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उपचुनाव के बहाने जनता की नब्ज टटोल रहे सियासी दल

उत्तरप्रदेश में दो सीटों पर हो रहे उपचुनाव 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास माना जा रहा है। गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा सीट पर बीजेपी समेत सभी दलों की निगाहें लगी हुई हैं। क्षेत्र में जिस तरह का माहौल है उससे साफ लग रहा है कि इन दोनों सीटों के परिणाम बहुत हद तक अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तस्वीर साफ कर देंगे। इन नतीजों से केन्द्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार के कामकाज की समीक्षा भी हो जायेगी। दरअसल सभी राजनीतिक दल उपचुनाव के बहाने जनता की नब्ज टटोलने में जुटे हैं। जहां बीजेपी पर अपनी सीट बचाने की चुनौती है तो वहीं अन्य राजनीतिक दलों को अपनी क्षमता आंकनी है।

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए 11 तारीख को मतदान होना है। सभी राजनीति दल गोरखपुर व फूलपुर में डेरा डाले हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज वोट मांगते नजर आ रहे हैं। बीजेपी ने इन दोनों सीटों पर अपने 40 स्टार प्रचारकों को प्रचार के लिए लगाया हैं। बीजेपी ने स्टार प्रचारकों की जो सूची जारी की है उसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के अलावा सूची में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, ओम माथुर, महेंद्र नाथ पांडेय और सुनील बंसल का नाम भी शामिल है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से पार्टी प्रत्याशी उपेन्द्र दत्त शुक्ला के पक्ष में पहले ही जनसभाएं कर चुके हैं। जनसभाओं में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा था कि उपचुनाव 2019 के संसदीय चुनाव का रिहर्सल है। दरअसल पार्टी दोनों ही सीटों को न सिर्फ जीतना चाहती है, बल्कि एक बड़े अंतर से जीत दर्ज कर 2019 लोकसभा चुनाव के लिए एक संदेश भी देना चाहती है। वहीं फूलपुर में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी प्रत्याशी कौशलेन्द्र सिंह पटेल के लिए खुद चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। केशव प्रसाद मौर्य ने कौशलेन्द्र के लिए रोड शो किया और उनके लिए वोट मांगा।
बीजेपी के दुर्ग कहे जाने वाले गोरखपुर और डिप्टी सीएम केशव मौर्य के क्षेत्र फूलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव सीएम योगी के साथ-साथ बीजेपी के लिए अग्निपरीक्षा है। बीजेपी के लिए इन दोनों सीटों को अपने पास रखने की चुनौती है, जबकि विपक्ष ने घेराबंदी करने की पूरी तैयारी कर रखी है। ऐसे में अब देखना होगा कि योगी और केशव किस तरह से विपक्ष की रणनीति को भेदकर अपने-अपने गढ़ को बरकरार रखते हैं? दरअसल गोरखपुर और फूलपुर के गणित को अगर देखा-परखा जाए तो दोनों संसदीय क्षेत्रों में बड़ी दिलचस्प लड़ाई रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इन सीटों पर सभी विपक्षी दलों को मिले कुल वोटों से भी ज्यादा वोट मिले थे। यही वजह है कि बीजेपी को दोनों सीटों पर अपना वर्चस्व कायम रखना एक बड़ी चुनौती है। यदि गोरखपुर की बात की जाए तो खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 1998 से भारतीय जनता पार्टी के बैनर से लगातार सांसद चुने जाते रहे हैं। गोरखपुर की इस सीट पर महंत अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ (1967-70) भी सांसद रह चुके हैं। वर्ष 1989 से गोरखपुर संसदीय सीट पर गोरक्षपीठ का कब्जा रहा है। योगी के गुरू ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ इस सीट से 1989, 91 व 96 में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। करीब तीन दशक बाद ऐसा पहली बार होगा जब गोरखपुर संसदीय सीट पर किसी ऐसे नेता का कब्जा होगा जो गोरक्षपीठ से संबंधित नहीं होगा। इस सीट को जीतने के लिए विपक्षी दलों ने तमाम रणनीति अपनाई, लेकिन कभी उनकी चाल सफल नहीं हो पाई है। इस बार भी विपक्षी दलों ने कमर कस ली है लेकिन कितना सफल होंगे समय बतायेगा।
वहीं फूलपुर लोकसभा क्षेत्र बीजेपी के लिए कभी आसान नहीं रहा। इस सीट को कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने यहां से 1952 में चुनाव जीता था। भाजपा को यहां हो चुके अब तक चुनाव में सिर्फ एक बार सफलता मिली थी। इस सीट पर पहली बार 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने जीत दर्ज की थी। फूलपुर संसदीय क्षेत्र में सियासी गणित जातीय समीकरण पर टिका रहता है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू यहां से तीन बार सांसद रहे थे। उनके निधन के बाद 1964 में इस सीट पर उपचुनाव हुआ और कांग्रेस की विजयलक्ष्मी पंडित ने जीत दर्ज की। विजयलक्ष्मी पंडित के निधन के बाद 1969 में इस सीट पर उपचुनाव हुआ और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जनेश्वर मिश्र ने जीत दर्ज की। फूलपुर लोकसभा सीट का देश के राजनैतिक इतिहास में खासा महत्व है। अब 11 मार्च को इस सीट के उप चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं होगी। इससे पहले फूलपुर में दो बार उपचुनाव हो चुका है। यह तीसरी बार होगा जब यहां उपचुनाव के लिए 11 मार्च को वोट डाले जाएंगे। 1952 से अब तक इस सीट पर 18 बार चुनाव हो चुके हैं।

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