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गुरु-शिष्य में दरार!

जनचेतना रैली में उपजी हरीश-प्रीतम में दूरियां
अपनी ढफली अलग बजा रहे पूर्व मुख्यमंत्री

रावत की प्रीतम के साथ मतभेद या बिगडऩे की बात तब सामने आई जब कांग्रेस की जन चेतना रैली में वह नजर नहीं आए। इसको लेकर मीडिया जहां सक्रिय हुई वहीं पार्टी के लोगों को भी लगा कि दाल में कहीं काला है। जब यह मुद्दा उछलने लगा तो इसी बीच हरीश ने यह बयान दे कर आग में घी डालने का काम किया कि अच्छा होता अगर अध्यक्ष उनको भी रैली के लिए न्यौता देते। इससे यह सन्देश गया कि प्रीतम नहीं चाहते कि हरीश अब प्रदेश की सियासत में रूचि ले और कार्यक्रमों में शामिल हो। प्रीतम ने लेकिन हाथों-हाथ यह साफ कर डाला कि पार्टी की तरफ से रावत की कोई अनदेखी नहीं की गई। उनको रैली में शामिल होने की दावत दी गई थी।

देहरादून। उत्तराखंड बनने से पहले और बाद में जब तक प्रीतम सिंह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नहीं बने, उनके और देश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार पूर्व मुख्यमन्त्र हरीश रावत में रिश्ते बहुत मधुर थे। प्रीतम को रावत के मरजीवड़ों में शुमार किया जाता था। वह अपने सियासी गुरु के लिए कुछ भी करने को तैयार दिखते थे। कांग्रेस खानदान और पीढ़ी वाले प्रीतम ने कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ा। जब राज्य में पहले विधानसभा चुनाव हुए तो एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर वह भी नाराज कांग्रेसियों में शामिल थे। रावत के लिए वह मुख्यमंत्री से टकराते रहते थे। यह आलम तब था जब तिवारी ने उनको न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल में जगह दी थी, बल्कि उनको पसंद आने वाले मंत्रालय भी सौंपे थे। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया जो आज दोनों को विपरीत ध्रुव कहा जाने लगा है। इसके पीछे शायद प्रीतम को अध्यक्ष बनाया जाना न भाना हो सकता है। ऐसा सियासत की समझ रखने वाले सोच रहे हैं। यह बात अलग है कि दोनों सुलझे हुए हैं और अपने विरोध और अंतर्विरोध को जगहंसाई के स्तर पर आने नहीं दिया है।
रावत की प्रीतम के साथ मतभेद या बिगडऩे की बात तब सामने आई जब कांग्रेस की जन चेतना रैली में वह नजर नहीं आए। इसको लेकर मीडिया जहां सक्रिय हुई वहीं पार्टी के लोगों को भी लगा कि दाल में कहीं काला है। जब यह मुद्दा उछलने लगा तो इसी बीच हरीश ने यह बयान दे कर आग में घी डालने का काम किया कि अच्छा होता अगर अध्यक्ष उनको भी रैली के लिए न्यौता देते। इससे यह सन्देश गया कि प्रीतम नहीं चाहते कि हरीश अब प्रदेश की सियासत में रूचि ले और कार्यक्रमों में शामिल हो। प्रीतम ने लेकिन हाथों-हाथ यह साफ कर डाला कि पार्टी की तरफ से रावत की कोई अनदेखी नहीं की गई। उनको रैली में शामिल होने की दावत दी गई थी। वह नहीं पहुंचे तो इसकी वजह वही जानते होंगे।
इन दो बयानों से पहले से ही आपसी झगड़ों और विभाजन के कारण प्रदेश में कमजोर पड़ी कांग्रेस में अंतर्विरोध की नई कहानी लिख डाली। यह हैरत की बात है कि दोनों ने ऐसे बयान दिए, जो पार्टी को नुक्सान ही पहुंचाते हैं। दोनों बहुत परिपक्व नेता हैं और ठेठ कांग्रेसी हैं। ऐसे में यह देखा जाने लगा है कि आखिर वह कौन सी वजह है, जिसके कारण दोनों आपस में टकरा रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर लड़े और हार कर रावत ने खुद को प्रदेश और देश की कांग्रेस सियासत में कमजोर कर डाला है। उनके बारे में समझा जा रहा है कि वह अब प्रदेश की सियासत से दूर और केंद्र की सियासत में जाने की मंशा रखते हैं। साथ ही लोकसभा चुनाव का टिकट मिलने तक खुद को सक्रिय रखकर और अपना कद बनाए रखने के लिए वह प्रदेश भर का दौरा भी करते जा रहे हैं। इसके लिए वह पार्टी के प्रदेश या केन्द्रीय नेतृत्व से कोई निर्देश भी नहीं ले रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व को उनका यह अंदाज रास नहीं आ रहा है। वह चाहता है कि हरीश जो भी करे, नेतृत्व को विश्वास में लेकर करे। प्रीतम को यह लग सकता है कि हरीश उनको नजर अंदाज कर रहे हैं और खुद के कद को कम नहीं होने देना चाहते हैं। टिकट भी वह अपने दम पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। शायद ही किसी नेतृत्व को उनका ऐसा रुख पसंद हो।
रावत भी कभी नहीं चाहेंगे कि उनका ही शिष्य उनसे आगे निकल जाए और रफ्तार हासिल कर ले। इससे उनके अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा सकता है। अगर वह जन चेतना रैली में शरीक होते तो इसकी सफलता का श्रेय तब भी प्रीतम को ही मिलना था इसलिए वह शायद रैली से कन्नी काट गए। जब उनको लगा कि उनकी रैली में गैर मौजूदगी उनको भविष्य में भारी पड़ सकती है तो उन्होंने यह कह कर खुद को बचाना चाहा कि उनको इसके लिए बुलाया ही नहीं गया था। दूसरी तरफ रावत की उलट बांसी से भीतर ही भीतर खार खाए प्रीतम ने भी साफ कर दिया कि हरीश को रैली के लिए निमंत्रित किया गया था। रावत अब खुद को बचाने के लिए नेतृत्व पर न बुलाने का आरोप नहीं लगा रहे हैं। वह सफाई में कह रहे हैं कि उनके व्यक्तव्य को गलत सन्दर्भ में पेश किया गया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि रैली में हमको भी बुला लेते।
जब उनको बताया गया कि उनको इसकी सूचना दे दी गई थी, तो अब वह सफाई दे रहे हैं कि हो सकता है उनके यहां ही सूचना दब गई हो। वैसे देहरादून में एक अन्य कार्यक्रम में दोनों नेताओं ने एक साथ बैठ और बात करने के साथ ही मुस्कुराते हुए काना-फूसी कर यह सन्देश कार्यकर्ताओं और लोगों को देने की कोशिश की है कि दोनों में कोई मतभेद नहीं है और पार्टी ठीक चल रही है। देखना होगा दोनों के बीच वाकई मन की गांठ खत्म हो गई है या फिर कोई नया विवाद फिर पैदा होता है।

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