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खंडूड़ी का वह इंटरव्यू

जब खंडूड़ी केंद्र में सबसे कामयाब कैबिनेट मंत्री होते थे और मोदी को लोग गुजरात से बाहर जानते भी नहीं थे तब खंडूड़ी बड़ा नाम थे और उनकी कडक़ छवि का जलवा था। वह चाहते तो मीडिया घरानों को घुटने पर ला सकते थे।

साल 2007 की बात है बीसीके (मेजर जनरल (रि) भुवनचंद्र खंडूड़ी) को विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बामुश्किल मिली जीत के बाद उससे भी बड़े और जबरदस्त संघर्ष में मुख्यमंत्री बने हुए चंद दिन ही हुए थे। तब उत्तराखंड बीजेपी में भले खास जोश नहीं दिख रहा था, पर अवाम में बीसीके को लेकर बहुत उत्साह का माहौल था। यकीन मानिए तब खंडूड़ी की प्रतिष्ठा और छवि अन्ना हजारे की तरह नहीं थी, तो उसके आसपास तो थी ही। उनको प्रदेश ही नहीं देश के सबसे साफ-सुथरे और ईमानदार राजनेता और ईमानदार मुख्यमंत्री के तौर पर लिया जा रहा था। हालांकि, मैं इससे इतना इत्तफाक नहीं रखता था, लेकिन राज्य के राजनेताओं में उनको फिर भी सबसे ऊपर रखने को मैं तैयार था। हालांकि, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के मुखिया एनडी तिवारी के राज में दारोगा, पटवारी भर्ती घोटाले हुए और सिडकुल-एल्डिको सरीखे अरबों रूपये के घोटाले सामने आए, फिर भी मैं मानता था कि इसमें तिवारी का निजी तौर पर कोई रोल नहीं था। सरकार के मुखिया होने के नाते उनकी हर तरह से जिम्मेदारी जरूर थी। उनको कांग्रेस के कुछ बड़े नामों, जिनमें एक महिला मंत्री भी शामिल थीं ने अधिक नुक्सान पहुंचाया। तिवारी बेदाग इस तरह नहीं कहे जा सकते थे कि कुर्सी बचाए रखने और सत्ता सुख भोगे रखने की उनकी लालसा उनको हर तरह के जायज-नाजायज समझौते के लिए विवश करते रहे। यह कहने में हिचक नहीं कि हरीश रावत लॉबी ने जहां, उनको अस्थिर और आशंकित बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीं शक्तिशाली मंत्री इंदिरा हृदयेश ने उनको उनकी शक्तियां खुद इस्तेमाल कर बहुत कमजोर किया।
हालात यह हो गए थे कि हर किसी ने कांग्रेस की तिवारी सरकार को महाभ्रष्ट माना और इस उम्मीद से कईयों ने बीजेपी को वोट दिए कि खंडूड़ी सरीखा मसीहा मुख्यमंत्री बनेंगे और प्रदेश तथा उनके दिन फिरेंगे। हालांकि,ऐसा कुछ नहीं था और भगत सिंह कोश्यारी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक उनकी इच्छाओं और कोशिशों को मुख्यमंत्री बनने की रेस में कड़ी चुनौती दे रहे थे। तीनों के साथ बीजेपी हाई कमान से जुड़े लोग थे। खंडूड़ी को भी मुख्यमंत्री के तौर पर खुद को स्थापित करने के लिए चुनाव के दौरान काफी और कई तरह की कोशिशें करनी पड़ी थीं। उनसे जुड़े दो खास लोग, जो उनके हर सुख-दु:ख ही नहीं बल्कि सियासत तथा बीजेपी में मजबूत करने की मुहिम में हमेशा डटे रहे, हकीकत जानते हैं। इनमें दो लोग जिनमें उमेश अग्रवाल और अनिल गोयल भी प्रमुखता से शामिल थे। खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने तो राज्य स्तर पर ये दो खंडूड़ी के सचिव प्रभात कुमार सारंगी के साथ बहुत शक्तिशाली बन के उभरे थे। दोनों खूब चर्चाओं में भी रहे और माना गया कि खंडूड़ी उनके इस कदर प्रभाव में थे कि जमीनों के सर्किल रेट भी उनकी इच्छा से ही तय होते थे। कुछ मिसालें सामने आई भी थीं, फिर भी यह कहा जा सकता है कि तमाम आरोपों, जो कभी साबित नहीं हो पाईं, खंडूड़ी की न सिर्फ छवि बेहतर थी बल्कि उनमें काम करने की गंभीरता औरों से ज्यादा और नौकरशाही से काम लेने की क्षमता भी अधिक थी। यह बात अलग है कि वह कान के कच्चे भी साबित हुए और कुछ नौकरशाहों को सिर्फ बाहरी हो हल्ले के चलते पैदल किया और जिसके कारण उनकी कुर्सी ही चली गई, उस नौकरशाह सारंगी को सीने से आखिर तक लगाए रखे रहे।
