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नालापानी युद्ध पर नेपाल में फिल्में

ईस्ट इंडिया कंपनी को नाको चने चबवाए थे गोरखा फौज ने

देहरादून। 1814 में देहरादून में ईस्ट इंडिया कंपनी और गोरखा फौज के बीच नालापानी की पहाड़ी पर घने जंगल में हुए युद्ध की मिसाल गोरखा सैनिकों और उनके परिवार के लोगों की बहादुरी और हिम्मत के कारण दी जाती है। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना के ब्रिगेडियर जिलेस्पी को जान से हाथ धोना पड़ा था। बलभद्र कुंवर के नेतृत्व में गोरखा फौज की इस बहादुरी पर नेपाल में एक नहीं बल्कि दो फिल्मों का निर्माण इन दिनों शुरू हो गया है।
एक फिल्म का निर्माण और निर्देशन रिमेश अधिकारी कर रहे हैं। दूसरी का शिवम अधिकारी। फिल्म के नाम एक जैसे ही हैं। रिमेश नालापानी और शिवम नालापानी युद्ध के नाम से फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं। फिल्म के लिए कलाकारों का चयन और लोकेशन की तलाश अभी भी चल रही है। स्क्रिप्ट अलबत्ता, पूरी हो चुकी है। शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल में स्थित नालापानी में युद्ध तब हुआ था, जब समूचे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों पर नेपाल का अधिकार था। बलभद्र कुंवर को सेनापति बना कर भेजा गया था। वह अपनी छोटी से सेना के साथ नालापानी में किला बना कर रह रहे थे।
ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जब इस किले पर हमला किया तो गोरखा फौज न सिर्फ अंग्रेजी सेना के मुकाबले बहुत छोटी थी बल्कि उसके पास अस्त्र-शस्त्र भी बहुत साधारण थे। अंग्रेजी फौज के पास तोपें और बंदूकें थीं। गोरखा फौज खुखरी, तलवार, डंडों और पत्थरों से ही लड़ रही थी। उन्होंने अपनी बहादुरी के बूते शुरू में ही अंग्रेज सेना का नेतृत्व कर रहे जिलेस्पी को मार गिराया और साथ ही सैकड़ों सैनिकों को हताहत कर डाला था। बाद में अंग्रेजों ने किले में रह रहे लोगों का खाना-पीना ही बंद नहीं करा दिया बल्कि किले के भीतर गोलाबारी कर स्त्रियों और बच्चों तक को मारने लगे। कई बुरी तरह जख्मी हो गए। इसके बावजूद महीने भर तक भी अंग्रेजी फौज किले पर कब्जा नहीं कर सकी।
भारी नुकसान सहने के बाद अंग्रेजों ने फिर कुमुक बुलाई और भीषण हमला चलता रहा। जब खाद्य रसद की आपूर्ति बंद हो गई और बच्चों तथा महिलाओं पर भी हमले होने लगे तब बलभद्र ने किले को छोड़ देने का फैसला किया तब तक किले में बामुश्किल 60-70 लोग ही रह गए थे। जो घायल थे। इनमें पुरुषों के साथ ही महिलायें और बच्चे भी शामिल थे। वे सभी हाथों में खुखरी और तलवार लिए क्षतिग्रस्त हो चुके किले से बाहर निकले। अंग्रेजी सेना में उनका खौफ इस कदर तारी था कि इतनी कम संख्या और घायल अवस्था में दुश्मनों को देख कर भी वे हमला करके उनको बंदी बनाने का हौसला नहीं जुटा पाए। बलभद्र ने उनके सामने से गुजरते और यह कहते हुए किला छोड़ा कि वे हारे नहीं हैं। सिर्फ किला उनके रहने लायक नहीं रहा और बच्चे तथा महिलायें घायल हैं, इसलिए जा रहे हैं।
यह दुनिया का इकलौता उदाहरण कहा जाएगा कि किसी ने दुश्मन सेना की बहादुरी की याद में भी स्मारक बनाया हो। अंग्रेजों ने देहरादून में सहस्त्रधारा मार्ग पर अपने मारे गए अफसरों और जवानों की याद में जब स्मारक बनाया तो गोरखा सैनिकों की बहादुरी को भी सम्मान दिया और उनकी याद में भी एक स्मारक एक ही परिसर में साथ-साथ बनाया। इसी से प्रेरित हो कर रिमेश और शिवम ने नालापानी युद्ध और गोरखा सैनिकों की बहादुरी पर फिल्म बनाने का फैसला किया। रिमेश इस से पहले देहरादून के ही गोरखा जांबाज दुर्गा मल्ल पर भी फिल्म बना चुके हैं।
रिमेश के अनुसार नेपाल सेना और बलभद्र की पलटन से उनको फिल्म बनाने में भरपूर सहयोग मिल रहा है। कलाकारों के चयन का काम तकरीबन पूरा हो चुका है। पुराने जमाने के हथियारों की अनुकृति भी बना ली गई हैं। शिवम के अनुसार नालापानी युद्द गोरखा गोरखा सैनिकों की जांबाजी को जाहिर करने के साथ ही नेपाल की गौरव से भी जुड़ा है। नेपाल में इस युद्द को लेकर बहुत कहानियां है इसलिए उन्होंने इस फिल्म का निर्देशन करने का फैसला किया।

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