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सहूलियत भरी जीरो टॉलरेन्स

देहरादून। मुख्यमंत्री के तौर पर त्रिवेंद्र सिंह रावत वैसी छाप नहीं छोड़ पाए हैं, जैसी उनसे उम्मीद की जा रही थी या अभी भी की जा रही है। उनकी सरकार अगले महीने एक साल पूरे कर रही है। इस बीच कार्यकाल का पोस्टमॉर्टम शुरू हो चुका है। सबसे ज्यादा चर्चा इस प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार की रहती है। यह तय माना जा रहा था कि त्रिवेंद्र पर जिस तरह पार्टी नेतृत्व का तगड़ा आशीर्वाद है और जैसा बहुमत बीजेपी को मिला है, स्थिरता अब कोई मुद्दा नहीं है। अब जो मुद्दा होगा वह भ्रष्टाचार होगा। इस मायने में बीजेपी सरकार पिछड़ती दिखाई दे रही है। भ्रष्टाचार की लड़ाई एनएच-74 की सीबीआई जांच न होने के कारण पहले ही कमजोर हो चुकी है। जिस तरह आबकारी महकमे में बैंक गारंटी घोटाले पर सरकार चुप्पी साधे बैठी है, उससे जाहिर हो रहा है कि उसके खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। देश-विदेश में खलबली मचाने और हिला देने वाले नीरव मोदी-मेहुल चौकसी पीएनबी बैंक गारंटी घोटाले की तर्ज पर हुए आबकारी बैंक गारंटी घोटाले में किसी भी अफसर के खिलाफ कार्रवाई तो दूर सरकार ने जांच तक नहीं बिठाई है। हालांकि, यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय और खुद रावत की नजर में आ चुका है।

