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नाहक खर्चों का बोझ…

जिन लोगों का उत्तराखंड राज्य के गठन में कोई योगदान नहीं रहा, उनको क्यों अवाम के पैसे से ऐश कराई जा रही है। हर सरकार ने लाल बत्तियां जम कर बांटी। इससे हुआ क्या। नेताओं ने सरकारी खर्च पर जम कर देशाटन और विदेशाटन तक किया। सरकारी गाडिय़ों, टेलीफोन, बंगलों, मोटे भत्तों और नौकर-चाकरों का मुफ्त में आनंद लिया। दूसरी तरफ सीने पर गोलियां खा कर राज्य गठन कराने वाले या शहीदों के परिवारों को चतुर्थ श्रेणियों की नौकरियां मिलीं। कइयों को वह भी नहीं मिली। भ्रष्टाचार का हिमालय उठ खड़ा हुआ…

94 की बात है। उत्तराखंड आन्दोलन चरम पर था। आन्दोलनकारी खटीमा, मसूरी, मुजफ्फरनगर,देहरादून में शहादतें बढ़-चढ़ कर दे रहे थे। उनके चेहरे पर न तो उत्तर प्रदेश पुलिस के डंडों और न ही पीएसी की गोलियों का खौफ दिखाई देता था। वे जान की बाजी लगा कर आन्दोलन को जंगल की आग की रफ्तार से बढ़ा रहे थे। तब लोगों में जूनून था। क्या युवा, प्रौढ़, वृद्ध, स्त्री-पुरुष, कर्मचारी, मजदूर, बच्चे, स्वयंसेवी संगठन, खिलाड़ी और क्या राजनेता, सबकी एक ही इच्छा होती थी और उनके दिलों में सिर्फ अलग राज्य के सपने का वास होता था। सच तो यह है कि ज्यों-ज्यों आन्दोलन तेज होता गया, खुद सुरक्षा बलों के दिलों में भी आन्दोलनकारियों के लिए सहानुभूति के बीज अंकुरित होने लगे थे। वे मजबूर होने पर ही आन्दोलनकारियों पर सख्ती करते थे। उनको भी लगने लगा था कि अहिंसक और सही मांग से जुड़े आन्दोलन को मंजिल जरूर मिलनी चाहिए। जेल जाना तब आन्दोलनकारी युवा, बुजुर्गों, महिलाओं और कर्मचारियों के लिए फख्र की बात होती थी। सब खुशी-खुशी पुलिस की गाडिय़ों में लद कर जेल जाते थे। उनको उम्मीद थी अपना राज्य बनेगा जरूर। फिर उनके सभी सपने पूरे होंगे। अपने लोग सत्ता में होंगे। अपने पहाड़ और वहां रहने वालों की तकलीफें दूर होंगी। उनकी मेहनत और शहादतों ने उत्तर प्रदेश की मुलायम और केंद्र की वाजपयी सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। जिस दिन उत्तराखंड राज्य के गठन से जुड़ा प्रस्ताव संसद में पास हुआ तो देहरादून समेत समूचे गढ़वाल और कुमायूं में लोग झूम उठे थे।
शायद उनको आने वाले दिनों के बारे में कतई अंदाज नहीं था। आठ और नौ नवम्बर 2000 की आधी रात को जब बीजेपी की अंतरिम सरकार नित्यानंद स्वामी की अगुवाई में परेड मैदान पर शपथ ले रही थी तो बीजेपी के कई दिग्गजों ने मुख्यमंत्री चयन के विरोध में शपथ ही नहीं ली। तभी अहसास हो गया था कि शिशु पहाड़ी राज्य आने वाले दिनों में कैसे दिन देखेगा। इसके बाद यहां अस्थिर सरकारों का दौर शुरू हुआ। शुरुआत बीजेपी ने ही की। स्वामी को बीच में ही चलता कर दिया। भगत सिंह कोश्यारी को पहले आम चुनाव से पहले एक और अंतरिम मुख्यमंत्री बना दिया। फिर कांग्रेस सरकार आई तो एनडी तिवारी अपने दमखम और अनुभव के बूते सरकार खींच ले गए लेकिन फिर बीजेपी और कांग्रेस की सरकारें असंतोष को झेल नहीं पाई और मुख्यमंत्री तथा मंत्री बदलने के लिए मजबूर होते रहे। यह तो पार्टी का आन्तरिक मामला था। लिहाजा आम लोगों ने इससे ज्यादा वास्ता नहीं रखा, लेकिन इसके बाद जब नेताओं को लाल बत्तियां इफरात में बंटने लगी तो मामला तूल पकड़ता रहा। अवाम को ठगे जाने जैसा अहसास होने लगा था।
यह सवाल उठने लगा कि जिन लोगों का उत्तराखंड राज्य के गठन में कोई योगदान नहीं रहा, उनको क्यों अवाम के पैसे से ऐश कराई जा रही है। हर सरकार ने लाल बत्तियां जम कर बांटी। इससे हुआ क्या। नेताओं ने सरकारी खर्च पर जम कर देशाटन और विदेशाटन तक किया। सरकारी गाडिय़ों, टेलीफोन, बंगलों, मोटे भत्तों और नौकर-चाकरों का मुफ्त में आनंद लिया। दूसरी तरफ सीने पर गोलियां खा कर राज्य गठन कराने वाले या शहीदों के परिवारों को चतुर्थ श्रेणियों की नौकरियां मिलीं। कइयों को वह भी नहीं मिली। भ्रष्टाचार का हिमालय उठ खड़ा हुआ। जितने घोटाले और भ्रष्टाचार उत्तराखंड में हुए उतने 17 सालों में शायद ही किसी अन्य राज्य में हुए। उत्तराखंड के साथ ही झारखण्ड और छतीसगढ़ भी जन्मे थे। वहां भी भ्रष्टाचार है, पर उत्तराखंड उन पर इस मामले में बहुत भारी साबित हुआ है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोगों को बीजेपी से बहुत उम्मीदें थीं। विधानसभा चुनाव में लोगों ने जम कर कमल के फूल पर खाद-पानी डाला। कांग्रेस का सूपड़ा साफ जैसा हुआ। बीजेपी सत्ता में आई।
