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बगावत में निशंक या चाणक्य कोई और?

क्या वाकई खतरे में है सरकार?

हर बगावत के पीछे रही है अहम भूमिका
त्रिवेंद्र के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्रियों का गठबंधन!

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ इन दिनों क्या बगावत की आंच वाकई तेज हो रही है? सवाल यह भी है कि क्या ऐसी कोई कोशिश चल भी रही है? क्या किसी में हिम्मत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के प्रिय मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई अप्रिय और पार्टी तथा सरकार को बेचैन करने वाली हरकत की जाए। इस सबसे इतर अहम बात यह है कि बीजेपी में बगावत की सुगबुगाहट के खेल में एक बार फिर डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक उभर कर आए हैं। उनका नाम उछलना इसलिए भी खास है कि जब भी बीजेपी सरकार में उथल-पुथल हुई और केन्द्रीय नेतृत्व को मुख्यमंत्री बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा, निशंक का नाम ही प्रमुखता से सामने आया था। इस बार उन्होंने अपने निजी आवास पर दो दर्जन विधायकों और पूर्व मुख्यमंत्रियों को चाय पार्टी उस वक्त दी, जब त्रिवेंद्र के खिलाफ बगावत की चर्चा तेजी से परवान चढ़ रही है। सवाल यह है कि क्या वाकई निशंक ऐसी कोई कोशिश या साजिश को अंजाम दे रहे हैं या फिर ऐसी साजिश चल भी रही है तो उसके पीछे निशंक ही है या कोई और ही चाणक्य की भूमिका में है और परदे के सामने नहीं आ रहा है।
यह संयोग भी हो सकता है कि निशंक ने चाय पार्टी महज लोक सभा चुनाव में नेताओं की भूमिका के बारे में चर्चा के लिए ही बुलाई हो, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं लगता कि यह सोचने का काम उनका है ही नहीं। वह पार्टी मंच पर तो अपनी बात और विचार रख सकते हैं लेकिन घर पर निजी पार्टी कर के ऐसा करना नेतृत्व को चुनौती देना या सामानांतर नेतृत्व तैयार करना जैसा कहा जाएगा। कई और कारण भी है। ऐसी बैठक उन्होंने क्या नेतृत्व की मंजूरी के बाद की या फिर सामान्य पार्टी ही बैठक में तब्दील हो गई अगर यह औपचारिक बैठक नहीं भी थी तो मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की गैर मौजूदगी में ऐसा करना क्या सही है। क्या निशंक या अन्य उपस्थित लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि जब त्रिवेंद्र के खिलाफ माहौल के बादल मंडराने लगे हैं तो ऐसी बैठक चर्चाओं को जन्म नहीं देगी, जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
कुछ विधायकों से बात कि तो उन्होंने बताया कि उनको बैठक जैसी बात की जानकारी थी ही नहीं। उनको तो चाय पार्टी के लिए बुलाया गया था। यह बात अलग है कि बैठक में ज्यादातर वही लोग पहुंचे जो त्रिवेंद्र से खफा समझे जाते हैं और उनको हटाना चाहते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, भगत सिंह कोश्यारी और बीसी खंडूड़ी भी पार्टी कम बैठक में थे। कोश्यारी और त्रिवेंद्र में अब रिश्ते मधुर नहीं रह गए हैं। कोश्यारी अपने पुराने शिष्य से नाखुश हैं। खंडूड़ी की त्रिवेंद्र से कभी बनी नहीं। जब वह मुख्यमंत्री थे और त्रिवेंद्र मंत्री, तब भी दोनों में छत्तीस का आंकड़ा ही रहा। बहुगुणा ने अपनी नाराजगी का इजहार कभी त्रिवेंद्र के खिलाफ नहीं किया लेकिन उनके विधायक बेटे सौरभ की अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात का ब्यौरा भले सामने नहीं आया है, लेकिन समझा जा रहा है कि सौरभ ने भी त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज पर असंतोष जताया है। तीनों के साथ निशंक का गठबंधन यही संकेत दे रहा है कि यह त्रिवेंद्र विरोधी गठबंधन की अनौपचारिक शुरुआत है। लोकसभा चुनाव से पहले यह गठबंधन न सिर्फ त्रिवेंद्र के लिए बल्कि बीजेपी नेतृत्व के लिए भी बहुत संवेदनशील है।
मोदी-शाह की जोड़ी जान रही है कि देश में अब उनका असर पहले जैसा नहीं रह गया है। हकीकत यह है कि दिनों-दिन मोदी-शाह विवादों में आ रहे हैं। अवाम में दोनों की लोकप्रियता में कमी दिख रही है। केंद्र सरकार पर तमाम तरह के आरोप लगने लगे हैं। सरकार के पास उपलब्धि के तौर पर बताने के लिए खास कुछ दिख भी नहीं रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस फिर से उठान पर है। पप्पू कह कर मजाक उड़ाने वाले अब राहुल गांधी को गंभीरता से लेने लगे हैं। लोक सभा चुनाव जबरदस्त और कांटे की रहने वाली है। ऐसा सियासी समीक्षक अभी से मान रहे हैं। ऐसे में मोदी-शाह के लिए उत्तराखंड भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। भले यहां सिर्फ पांच सीटें हैं, लेकिन बीजेपी के लिए हर सीट कीमती होती जा रही है। ऐसे में त्रिवेंद्र के कारण पार्टी में असंतोष भडक़ने को नेतृत्व दरकिनार नहीं कर सकता।
त्रिवेंद्र के खिलाफ असंतोष की आंच को भडक़ाने या ऑक्सीजन देने वाला कौन है, इस की भी खोज हो रही है। निशंक एक बार फिर इस पूरी मुहिम में चमक कर सामने आए हैं। वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार हमेशा माने जाते रहे हैं, और एक बार बीच में ही पदच्युत कर दिए जाने के बावजूद उनको कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी की रेस से बाहर नहीं माना गया है। वह फिर मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। उम्र भी उनके हक में है। इसलिए कोश्यारी, खंडूड़ी और बहुगुणा उनके कंधे पर बन्दूक रख कर त्रिवेंद्र पर निशाना साध रहे हैं। ऐसा समझा जा रहा है। इसमें कितनी सच्चाई है यह पता किया जा रहा है। इतना जरूर है कि सबको एक कर के मुहिम छेडऩे की हिम्मत और काबिलियत निशंक में ही है। कौन भूल सकता है कि अंतरिम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी, खंडूड़ी और उनके घुर विरोधी कोश्यारी को अपनी चाल से पटखनी देने वाले निशंक ही थे। इस बार वह त्रिवेंद्र के खिलाफ वाकई सक्रिय हैं तो हाई कमान के लिए निश्चित रूप से यह मुद्दा गंभीर और संवेदनशील हो जाता है।

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