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भारत-ईरान संबंधों का बढ़ता दायरा और फायदे

चाबहार-जहिदान रेल लाइन के विकास में भी भारत सहयोग को राजी है। कुल मिलाकर ईरान से बढ़ती नजदीकी और चाबहार पोर्ट का विकास भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। यह दोनों देशों के आर्थिक विकास को भी निकट भविष्य में गति देगा। भारत की इस सफलता से चीन और पाकिस्तान दोनों ही परेशान हैं। चीन को डर है कि चाबहार पर भारत की मौजूदगी उसके पाकिस्तान में उपस्थिति के लिए ठीक नहीं होगी। कुल मिलाकर ईरान के जरिए भारत चीन को घेरने में सफल रहा है। इसके अलावा जिस तरह से ईरानी राष्टï्रपति ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देने का ऐलान किया है, वह पाकिस्तान के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

भारत और ईरान के बीच नजदीकियां तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले दिनों राष्टï्रपति हसन रूहानी भारत के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे। इस दौरान दोनों देशों के बीच नौ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इस मौके पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्टï्रपति रूहानी ने एकजुट होकर आतंकवाद से लडऩे का संकल्प लिया। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की वकालत की। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम समझौता रणनीतिक रूप से बेहद अहम चाबहार पोर्ट को लेकर हुआ। पोर्ट के फेज वन को 18 महीने के लिए भारतीय कंपनी को लीज पर सौंप दिया गया है। भारत, ईरान और अफगानिस्तान इस पोर्ट के जरिये ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने के लिए पूर्व में त्रिपक्षीय समझौता कर चुके हैं। सवाल यह है कि भारत और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियों का वैश्विक कूटनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या चाबहार पोर्ट पर भारत की उपस्थिति चीन और पाकिस्तान पर सुरक्षा और सैन्य लिहाज से असर डालेगी? क्या अन्य करारों से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को गति मिल सकेगी? क्या आतंकवाद के मुद्दे पर ईरान का साथ भारत को और मजबूत करेगा? क्या दोनों देशों की दोस्ती चीन की वन बेल्ट, वन रोड नीति का जवाब है?
भारत और ईरान के संबंध काफी प्राचीन है। समय-समय पर भारत और ईरान एक दूसरे के साथ खड़े होते रहे हैं। अमेरिका से भारत की बढ़ती दोस्ती का भी इस पर कोई असर नहीं पड़ा है। कूटनीति और आर्थिक दृष्टिï से भी दोनों देश आपसी संबंधों को और मजबूती देना चाहते हैं। यही कारण है कि रूहानी के दौरे के दौरान स्वास्थ्य, सुरक्षा, व्यापार समेत कई समझौते किए गए। चाबहार पोर्ट का निर्माण और संचालन भी इसी आपसी जरूरत का परिणाम है। आर्थिक तंगी से जूझ रहा ईरान अपने यहां भारत से भारी निवेश की उम्मीद लगाए बैठा है। भारत के भी अपने हित हैं। पश्चिम एशिया व यूरोप तक जमीनी संपर्क बनाने के लिए भारत ने ईरान में चाबहार पोर्ट को विकसित करने के लिए समझौता किया था। इस समझौते में अफगानिस्तान भी शामिल है। अब ईरान चाबहार में बने इंडस्ट्रियल जोन में भारत से निवेश की उम्मीद कर रहा है। भारत राजी है और यहां वह जापान के साथ निवेश करने जा रहा है। दूसरी ओर चाबहार पोर्ट के विकास ने ईरान के व्यापार पर काफी असर डाला है। उसका व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। पहले जो जहाज कराची जाते थे, अब वे सीधे चाबहार होकर आगे बढ़ रहे हैं। खराब आर्थिक हालत से जूझ रहे ईरान के लिए यह फायदे का सौदा साबित हो रहा। भारत को भी इससे कई फायदे मिलेंगे। भारत ईरान से सस्ती दरों पर प्राकृतिक गैस चाहता है। इसके लिए वह ईरानी सरकार से लगातार बातचीत कर रहा है। उम्मीद है दोनों देश इस पर निकट भविष्य में राजी हो जाएं। इसके अलावा भारत चाबहार पोर्ट से चीन द्वारा पाकिस्तान में बनवाए गए ग्वादर पोर्ट पर जारी गतिविधियों पर भी नजर रख सकता है। बकौल पीएम नरेंद्र मोदी चाबहार पोर्ट अफगानिस्तान और मध्य एशिया क्षेत्र के गोल्डन गेटवे के तौर पर काम करेगा। चाबहार-जहिदान रेल लाइन के विकास में भी भारत सहयोग को राजी है। कुल मिलाकर ईरान से बढ़ती नजदीकी और चाबहार पोर्ट का विकास भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। यह दोनों देशों के आर्थिक विकास को भी निकट भविष्य में गति देगा। भारत की इस सफलता से चीन और पाकिस्तान दोनों ही परेशान है। चीन को डर है कि चाबहार पर भारत की मौजूदगी उसके पाकिस्तान में उपस्थिति के लिए ठीक नहीं होगी। कुल मिलाकर ईरान के जरिए भारत चीन को घेरने में सफल रहा है। इसके अलावा जिस तरह से ईरानी राष्टï्रपति ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देने का ऐलान किया है, यह पाकिस्तान के लिए परेशानी का सबब
बन सकता है।

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