सरकार को 10 महीने हो चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत उम्मीदों के मुताबिक प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं। आम लोगों में जो असंतोष है सो है, पार्टी में ही इन दिनों जिस तरह असंतोष का बुलबुला फूट पड़ा है, वह त्रिवेंद्र के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। इसी बीच दो ऐसे मामले सामने आए, जिससे अवाम और हर तबका हैरान है। एक मामला तो मुख्यमंत्री के चाय-पानी के खर्च से जुड़ा है और दूसरा विमान तथा हेलीकॉप्टर उड़ान से। मुख्यमंत्री कार्यालय में चाय-पानी पर जो खर्च आया है वह 68 लाख रूपये है। सिर्फ 10 महीने में इतना खर्च। यह हैरान से ज्यादा परेशान करता है। आखिर हर महीने सात लाख रूपये तकरीबन चाय-पानी पर खर्च कैसे हो सकता है। यह सवाल आंकड़ेबाजों को भी मथ रहा है। इस खर्च पर इसलिए भी ऊंगली उठाई जा रही है कि त्रिवेंद्र की प्रतिष्ठा एनडी तिवारी, हरीश रावत और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जैसी नहीं है, जो मुख्यमंत्री रहने के दौरान आधी रात के बाद तक रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलते थे। चाय-पानी पर खर्च तब भी कभी इतना नहीं आया।
अभी इस खर्च पर सरकार और बीजेपी बैकफुट पर ही है और अब सूचना के अधिकार से मिली जानकारी में पता चला है कि सरकार ने हवाई यात्राओं पर दस महीने में ही छह करोड़ रूपये उड़ा डाले हैं। यह ठीक है कि मुख्यमंत्री के पास बहुत काम रहता है। वे ज्यादा वक्त के लिए देहरादून से दूर नहीं रह सकते हैं। पहाड़ी राज्य है। इसलिए उनको हवाई यात्रा का सहारा लेना पड़ता है। इसके बावजूद इसको एक सीमा तक ही ठीक कहा जा सकता है। जिस राज्य के पास तनख्वाह और भत्ते देने के लिए पैसे न हो, वहां का मुखिया तो दूर उनके चेले-चपाटों तक का विमान और हेलिकॉप्टर में सफर करना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता है। फेसबुक पर मुख्यमंत्री के चेले और निजी स्टाफ के लोग जब-तब अपनी सेल्फियां विमान और हेलिकॉप्टर से डालते रहते हैं। ये सबूत हैं विमान और हेलिकॉप्टर के दुरूपयोग का। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब मुख्यमंत्री मैदानी शहर के भीतर भी हेलिकॉप्टर से ही पहुंचे हैं। त्रिवेंद्र पहाड़ से हैं। उनकी प्रतिष्ठा अभी तक घोटालों से दूर ही रहने वाले मुख्यमंत्री की है, पर उनका उड़ान प्रेम लगता है उनके साथ ही राज्य के लिए भी भारी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री की देखा-देखी मंत्री तो छोड़ो, नौकरशाह तक हवाई सफर से नीचे बात नहीं कर रहे हैं। उनकी शह पर पिछली सरकार के बाद अब मौजूदा सरकार में भी घुस पैठ कर चुके उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के ठेकेदार तक जब-तब पिछली कांग्रेस सरकार में सरकारी हेलिकॉप्टर से पहाड़ में निर्माण कार्यों को देखने के नाम पर मुफ्त में उड़ान भरते रहते थे।
होना तो यह चाहिए कि पहाड़ी राज्य होने कारण यहां अपवाद स्वरुप मुख्यमंत्री ही हवाई यात्रा करें। वह भी कम से कम। मंत्रियों तथा नौकरशाहों को पहाड़ का सफर कोई विकल्प न होने और विशेष परिस्थितियों में ही हेलीकॉप्टर या विमान से करने की सुविधा मिलनी चाहिए। हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश के विभाजन से पहले जितने मंत्री और बड़े अफसर पहाड़ सडक़ मार्ग से आते थे, उत्तराखंड बनने के बाद उसके आधे भी पहाड़ नहीं पहुंच रहे हैं। उत्तराखंड कैडर और पहाड़ी मूल के ही मंत्री और अफसर भी जब देहरादून ही बैठे रहेंगे या सिर्फ हवाई सेवा मिलने पर पहाड़ जाएंगे तो राज्य का विकास कैसे होगा। आज मंत्रियों को पहाड़ में विकास कार्यों के बारे में सही जानकारी का अभाव इसीलिए है कि वे मौके पर पहुंचते ही नहीं हैं। अफसरों ने जितना बता दिया उतना वे जानते हैं। इसके चलते पहाड़ी इलाकों में 17 साल से अरबों रूपये खर्च होने के बावजूद विकास बहुत मामूली दिखता है। इतने पैसों में तो उत्तराखंड स्विट्जरलैंड बन जाता। सडक़ मार्ग से सफर करने पर ही मंत्रियों को वास्तविक तस्वीर की जानकारी मिल सकती है। हवा में उडऩे से नहीं। उम्मीद है कि देर होने से पहले त्रिवेंद्र सरकार जाग जाएगी।

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