खंडूड़ी इसलिए आज याद आ रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दो इंटरव्यू, जो उन्होंने अपने पसंदीदा टीवी चैनलों को खुद की शर्त पर दिए, को लेकर मीडिया ही नहीं बल्कि बाहरी तथा सियासी दुनिया में खूब हंगामा सा है। खंडूड़ी की छवि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रहने के दौरान आज के मोदी की तरह ही थी, लेकिन मोदी की तरह मीडिया से भागने वाले और गुरूर उनमें नहीं था। भले सेना की पृष्ठ भूमि थी और बड़े सियासी खानदान से आते थे, पर मीडिया के साथ उनका रिश्ता कभी भी खराब नहीं रहा। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री रहने के दौरान (वह दुबारा 2011 निशंक के हटाए जाने के बाद मुख्यमंत्री बनाए गए थे) खुल कर मीडिया से बात की। जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने तो चंद दिनों बाद ही मैंने उनका इंटरव्यू किया।
आम तौर पर मुख्यमंत्री कुर्सी संभालने के बाद प्रेस कांफ्रेंस करते हैं, पर तब तक बीसीके ने कोई औपचारिक कांफ्रेंस न तो की थी, न ही किसी अखबार को इंटरव्यू ही दिया था। अमर उजाला (तब मैं स्टेट ब्यूरो चीफ था) के लिए इंटरव्यू करने से पहले मुझे कई आला नौकरशाहों के फोन आने लगे कि क्या आप जनरल साहब का इंटरव्यू कर रहे हैं? मैंने पूछा क्यों, यह तो सामान्य बात है, पत्रकारों के लिए। पता चला कि मुख्यमंत्री ने सभी प्रमुख सचिवों और सचिवों से उनके महकमों की खास-खास जानकारी तलब की हुई थी। वह नहीं चाहते थे कि प्रदेश के नंबर एक अखबार में और अपने पहले इंटरव्यू में किसी भी सवाल का जवाब तरीके से देने में उनको दिक्कत हो। मैं तो जो गोलाबारी, सवालों के तौर पर करता सो करता, लेकिन खंडूड़ी ने पहले ही खंदक खोद लिए थे और जवाब तैयार कर लिए थे। साक्षात्कार रूपी युद्ध के लिए उन्होंने शानदार तैयारी की थी। उनके पास मेरे हर सवाल के सार्थक और तथ्यात्मक जवाब थे। ऐसा एक भी सवाल उनके लिए नहीं रह गया था, जिसका जवाब उनके पास नहीं था या जिसका जवाब देने में उनको दिक्कत हुई।
खंडूड़ी हर काम तय वक्त से तय समय में करने की प्रतिष्ठा रखते थे। उन्होंने मेरे साथ अपने इंटरव्यू के लिए आधा घंटा तय किया हुआ था। जब मैं बीजापुर गेस्ट हाउस, जहां, वह बैठे हुए थे, सुबह 10 बजे पहुंचा था तो कुछ मंत्री, विधायक और डीजीपी (सुभाष जोशी) पहले से बैठे हुए पाया। मेरे पहुंचते ही अन्दर बुला लिया गया था। इंटरव्यू में न मैंने फालतू पूरक प्रश्न पूछे न ही मुख्यमंत्री ने ही बेकार के भाषणनुमा जवाब ही दिए। नतीजा यह हुआ कि इंटरव्यू शानदार होने के बावजूद 12 मिनट में खत्म हो गया। मैंने दो बार चाय पी और फिर भी आधा घंटे के तय वक्त में कुछ मिनट फिर भी बच गए थे। क्या मजाल कि कोई अन्य निर्धारित वक्त से पहले उनके दफ्तर में प्रवेश कर जाए इसलिए शायद खंडूड़ी चाह रहे थे कि किसी अन्य के आने से पहले मैं उनके पास तय समय तक बैठा रहूं। खंडूड़ी ने या उनके करीबियों ने मुझे न तो इंटरव्यू से पहले और न ही उसके बाद यह कहा और प्रभावित करने की कोशिश की कि इंटरव्यू को मीडिया कैम्पेन की तरफ प्रकाशित किया जाए। उन्होंने इंटरव्यू दिया और खुल कर दिया। आज के मोदी के सामने बेशक खंडूड़ी की हैसियत कुछ नहीं है। भले एक वह भी वक्त था, जब खंडूड़ी केंद्र में सबसे कामयाब कैबिनेट मंत्री होते थे और मोदी को लोग गुजरात से बाहर जानते भी नहीं थे। तब खंडूड़ी बड़ा नाम थे और उनकी कडक़ छवि का जलवा था। वह चाहते तो मीडिया घरानों को घुटने पर ला सकते थे। उनके पास राष्ट्रीय राजमार्ग सरीखा महकमा था, जिसका बजट ही जबरदस्त नहीं था बल्कि करोड़ों रुपयों का विज्ञापन देने की शक्ति भी उनके हाथ में थी। फिर भी उन्होंने कभी उसका दुरूपयोग नहीं किया। कभी मीडिया को दोयम दर्जे का या फिर गुलाम नहीं समझा। जैसा आज प्रधानमंत्री कर रहे हैं। मोदी निश्चित रूप से खंडूड़ी से मीडिया का हिम्मत और पूरी तैयारी के साथ इज्जत दे कर सामना करने की कला सीख सकते हैं जिसकी उम्मीद नहीं के बराबर है। मोदी जिस तरह के इंटरव्यू गोदी कहे जाने वाले चैनलों को दे रहे हैं, उससे उनकी छवि और बिगड़ रही है। यह बात भी उनको कोई बताने वाला नहीं है शायद।

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