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खत्म कहानी देवभूमि के दिग्गजों की

  • बीजेपी को महंगी पड़ सकती हैं सूरमाओं की नाराजगी
  • मोदी मंत्रिमंडल में एक और सीट की उम्मीद नहीं
  • राज्यमंत्री टम्टा के प्रोफेशन की भी नहीं दिख रही हैं सम्भावना
  • लोकसभा चुनाव पहले हुए तो खंडूड़ी और कोश्यारी को झटका मुमकिन

चेतंग गुरुंग

देहरादून। उत्तराखंड में चार साल पहले जब लोक सभा चुनाव हुए तो बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि कांग्रेस का सफाया होगा और पांचों सीटों पर कमल खिल उठेगा। इससे पहले हुए लोक सभा चुनाव में कमल को मुरझा कर कांग्रेस ने ऐसा ही किया था। तब उसने बीजेपी को चारों खाने चित कर सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया था। तब बीजेपी में अंदरखाने बहुत ज्यादा लड़ाई थी और उस वक्त कि बीजेपी सरकार के मुखिया बीसी खंडूड़ी से नाराज पार्टी के लोगों ने ही कांग्रेस को यह उपलब्धि हासिल करने में मदद पहुंचाई थी। बहरहाल, जब पिछले लोक सभा चुनाव में पार्टी ने सौ फीसदी सफलता पाई तो तकरीबन सभी सियासी समीक्षक यह मान कर चल रहे थे कि शानदार कामयाबी दिलाने की एवज में उत्तराखंड के पांच सांसदों में से दो लोगों को मंत्री परिषद में जरूर जगह मिलेगी, जिनको जगह मिलने की उम्मीद थी, उनमें खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक का नाम प्रमुख था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सभी को निराश करते हुए अजय टम्टा को मंत्री परिषद में जगह दी और सभी को चौंका डाला। एक अन्य नाम महारानी माला राज्यलक्ष्मी का नाम अलबत्ता, मंत्री बनने वालों की संभावित सूची में नहीं था। बाद में यह कयासबाजी लगती रही कि उत्तराखंड से किसी और नाम को भी मोदी की टीम में जगह मिलेगी या फिर टम्टा का प्रमोशन होता। यह भी सम्भावना जताई जा रही थी कि टम्टा को हटा कर खंडूड़ी, कोश्यारी और निशंक में से किसी को स्थान दिया जाएगा। तीनों नाम उत्तराखंड बीजेपी में बहुत बड़े होने के कारण ऐसा माना जा रहा था। कुछ दिन पहले तक भी यह सम्भावना और कयासबाजी चल रही थी, लेकिन अब जबकि माना जा रहा है कि मोदी जल्दी लोक सभा चुनाव कराने की सिफारिश कर सकते हैं, तो उत्तराखंड के किसी भी नाम के लिए उम्मीदों के दरवाजे बंद होते दिख रहे हैं।

अब अगर मोदी मंत्री परिषद में परिवर्तन होता है और उत्तराखंड के किसी और नाम को मंत्री बनने का अवसर मिलता है तो यह चमत्कार ही कहा जाएगा।

