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CM योगी का बढ़ रहा है कद मोदी के बाद सबसे ज्यादा योगी की डिमांड

उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने के बाद से जिस तरह योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता में इजाफा हुआ उससे बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी हैरान रह गए। अपने तेवर और कामकाज की शैली से योगी ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में चर्चा में रहे। दिनों-दिन बढ़ती उनकी लोकप्रियता की वजह से आज आलम यह है कि वह बीजेपी के स्टार प्रचारक की सूची में सबसे ऊपर आ गए हैं। हालत यह है कि जिन राज्यों में चुनाव होने है वहां पीएम मोदी के बाद सबसे ज्यादा डिमांड सीएम योगी आदित्यनाथ की है। गुजरात का चुनाव हो गया हिमाचल का, दोनों राज्यों से योगी की मांग हुई थी। अब जब कर्नाटक और त्रिपुरा में चुनाव है तो फिर उन्हें चुनाव प्रचार के लिए बुलाया जा रहा है। त्रिपुरा में 25 साल से सत्ता में काबिज वामपंथियों को उखाड़ फेंक हिंदुत्व का अलख जगाने का जिम्मा सीएम योगी के कंधों पर है। भले ही सियासी गलियारे में ऐसी चर्चा होती है कि सीएम योगी की लोकप्रियता बीजेपी के एक खेमे को रास नही आ रही, लेकिन उनकी लोकप्रियता की वजह से नजरअंदाज करने की कूबत किसी में नहीं है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनाव प्रचार के लिए डिमांड बढ़ गयी है। जिन राज्यों में चुनाव प्रस्तावित हैं, वहां योगी के प्रचार की मांग जोर पकड़ती दिख रही है। पिछले महीने हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में योगी स्टार प्रचारक की भूमिका में दिखे थे। इतना ही नहीं केरल में ‘लाल आतंक’ के खिलाफ भी भाजपा के लिए योगी मुख्य किरदार में दिखे थे और अब जबकि पार्टी का फोकस नॉर्थ ईस्ट है, योगी एक बार फिर बड़ी भूमिका निभाते दिख रहे हैं। दरअसल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की छवि है। भाजपा उनकी इसी छवि का प्रयोग करती आ रही है। पिछले दिनों योगी त्रिपुरा में दो दिन के लिए गए थे। इन दो दिनों में उन्होंने कई चुनावी रैलियों को संबोधित किया। दरअसल, त्रिपुरा बीजेपी ने वामपंथियों से मुकाबले के लिए सीएम योगी की सबसे ज्यादा मांग की थी। योगी की लोकप्रियता और राज्य के सियासी समीकरणों को देखते हुए ही बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ की कई रैलियों का आयोजन किया था। बीजेपी का तर्क था कि त्रिपुरा में करीब 35 फीसदी बंगाली नाथ संप्रदाय से जुड़े हैं। यह वही संप्रदाय है, जिसे यूपी के सीएम योगी ने अपनाया है, इसलिए वहां के लोग योगी को सुनेंगे। नाथ संप्रदाय को जहां केंद्र में ओबीसी श्रेणी में रखा गया है, वहीं त्रिपुरा में यह सामान्य श्रेणी का ही हिस्सा हैं। बीजेपी को उम्मीद है कि योगी के त्रिपुरा आने से उन पर अच्छा असर पड़ेगा। त्रिपुरा में रह रहे बंगाली दरअसल बांग्लादेश से आए हुए बंगाली हैं जो अभी भी यह बातें करते हैं कि किस तरह बंग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार किए गए थे। ऐसे में बीजेपी का मानना है कि योगी के राज्य में प्रचार करने से इन वोटरों को पार्टी के पक्ष में लाया जा सकेगा। वहीं त्रिपुरा के बाद कर्नाटक में चुनाव होने हैं, यहां भी पीएम नरेंद्र मोदी के बाद सबसे अधिक डिमांड योगी की ही है।
जिस तरह से बीजेपी अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए सीएम योगी को भेज रही है उससे लगता है कि संघ परिवार ने समझ लिया है कि योगी के सहारे मुस्लिम तुष्टीकरण और जातीय गणित से सत्ता हासिल करने में जुटे दलों व नेताओं को चुनावी रण में पटकनी दी जा सकती है। यह भरोसा अकारण नहीं है। इसके पीछे भगवा टोली के रणनीतिकारों का परीक्षण से निकला निष्कर्ष है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पश्चिमी इलाके से योगी को पहले ही चरण के प्रचार में उतारने का प्रयोग सफल रहा था। बिना राम मंदिर और अयोध्या का जिक्र किए पूरा चुनाव हिंदुत्व बनाम अन्य में विभाजित हो गया था। भाजपा को अच्छी संख्या में सीटें मिलीं। इसीलिए रणनीतिकारों की योगी से
उम्मीदें बढ़ी हैं। वे अब उसी प्रयोग को अन्य राज्यों में कर रहे हैं।
राजनैतिक पंडितों को उम्मीद थी कि यूपी की सत्ता संभालने के बाद उनकी छवि बदलेगी। जाहिर है मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए वह उस तरह हिंदुत्व को धार नहीं दे पायेंगे लेकिन योगी ने सत्ता संभालने के बाद जिस तरह स्लाटर हाउस बंद कराए, ‘अगर सडक़ पर नमाज हो सकती है तो थानों में जन्माष्टमी क्यों नहीं, ताजियों या मूर्ति विसर्जन के नाम पर किसी पेड़ की एक डाल भी नहीं कटनी चाहिए’ जैसे बयान दिए, उससे उनकी छवि और चमक गई। योगी ने अयोध्या जाने का विरोध करने वालों पर ‘हम अपनी आस्था का सम्मान करने को स्वतंत्र हैं जिन्हें आपत्ति हो तो होती रहे’ जैसे बयानों से पलटवार किया तो वहीं अयोध्या में छोटी दिवाली के दिन बड़ा समारोह कर देश को यह संदेश देने में सफल रहे कि वह उनमें नहीं है जो किसी को खुश करने के लिए हिंदुत्व के सरोकारों पर रक्षात्मक रवैया अपनाएं अथवा उन सरोकारों के प्रति समर्पण दिखाने से बचें। जाहिर है, वह अब वोट दिलाऊ नेता की छवि बना चुके हैं।

राजनैतिक पंडितों को उम्मीद थी कि यूपी की सत्ता संभालने के बाद उनकी छवि बदलेगी। जाहिर है मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए वह उस तरह हिंदुत्व को धार नहीं दे पायेंगे लेकिन योगी ने सत्ता संभालने के बाद जिस तरह स्लाटर हाउस बंद कराए, ‘अगर सडक़ पर नमाज हो सकती है तो थानों में जन्माष्टमी क्यों नहीं, ताजियों या मूर्ति विसर्जन के नाम पर किसी पेड़ की एक डाल भी नहीं कटनी चाहिए’ जैसे बयान दिए, उससे उनकी छवि और चमक गई।

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