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वतन के रखवाले की दुर्दशा

> 71 की जंग में दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे कैप्टन गुरुंग ने
> फकीरों सा जीवन गुजारने को मजबूर

देहरादून। छोटे से दड़बेनुमा उधड़ी दीवारों वाले कमरे में अकेले फकीर नुमा हालत में रहने वाले कैप्टेन विजेंद्र गुरुंग को देख कर पहली ही नजर में यह कहा जा सकता है कि आखिर वतन पर जान निसार करने को बेकरार रहने और सब कुछ दांव पर लगा देने वाले सरकार के लिए कोई अहमियत नहीं रखते हैं। उनसे ज्यादा तो उनकी कद्र और पूछ है जो चुनाव में राजनेताओं और राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचा सकते हैं। वृद्धावस्था को प्राप्त कर चुके विजेंद्र ने शादी भी नहीं की। उनको दो जून के खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। यह उस वीर की कहानी है, जिसने 1971 की हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की जंग में कारगिल सेक्टर में अपने जवानों के दस्ते के साथ न सिर्फ दुश्मनों को हाहाकार के लिए मजबूर कर दिया था बल्कि युद्धबंदी होने के दौरान ना-ना किस्म की यातनाएं भी सही।
शॉर्ट सर्विस वाले कैप्टेन विजेंद्र ने जंग के दौरान छोटी सी टुकड़ी होने के बावजूद दुश्मनों का जम कर सामना किया था बल्कि उनके लिए हालात बहुत मुश्किल कर दिए थे। दुश्मनों की तादाद बहुत अधिक होने के कारण आखिरकार लड़ते-लड़ते वह बंदी बना लिए गए। फिर शुरू हुआ पाकिस्तानी सेना की यातनाओं का दौर। 13 महीने की कैद के दौरान उनको इस कदर यातनाएं दी गयी कि वह रिहाई के बाद काम करने की स्थिति में भी नहीं रहे। शॉर्ट सर्विस से होने के कारण उनको पेंशन भी नहीं मिली और शादी न करने के कारण उनकी देखभाल के लिए वृद्धावस्था में कोई रह भी नहीं गया।
आज आलम यह है कि उनको पहली नजर में देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि इस शख्स ने युद्ध में जांबाजी का प्रदर्शन कर कभी दुश्मनों के छक्के छुड़ा डाले थे। उनके लिए आज पेट भरना भी नामुमकिन सा हो गया है। असम रायफल्स के पूर्व अधिकारी खुद ही लकड़ी के चूल्हे पर खाना बना कर खाते हैं और कभी-कभी यह भोजन जुटा पाना भी बहुत मुश्किल हो जाता है। कुछ लोग उनकी मदद करते रहते हैं। इससे उनका बामुश्किल गुजारा चल रहा है। यह लज्जा की बात है कि कभी भी किसी भी सरकार ने उनकी दारुण दशा और अपने युद्ध नायक का हाल नहीं पूछा। यह हाल तब है जब सरकार बात-बात पर मुआवजा बांट डालती है। देश के लिए जवानी कुर्बान करने और दुश्मनों के हाथों तमाम यातनाएं सहने वाले जांबाज की यह दशा नौजवानों को किस तरह सेना में जाने के लिए प्रेरित करेगी, सोचा जा सकता है।
कैप्टेन के रैंक से रिटायर होने के बाद गुरुंग ने कभी पेंशन या मुआवजा की गुजारिश सरकार से नहीं की, लेकिन उनकी खुद्दारी का जवाब सरकार ने उपेक्षा से दिया। इतनी सर्दी में भी उनके पास तरीके के गर्म कपड़े पहनने या ओढऩे के लिए नहीं है। उनकी दुर्दशा देख के स्थानीय लोगों और कुछ पूर्व सैन्यधिकारियों ने सेना का ध्यान उनकी तरफ आकृष्ट किया।
इसके बाद सब एरिया (उत्तराखंड) के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल जेएस यादव ने उनको हाल ही में घर जाकर 1.41 लाख रूपये का चेक सौंप कर उनकी मदद करने की कोशिश की। हैरानी की बात है कि सेना के अफसरों और जवानों की धरती कही जाने वाले उत्तराखंड की सरकार
ने अभी तक उनका कोई हाल चाल तक नहीं पूछा है।

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