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मिले 50 हजार सोने के सिक्के, इसलिए बांट दिया गरीबों में

पुराने जमाने की बात है। टिकरी के राजा सुंदर सिंह के नगर से कुछ दूर एक गांव के मंदिर में संत गौरीबाई रहती थीं। वह ईश्वर की आराधना से समय निकालकर गांव वालों की मदद करती थीं। गांव वाले भी उनके प्रति अत्यंत श्रद्धा रखते थे और उन्हें प्यार से गौरी माई बुलाते थे।
उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। जब राजा सुंदर सिंह ने उनके बारे में सुना तो वह उनसे मिलने जा पहुंचे। गौरीबाई के दर्शन कर और उनकी बातें सुनकर वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने सोचा कि संत को कुछ भेंट करना चाहिए और गौरीबाई को पचास हजार स्वर्ण मुद्राएं दीं। पहले तो गौरीबाई ने उन्हें लेने से मना कर दिया पर राजा के बार-बार अनुरोध करने पर उन्हें स्वीकार तो कर लिया, मगर गरीबों में बांट देने को कहा।
राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा, ये मुद्राएं आपके लिए हैं। इन पर तो आपका अधिकार है। इस पर उन्होंने मुस्कराकर कहा, राजन, आप ठीक कहते हैं। इन मुद्राओं पर मेरा अधिकार है, लेकिन मुझ पर तो इन गांव वालों का अधिकार है। मैं तो इनकी सेवक हूं, इसलिए मुझसे पहले इन पर गांव वालों का हक बनता है। इस पर राजा ने कहा, आप धन्य हैं। फिर भी जीवन निर्वाह के लिए आपकी कुछ तो आवश्यकताएं हैं।
गौरीबाई ने कहा, राजन, आप मेरी चिंता न करें। मैं इनकी सेवा करती हूं और ये हजारों गांव वाले मुझ अकिंचन का ख्याल रखते हैं। फिर मुझे भला क्या आवश्यकता होगी जिसकी पूर्ति न हो सके। मैं तो बस गांववालों की तकलीफों को दूर करना चाहती हूं, उन्हें सुख में देखना चाहती हूं। इनके सुख में ही मेरा सुख भी है। इसलिए ये मुद्राएं सही जगह जा रही हैं।
आपका दान भी सफल हो रहा है। संत गौरीबाई की इस बात का राजा पर इतना असर हुआ कि उन्होंने भी गरीबों की सेवा का व्रत ले लिया।

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