उम्मीद बांधना कोई बुरा नहीं। कुछ लोग अभी भी उत्तराखंड से किसी को मोदी मंत्री परिषद में जगह मिलने की उम्मीद लगा रहे हैं तो कुछ गलत भी नहीं है। जरुरत सिर्फ सियासी हालात को समझ कर सोचने की है। मोदी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह के लिए उत्तराखंड सरीखे राज्य की कुछ भी अहमियत सियासी तौर पर नहीं है। मोदी उत्तराखंड में केदारनाथ आए थे। इसके पीछे वजह खुद को हिन्दू नेता के तौर पर अधिक मजबूत करना था। ऐसा सियासी ज्ञान रखने वाले मानते हैं। वह इसलिए नहीं आए कि उनको इस प्रदेश की बहुत चिंता है। मोदी अपनी सियासी सोच और रणनीति के लिहाज से उत्तराखंड को आगे भी तवज्जो शायद ही दे। उनकी सरकार अब साल भर से भी कम समय की रह गई है। यहां से किसी और नाम को अतिरिक्त रूप से मंत्री परिषद में नहीं रखते हैं तो उसका क्या सियासी असर पार्टी पर पड़ सकता है? क्या वह एक बार फिर यहां की पांचों सीटों पर कब्जा कर सकेंगे?
यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब आसान नहीं होगा। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को सौ फीसदी कामयाबी मिलने की जो वजह थी, वह इस बार नहीं दिखाई देती है। तब मोदी का तिलिस्म लोगों के सिर चढक़र बोल रहा था। देश भर के लोगों की तरह उत्तराखंड के लोगों को भी मोदी में देश और अपना सुनहरा भविष्य दिखाई दे रहा था। उनको लगता था कि पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब मोदी के नेतृत्व में ही मिलेगा। विदेश का काला धन देश में आएगा। उनके बैंक खाते में 14 लाख रूपये आएंगे। जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होगा। विकास की आंधी आ जाएगी। दूसरी तरफ केंद्र की कांग्रेस सरकार लगातार बड़े घोटालों से घिरी हुई थी। कांग्रेस की रास राहुल गांधी के हाथों में थी। राहुल को पप्पू-पप्पू कह कर गंभीरता से न लेने वाला नाम बना दिया गया था। फिर केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार को दस साल भी हो चुके थे। ऐसे में उसके खिलाफ माहौल बनना स्वाभाविक भी था। इसके इतर एक कारण यह भी था कि राज्य के पार्टी नेताओं ने आपसी मतभेद भुला कर सिर्फ पार्टी को जिताने के लिए जी जान से काम किया था। धंधेबाजी दिखाई नहीं दी थी। बीजेपी की जबरदस्त जीत की बहुत बड़ी वजह यही थी।
इस बार पिछली बार की जीत के सभी समीकरण गायब दिखाई दे रहे हैं। मोदी आज विरोधी दलों के लिए जलजला नहीं रह गए हैं। इसके उलट उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। गुजरात विधानसभा चुनाव में उनको जिस तरह जी जान लगा देनी पड़ी और बामुश्किल बीजेपी वहां जीती, उसने साफ कर दिया कि खुद उनके ही गृह राज्य के लोगों का भरोसा उन पर बहुत कम हो चुका है। हाल के राजस्थान में हुए लोकसभा के दो और विधानसभा के एक उपचुनाव में जिस तरह बीजेपी को वहां सत्ता में होने के बावजूद करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, वह मोदी और बीजेपी के लिए खतरे की घंटी निश्चित तौर पर है।सच्चाई यह है कि मोदी के नाम भर से उत्तराखंड में वोट मिल जाने की गारंटी नहीं रह गई है। वह सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता जरूर हैं। दूसरी तरफ राहुल की छवि बदली है। वह निरंतर लोकप्रिय होते जा रहे हैं अगर बीजेपी और मोदी की समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने की मंशा झलक रही है तो इसके वजह आशंका है, जो ऊपर लिखी गई है। मोदी-शाह और संघ को लगने लगा है कि केंद्र में जल्दी चुनाव नहीं कराए गए तो मोदी-राहुल और बीजेपी-कांग्रेस के बीच का अंतर तेजी से घटता जाएगा। इसका नुक्सान बीजेपी को उठाना पड़ेगा।
चुनाव भले तय समय से पहले होते हैं तो भी बीजेपी के लिए उत्तराखंड में हालात एकदम माकूल नहीं रह गए हैं। अगर वह कोश्यारी,खंडूड़ी के टिकट उनकी अवस्था और माला राज्यलक्ष्मी का टिकट उनके प्रति टिहरी सीट के मतदाताओं में बढ़ती नाराजगी के चलते काट देती है तो इससे पार्टी को नुक्सान ही होगा। कोश्यारी और खंडूड़ी पहले तो राज्य का मुख्यमंत्री और फिर केंद्र में मंत्री न बनाए जाने से नाराज समझे जाते हैं अगर उनका टिकट भी काट दिया जाता है तो खास तौर पर कोश्यारी की नाराजगी बीजेपी को झेलनी पड़ सकती है। उनका पार्टी और अवाम के बड़े हिस्से में जबरदस्त असर है। खंडूड़ी की बेटी को अभी आगे राजनीति करनी है। उनको नुक्सान न होने देने के लिए भले खंडूड़ी अपना टिकट काटने पर चुप्पी साध भले सकते हैं लेकिन वह सक्रिय होकर चुनाव में काम करेंगे, इसकी गुंजाइश कम ही लगती है। उनकी नाराजगी से पार्टी को खास तौर पर ब्राह्मण तबके की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। माला का भी टिहरी सीट में बड़े हिस्से पर बहुत असर है। उनका टिकट काटना भी पार्टी को निश्चित रूप से महंगा पड़ सकता है। निशंक और टम्टा अभी सियासी उम्र के लिहाज से युवा हैं। उनका सियासी भविष्य आगे भी चमकदार रह सकता है। निशंक की भी लम्बी उपेक्षा पार्टी के हित में नहीं होगा। उनको मुख्यमंत्री के तौर पर देखने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद खीझे हुए हैं। उनको केंद्र में भी मंत्री न बनाये जाने से उनके समर्थक पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं। यह नाराजगी कई सीटों पर पार्टी को भारी पड़ती है तो अचम्भा नहीं होगा।

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