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करोड़ों के घोटालेबाजों को सरकार की शह!

आबकारी  बैंक गारंटी घोटाला

देहरादून। आबकारी महकमे में करोड़ों रूपये का बैंक गारंटी घोटाला सामने आ चुका है लेकिन जीरो टॉलरेंस का ऐलान देश और प्रदेश में करने वाली बीजेपी सरकार ने अभी तक इस मामले में कोई ऐसा कदम नहीं उठाया है, जो जाहिर करे कि वह इस घोटाले के दोषियों को दण्डित करना चाहता है। अभी तक न तो किसी घोटालेबाज दुकान मालिक या फर्म के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाया गया है न ही इसको अंजाम देने वालों को शह देने वाले अफसर पर ही कोई कार्रवाई की गई है। इसके चलते पहले ही एनएच-74 घोटाले की सीबीआई जांच न होने के कारण निशाने पर आए त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार की मंशा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शक के दायरे में ला दिया है।
आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त ने मान लिया है कि प्रदेश में कई जिलों में शराब की दुकानों के मालिकों ने बैंक गारंटी या तो जमा ही नहीं की या फिर फर्जी गारंटी जमा कर दी थी। उनका कहना है कि जिन दुकानों के मालिकों ने गारंटी जमा नहीं की है, उनसे पैसा जमा कराने की कार्रवाई शुरू हो गई है। पैसा जमा नहीं होता है तो उनके खिलाफ कुर्की की कार्रवाई की जाएगी। हैरत की बात है कि आबकारी महकमे के अफसरों ने इस मामले में शासन के अफसरों और अपर मुख्य सचिव डॉ. रणबीर सिंह तक की अनदेखी की। मंत्री को भी वे गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। हकीकत यह है कि फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर अफसरों ने मिलीभगत कर दुकानें न सिर्फ आवंटित कर दीं, बल्कि जब तक मुमकिन हो सका घोटाले को छुपा कर भी रखा। जब उनको लगा कि मामला अब छिपाने की हद से बाहर जा रहा तब वे बेचैन हुए। इसके बाद ही उन्होंने दुकान मालिकों पर लाइसेंस शुल्क जल्द जमा करने का दबाव डालना शुरू किया। जब वे इसमें आनाकानी करने लगे तब उन्होंने जिला प्रशासन को चि_ी लिख कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की गुजारिश की।
देहरादून के जिलाधिकारी मुरुगेशन ने इस पर कार्रवाई करते हुए जिले के ऐसे दुकान मालिकों की संपत्ति की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी, लेकिन अभी तक कोई सफलता राजस्व वसूली में नहीं मिल रही है। अपर मुख्य सचिव सिंह ने माना कि जल्द वसूली नहीं हुई तो यह लटक जाएगा। पहली नजर में ही यह घोटाला ठीक इन दिनों देश-विदेश में छाए पीएनबी बैंक गारंटी घोटाले की तरह है। वहां भी फर्जी बैंक गारंटी दी गई और यहां भी। वैसे सरकार ने शुरू में फर्जी बैंक गारंटी से ही इनकार कर दिया था। अपर मुख्य सचिव को आयुक्त (आबकारी) षणमुगम ने सिर्फ गारंटी जमा न करने की बात बोली। वह भी तब जब खुद डॉ.सिंह ने उनसे पूछा। अब मंत्री ने खुद कह दिया है कि मामला फर्जी बैंक गारंटी से जुड़ा है। अहम सवाल यह है कि बैंक गारंटी न लेना खुद में बड़ा घोटाला है। इसका मतलब सरकार की पूरी प्रक्रिया को ही धता बता दी गई और अगर बैंक गारंटी फर्जी साबित हो चुकी है तो यह साजिश और घोटाला साफ-साफ है। इसमें सबसे पहले तो महकमे के दोषी या फिर जिम्मेदार अफसर अब तक नप जाने चाहिए थे। मामले का खुलासा होने के बावजूद अभी तक किसी भी अफसर के खिलाफ सामान्य निलंबन और जांच बिठाने जैसी कार्रवाई भी नहीं हुई है। व्यवस्था यह है कि बैंक गारंटी जब ली जाती है तो महकमे को संबंधित बैंक से गारंटी के बारे में पुष्टि करना पड़ता है। इन मामलों में ऐसा भी नहीं किया गया। ऐसा क्यों नहीं किया गया और किसकी शह पर दुकानों के मालिकों की करोड़ों की बैंक गारंटी के मामले को अनदेखा किया गया, यह जांच का विषय है।
काबिलेगौर है कि जब भी किसी के नाम दुकान का आवंटन होता है तो उसको वित्तीय वर्ष के फरवरी का राजस्व बैंक गारंटी के तौर पर और मार्च (जो कि आखिरी महीना है) का राजस्व नगद जमा कराना होता है और यह आवंटन के एक महीने के भीतर करना अनिवार्य है। इसमें विलम्ब होने की सूरत में 18 फीसदी की पेनाल्टी लगती जाती है। इस लिहाज से कई दुकानों पर, जिन्होंने पैसा जमा नहीं कराया है, करोड़ों का राजस्व बकाया हो चुका है। इनमें सबसे बड़ी दुकान देहरादून में रायवाला की है। यह देखने वाली बात है कि त्रिवेंद्र सरकार कब तक इस मामले को ढांपने में लगी रहती है और कब तक घोटालेबाज अफसरों को बचाए रखने की कोशिश करती है। अभी तो जिस अफसर के इशारे पर यह खेल हुआ, उसकी तूती जम कर बोल रही है। माना जाता है कि सरकार में बैठे लोगों के साथ ही बीजेपी के एक कद्दावर नेता का हाथ उस पर है। उसकी ही सलाह पर प्रदेश भर में जिला आबकारी अधिकारियों, निरीक्षकों के तबादले हुए और मुख्यालय के अफसरों को भी इधर-उधर कर दिया गया है, जिससे वह मनमानी खुलकर कर सके और किसी को कानों-कान भनक भी न लगे।

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