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पकौड़े पर गहराई राजनीति अपने ही जुमले में फंसे मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने ही जुमले में फंस गए हैं। पिछले महीने एक साक्षात्कार में सरकार द्वारा रोजगार के अवसर पैदा करने के वादे के मामले पर सवाल किया गया तब पीएम मोदी ने पकौड़ा तलने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर जी टीवी के बाहर कोई व्यक्ति पकौड़ा बेच रहा है तो क्या वह रोजगार होगा या नहीं? मोदी का ये बोलना था कि विपक्षी दलों से लेकर आम लोगों तक ने मोदी को घेरना शुरु कर दिया। सोशल मीडिया पर तो तरह-तरह के कमेंट किए जा रहे हैं। रही-सही कसर राज्यसभा में अमित शाह ने पकौड़े की वकालत कर पूरी कर दी। जिस तरह से पकौड़ा तूल पकड़ता जा रहा है उससे तो यही लग रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव में पकौड़े का मुदï्दा बनना तय है। भले ही 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी अपने चाय के जुमले पर चुनाव जीत गए, जरूरी नहीं कि इस बार उनका यह जुमला फिट बैठेगा। मोदी अपने भाषणों में युवाओं का बढ़-चढक़र जिक्र करते हैं और देश में सबसे ज्यादा वोटर भी युवा ही हैं। देखना दिलचस्प होगा कि मोदी के पकौड़े बेचने की सलाह युवाओं को रास आती है या नहीं।

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। माहौल कब किसके पक्ष में हो जाए और कब विपरीत हो जाए कहा नहीं जा सकता। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी का चाय का जुमला हिट गया था। अपनी चुनावी रैलियों में वह खूब चाय का सहारा लिए। सत्ता में आने के बाद भी वह राज्यों के विधानसभा चुनाव में चाय का जिक्र करना नहीं भूलते थे। लेकिन इस बार उनका जुमला उन पर भारी पड़ता दिख रहा है। जिस तरह उन्होंने पकौड़े बेचने को रोजगार की श्रेणी में ला दिया उससे युवाओं में खासा आक्रोश है। पढ़े-लिखे युवा अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। जबकि मोदी ने 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान युवाओं को प्रतिवर्ष 1 करोड़ रोजगार के अवसर देने का वादा किया था। मई माह में सरकार के कामकाज के चार साल पूरे हो जायेंगे लेकिन सरकार दो करोड़ लोगों को भी रोजगार के अवसर नहीं उपलब्ध करा पायी है। कुछ दिनों पहले जारी हुए अंतरराष्टï्रीय श्रम संगठन (आईएलओ)की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में भारत में 3.5 प्रतिशत की बेरोजगारी रहने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह 3.4 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 और 2019 में देश में बेरोजगारी की दर 3.5 प्रतिशत होगी। 2017 की अपनी रिपोर्ट में आईएलओ ने भारत में बेरोजगारी दर 2017 और 2018 में 3.4 प्रतिशत पर पेश की थी। आईएलओ ने कहा कि वैश्विक स्तर पर बेरोजगारी की दर में तीन साल में पहली बार गिरावट आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में देश में बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ और 2019 में 1.89 करोड़ हो जाएगी। यह आंकड़ा 2017 में 1.83 करोड़ था। आईएलओ के अनुमानों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 2012 में 3.6 प्रतिशत से घटकर 2014 में 3.4 प्रतिशत रह गई। हालांकि, 2015 में यह 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गई और तब से बेरोजगारी की दर अपरिवर्तित रही है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर (3.4 प्रतिशत से 3.5 प्रतिशत) बढ़ी है और यह अगले तीन साल तक बढ़ती रहेगी, जबकि दुनिया में इसकी औसत दर (5.8 प्रतिशत से 5.6 प्रतिशत) घटी है और आगे भी घटती रहेगी। जाहिर है यह रिपोर्ट चिंता बढ़ाने वाली है। युवा वर्ग खासा चिंतित है। जिस तरह सोशल मीडिया पर पकौड़े पर बहस हो रही है वह सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है।
मोदी सरकार ने सत्ता पर काबिज होते ही रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े तामझाम के साथ अनेक घोषणाएं कीं जिनसे युवाओं में रोजगार पाने की उम्मीद जगना स्वाभाविक था। इनमें मेक इन इंडिया से सरकार को ही नहीं युवाओं को भी नौकरियों की बड़ी उम्मीद थी। इसके लिए अनेक क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला गया उनमें विदेशी निवेश की सीमा भी बढ़ायी गयी। स्टार्ट अप इंडिया से काफी उम्मीदें बनी थीं, पर जमीन पर मेक इन इंडिया बेअसर ही रही।
मोदी अपने हर भाषण में कहते हैं कि हमारा देश युवाओं का देश है। हमारी आबादी में 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र के लोगों का है। जाहिर है वोट का प्रतिशत भी युवाओं का ज्यादा है। चुनावों में युवा वर्ग निर्णायक भूमिका में होता है और अब जब युवाओं में पकौड़े को लेकर नाराजगी है तो विपक्षी दल इसे मुदï्दा बनाये रखने में पीछे नहीं हटेंगे। विपक्षी दलों की कोशिश है कि यह मुदï्दा 2019 तक जिंदा रहे ताकि चुनावों में इसे बीजेपी के खिलाफ भुनाया जा सके। फिलहाल विपक्ष इस मामले को लेकर सरकार को घेरने में लगा है और युवा अपनी भड़ास सोशल मीडिया पर निकाल रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में युवा मतदाता पकौड़ा का फार्मूला याद कर वोट देने जायेंगे या…।

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