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निचले पायदान पर पहुंचे चैंपियन

त्रिवेंद्र ने निकाल दी हेकड़ीछब्बे जी बनने गए थे
दूबे जी बनकर रह गये

देहरादून। अपनी मूंछों को जब तब गुरूर से सहलाते रहने और चौड़ी कमर वाली छाती जहां-तहां दिखाते रहने और पिछली कांग्रेस सरकार के लिए आफत का सबब बने रहे प्रणव सिंह जो अपने नाम के पीछे चैंपियन भी लगाते हैं, को बीजेपी ने आज की तारीख में निचले पायदान पर ला पटका है। हालात यह हो गए हैं कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत उनसे मिलने तक को राजी नहीं हैं और सरेआम उनको दून विश्वविद्यालय के समारोह में झटक कर उनकी हैसियत भी दिखा दी है। बीजेपी नेतृत्व ने उनको अनुशासनहीनता का नोटिस दे कर उनकी रही-सही फूंक भी निकाल दी है।
खानपुर के विधायक प्रणव हमेशा अपनी हरकतों के कारण न सिर्फ चर्चाओं में रहते हैं बल्कि सरकार और पार्टी के लिए मुसीबत साबित होते रहे हैं। कांग्रेस में रहने के दौरान वह कभी मगरमच्छ का अवैध शिकार करने, कभी मंत्री डॉ.हरक सिंह रावत के बंगले में दावत के दौरान गोली चला देने तो कभी आईआईटी, रूडक़ी में मंच पर टी शर्त उतार कर अर्धनग्न हो जाने के कारण मीडिया की सुर्खियों में खूब रहे। कांग्रेस में रहने के दौरान वह हमेशा ही मंत्री बनने की जुगत में रहे और कभी भी सफल नहीं रहे। एनडी तिवारी की सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वह ओएनजीसी के सभागार में साफा बांध कर सज-धज कर पहुंच गए थे और इशारा दे रहे थे कि वह भी शपथ लेने वाले हैं। बाद की कांग्रेस की बहुगुणा और रावत सरकार में भी उन्होंने भरपूर पसीना बहा कर मंत्री बनने की तमाम कोशिशें की, पर हर बार नाकाम रहे।
किसी भी मुख्यमंत्री ने उनकी हरकतों को देखते हुए मंत्री बनाने का जोखिम लेने की हिम्मत नहीं दिखाई। इसको देख कर ही वह पहले विजय बहुगुणा के दुश्मन बने और हरीश रावत खेमे में चले गए। फिर रावत ने भी मंत्री नहीं बनाया तो बीजेपी से हाथ मिला कर वहां चले गए। अब जबकि उनको त्रिवेंद्र सिंह रावत की बीजेपी सरकार में भी बतौर मंत्री जगह नहीं मिली तो वह उनसे और पार्टी दोनों से नाराज हैं। उनकी नाराजगी की आग में घी का काम किया हरिद्वार जिला पंचायत संचालन समिति में पूर्व बीएसपी विधायक शहजाद के भाई को शामिल किए जाने से। जिन पर सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का सरमाया है। कौशिक और प्रणव की आपस में पटती नहीं है और शहजाद से पुरानी सियासी प्रतिद्वंद्विता है। प्रणव अपने आदमी को संचालन समिति में शामिल नहीं करवा पाए।
उन्होंने इसकी शिकायत कई बार पार्टी नेतृत्व से की और मुख्यमंत्री तक भी बात पहुंचानी चाही। दोनों जगह उनको तवज्जो न मिलने के बाद जब उनको लगा कि उनकी जग हंसाई हो रही है तो उन्होंने पार्टी की ही नीतियों के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं वह पार्टी के समर्पण कार्यक्रम में देहरादून नहीं आए। इसकी बजाए वह वक्त लेकर पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष अमित शाह से दिल्ली मुलाकात कर आए। इससे त्रिवेंद्र और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट दोनों ही उनसे बहुत खफा हैं। शाह से मुलाकात के बाद प्रणव के तेवर नरम पड़ते दिखे और वह मुख्यमंत्री से मिलने दून विश्वविद्यालय में समारोह के दौरान ही मंच पर तब भी जबरदस्ती चढ़ गए, जब उनको सुरक्षा कर्मी इशारे से मना कर रहे थे और खुद मुख्यमंत्री ने भी नीचे बैठ जाने को कहा था।
इसके बाद भी जब प्रणव मंच पर पहुंच गए, लेकिन त्रिवेंद्र ने न सिर्फ उनकी नमस्ते की अनदेखी की बल्कि उनसे मिले बिना ही समारोह से चले भी गए। त्रिवेंद्र के तेवर के बाद बड़े बोल बोलने के उस्ताद प्रणव की कस-बल ढीले पढ़ चुके हैं। वह अब किसी तरह खुद को अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचाने की जुगत में हैं। हाई कमान में त्रिवेंद्र की मजबूत पकड़ और उनके खिलाफ बगावत की कोशिश करने वालों को झटका शुरू में ही देने की मंशा के कारण शाह नहीं चाहते कि प्रणव या उनके सरीखे अन्य असंतुष्टों को तवज्जो दी जाए। कहा जा रहा है कि हाई कमान ने प्रणव को जो भी बात है मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष से मिल कर कहने को कहा है। प्रणव ने जब भी कांग्रेस में बवाल किया, पार्टी और उस वक्त के मुख्यमंत्रियों ने हमेशा उनका साथ दिया। इसके चलते वह उच्श्रृंखल होते गए थे। बीजेपी में उनको अब अहसास हो रहा है कि दोनों दलों में किस कदर फर्क है और यहां उनका अपना अंदाज नहीं चलने वाला है। वह बीजेपी में छब्बे जी बनने की चाहत रख रहे थे। दुबे जी हो चुके हैं। त्रिवेंद्र ऊपर वालों का पूरा भरोसा रखते हैं। इसके चलते उन्होंने प्रणव के प्राण सुखा डाले हैं। अब प्रणव त्रिवेंद्र को बड़ा भाई बता कर और खुद के नाराज न होने की बात कह कर एक किस्म से खुद को बचाने में ही जुटे हुए हैं। फिलहाल, उनको पार्टी ने अनुशासनहीनता पर कारण बताओ नोटिस दे दिया है। जैसा हाल, उनका चल रहा है, उसको देखते हुए उनके लिए बीजेपी में विधायकी करते हुए आगे के चार साल से ज्यादा का वक्त गुजारना आसान नजर नहीं आ रहा है।
किसी भी मुख्यमंत्री ने उनकी हरकतों को देखते हुए मंत्री बनाने का जोखिम लेने की हिम्मत नहीं दिखाई। इसको देख कर ही वह पहले विजय बहुगुणा के दुश्मन बने और हरीश रावत खेमे में चले गए। फिर रावत ने भी मंत्री नहीं बनाया तो बीजेपी से हाथ मिला कर वहां चले गए। अब जबकि उनको त्रिवेंद्र सिंह रावत की बीजेपी सरकार में भी बतौर मंत्री जगह नहीं मिली तो वह उनसे और पार्टी दोनों से नाराज हैं।

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