे मंत्री

काम काज और प्रदर्शन आंका जाएगा
नप सकते हैं उम्मीदों पर खरे न उतरने वाले

देहरादून। अब जब सरकार को एक साल होने वाले हैं तो मुख्यमंत्री और बीजेपी संगठन मंत्रियों के काम काज की समीक्षा करने जा रहा है। इसके जरिये वह सरकार के कामकाज और प्रदर्शन को भी आंकेंगे। लोकसभा चुनाव करीब होने के कारण अब सरकार और संगठन खुद को अधिक सक्रिय ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उसमें अति गंभीरता भी बरत रहे हैं। मंत्रियों को खुद में सुधार लाकर और बेहतर नतीजे देने के लिए कहा जा रहा है और यह भी मुमकिन है कि उम्मीदों पर खरे न उतर रहे मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा कर नए और प्रतिभावान लोगों के लिए मंत्री परिषद में जगह बनाई जा सकती है।
त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह माना जा रहा है कि अधिकांश मंत्रियों पर उनका बहुत अधिक नियंत्रण नहीं है। कुछ मंत्री खास तौर पर जो कांग्रेस छोडक़र बीजेपी में आए और मंत्री हैं, न तो संगठन को और न ही मुख्यमंत्री को खास तवज्जो दे रहे हैं। इनमें से कुछ मंत्रियों का रवैय्या ऐसा रहा है, जो सरकार और संगठन को गाहे-बगाहे दिक्कत में डालते रहे हैं। एक मंत्री जहां अपने खासमखास लोगों को मनमर्जी से जहां चाहते हैं वहीं प्रतिनियुक्ति देने के लिए विख्यात और सरकार को मुसीबत में डाल रहे हैं तो दूसरे मंत्री कभी अपने सचिव तो कभी अन्य कारणों से नाराजगी जतलाते रहते हैं। वह मंत्री मंडल की जरूरी बैठकों तक से तब भी किनारा करने के लिए चर्चित हो चुके हैं, जब वह राजधानी में ही होते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों में अपने महकमों को लेकर ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री सचिवालय के तकरीबन हर अहम मामले में दखल के कारण भी नाराजगी है।
ये मंत्री जब कांग्रेस में थे तो मनमानी के लिए विख्यात थे और बात-बात पर रूठ कर कांग्रेस सरकार के लिए परेशानी पैदा करते रहते थे। अब जब वे बीजेपी सरकार और संगठन में हैं और कांग्रेस सरीखी आजादी नहीं मिल रही है तो उनकी नाखुशी को समझा जा सकता है। लोक सभा चुनाव करीब होने के कारण बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तराखंड में भी किसी तरह की लापरवाही और कमी नहीं चाहते हैं तो मुख्यमंत्री रावत ने भी मंत्रियों को कसने का फैसला कर लिया है। इसके लिए उन्होंने मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड का सहारा लेने का फैसला किया है। वैसे त्रिवेंद्र अगर तटस्थ और सख्ती से रिपोर्ट कार्ड का आंकलन करे तो ज्यादातर मंत्री बामुश्किल 33 फीसदी अंक हासिल कर पायेंगे। कुछ मंत्री जरूर अपनी तरफ से जम कर मेहनत कर रहे हैं लेकिन अवाम उतने से संतुष्ट नहीं दिखती है।
कुछ मंत्रियों पर अपने महकमे के चलता पुर्जा किस्म के अफसरों का अति असर होने का ठप्पा लगा हुआ है। समझा जाता है कि मंत्रियों पर उनका इतना असर है कि सचिवों की भी मंत्री नहीं सुनते हैं। इससे मंत्री की प्रतिष्ठा ही प्रभावित नहीं हो रही बल्कि सरकार की भी छीछालेदर हो रही है जो मंत्री काम के मामले में तेजी से उभरे हैं उनमें राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत खास हैं। ऐसे लोग कम नहीं हैं जिनको जल्द ही उनकी कैबिनेट मंत्री पद पर प्रोन्नति दिख रही है। वैसे भी डॉ. रावत की उच्च स्तर पर संगठन में खासी पकड़ है। प्रकाश पन्त त्रिवेंद्र के प्रतिभावान मंत्रियों में शुमार होते हैं, लेकिन आबकारी महकमे के कुछ अफसरों के कारण उनकी प्रतिष्ठा पर ऊंगली उठ रही है। ये अफसर शराब माफिया तत्वों के साथ बहुत करीबी के कारण बदनाम हैं।
हमेशा उत्साह में रहने वाले मंत्री अरविन्द पाण्डेय के पास खेल और शिक्षा जैसे अहम महकमे हैं। वह काम करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह बात अलग है कि उनके उठाए कदम कभी-कभार उनको विवादों में ले आते हैं। यह भी मुमकिन है कि रिपोर्ट कार्ड के आधार पर अगर कुछ फेरबदल हुआ तो एक महिला मंत्री को झटका लग सकता है। वह शुरू से ही अपनी कार्य शैली से लगातार विवादों में बनी हुई हैं। उनकी करीबी पार्टी के दिग्गज नेता भगत सिंह कोश्यारी से है। कोश्यारी की चली तभी वह कुर्सी बचा पाएंगीं। मदन कौशिक के पास भी अहम मंत्रालय हैं, पर सरकार के प्रवक्ता होने के बावजूद वह अपनी विशेष छाप कामकाज से नहीं छोड़ पा रहे हैं। यह भी देखने वाली बात होगी कि रिपोर्ट कार्ड का परीक्षण करने के बाद क्या सरकार और बीजेपी इतनी हिम्मत जुटा पाएगी कि पिछली कांग्रेस सरकार को गिरा और हिला कर उसके पाले में आए और अब मंत्री बन चुके लोगों को उनके प्रदर्शन के बिना पर बाहर का दरवाजा दिखा दे।

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