त्रिवेंद्र सरकार ने शुरू में जरूर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेडऩे की मंशा दिखाई थी। उसने एनएच-74 घोटाले की फटाफट जांच बिठा दी थी। यह क्षणिक साबित हुआ। जिस तरह घोटाले को रोशनी में लाने वाले वरिष्ठ आईएएस अफसर डी सेंथिल पांडियन को कुमायूं के आयुक्त की कुर्सी से हटा दिया गया और फिर सीबीआई जांच भी मना हो गई तो बीजेपी सरकार पर ऊंगली उठना स्वाभाविक था। आज एनएच घोटाले की जांच राज्य सरकार की तरफ से गठित विशेष जांच दल कर रहा है। इस पर भी ऊंगली उठ रही है। यह कहा जा रहा है कि जांच सिर्फ कांग्रेस से जुड़े लोगों और निचले स्तर के अधिकारियों, कर्मचारियों और लोगों के खिलाफ हो रही है। उनको ही जेल भी भेजा जा रहा है। सरकार से जुड़ चुकी बड़ी मछलियों पर जांच दल हाथ डालने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा है।
जांच दल ने कांग्रेस को विधानसभा चुनाव से पहले बैंक में खाता खोलने और उसमें पांच करोड़ रूपये से कुछ ज्यादा चेक से जमा होने पर ऊंगली उठाई है। कांग्रेस के उस वक्त के प्रदेश अध्यक्ष किशोर रावत से पूछताछ भी इस मामले में कर चुका है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जांच दल के इस कदम की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि यह पैसा चेक से आया है। जांच दल आराम से चेक देने वाले को तलाश सकता है। उसी से पूछा जा सकता है कि उसके पास पैसा कहां से आया। क्यों कांग्रेस को दान दिया? कांग्रेस के लोगों से पूछताछ किया जाना सिर्फ उनको परेशान और बदनाम करने कि सियासी कोशिश भर है। बेहतर होता इस मामले की जांच सीबीआई करती। फिर जो लोग आज सत्ता में हैं और जिन पर एनएच घोटाले में अहम भूमिका होने की आशंका है, उनसे भी सवाल पूछे जाते। इस घोटाले में अभी तक किसी सत्ता पक्ष के नेता से या फिर सरकार में शामिल आईएएस अफसरों से पूछताछ करने की हिम्मत जांच दल नहीं जुटा पाया है। एनएच घोटाला मामले में तो सरकार ने दिखावे के लिए ही सही, लेकिन जांच तो बिठाई। कई छोटे लोग अंदर भी हुए। कुछ पीसीएस अफसरों को भी जेल भेजा गया है, जबकि अभी उनकी भूमिका साबित होनी है। ऐसे में आबकारी महकमे में हुए बैंक गारंटी फर्जी होने और बैंक गारंटी के बिना ही दुकान सौंप दिए जाने के मामले में अभी तक मुख्यमंत्री की तरफ से कोई कदम न उठाया जाना, सरकार पर ऊंगली उठाने के लिए काफी है। सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री को इस बारे में जानकारी है। उनके अफसरों ने इस बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई भी है। फिर भी कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त और अपर मुख्य सचिव डॉ. रणबीर सिंह तथा आबकारी आयुक्त षणमुगम सब जानते हुए भी खामोश बैठे हुए हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि करोड़ों रूपये का यह फर्जी बैंक गारंटी घोटाला महकमे के एक मंझले दर्जे के अफसर ने दुकान स्वामियों से मिल कर अंजाम दिया है। इस अफसर पर उच्च पदों पर बैठे लोगों का आशीर्वाद है। इसके चलते वह बचा तो है ही, बल्कि आज भी महकमा वास्तव में उसके इशारे पर ही चल रहा है।
मंत्री पन्त ने स्वीकार किया कि फर्जी बैंक गारंटी की शिकायत की जांच कराई गई थी। नैनीताल में एक दुकान पकड़ में भी आई। उसके खिलाफ कार्रवाई भी की गई। बाकी बैंक गारंटी घोटाला जिन्होंने किया है, उनकी संपत्ति कुर्क कराई जाएगी। सरकार को अभी यह पता नहीं है कि कई लोगों ने शराब की दुकान लेते समय अपनी हैसियत बढ़ाने के लिए 400 गज की कृषि भूमि की कीमत सात करोड़ रूपये दर्शाई। सरकार कभी कुर्की भी करेगी तो इस जमीन के टुकड़े से उसको 20 लाख रूपये भी नहीं मिलेंगे। जाहिर है कि आबकारी और तहसील महकमे की मिलीभगत इस खेल में खुल कर है। फर्जी बैंक गारंटी और बैंक गारंटी जमा न करने से जुड़े घोटाले में किसी अफसर पर कार्रवाई न करने का बहाना बहुत हास्यास्पद तरीके से दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अब वित्तीय वर्ष खत्म हो रहा है। किसी के खिलाफ कार्रवाई कि गई तो राजस्व वसूली के काम और दुकानों के आवंटन के काम में दिक्कत आएगी। मानो महकमे में अफसरों की भारी कमी है।
अफसरों की तादाद इतनी ज्यादा है कि अपर आयुक्त और संयुक्त आयुक्त तथा उपायुक्त स्तर के अफसर खाली बैठे मक्खियां मार रहे हैं। जितने अहम और बड़े काम हैं, एक ही अफसर को सौंपे गए हैं। अपर मुख्य सचिव डॉ.सिंह ने पूछे जाने पर कहा कि वह इस घोटाले की जांच करायेंगे। उनको अभी तक यह सूचना नहीं मिली थी कि फर्जी बैंक गारंटी का घोटाला भी हुआ है। उन्होंने आयुक्त से पूछ कर इतनी पुष्टि की कि बैंक गारंटी न लेने का मामला सामने आया है। यह भी हैरान करने वाली बात है कि बिना बैंक गारंटी के भी दुकानें मिलीभगत कर सौंप दी गई। इतनी बड़ी मिलीभगत हो गई और सरकार साल भर सोती रही। अब जबकि वित्तीय वर्ष खत्म होने वाला है और दुकान मालिक पैसा जमा करने को राजी नहीं दिखाई दे रहे हैं तो अफसरों में खलबली मची हुई है। वे किसी तरह उनको मनाने में जुटे हैं कि पैसा जमा कर दे नहीं तो उनकी जान पर बन आएगी अगर सतर्कता जांच बिठा दी जाए तो इस घोटाले में कई बड़ी मछलियां फंस
सकती है।
आला कांग्रेस नेता लालचंद शर्मा और दीप वोहरा ने सीधे सरकार को इस घोटाले के लिए जिम्मेदार ठहराया। शर्मा ने कहा कि इतना बड़ा घोटाला और इतनी बड़ी हिमाकत कोई अफसर बिना ऊपर वाले की नजरें इनायत के कर ही नहीं सकता है। वोहरा ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं संग मंत्रणा कर इस घोटाले को गैरसैण में विधानसभा सत्र में जोर शोर से उठाया जाएगा। इस घोटाले के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि या तो वे घोटालेबाजों को जेल भेजे या फिर जीरो टॉलरेंस का नारा वापस लें।

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