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200 करोड़ का जबरदस्त झटका

देहरादून। उत्तराखंड सरकार के लिए मौजूदा दौर में सबसे बड़ी चुनौती कर्मचारियों को वेतन और भत्ते देना तथा विकास योजनाओं के लिए बजट का बंदोबस्त करना है। इसके लिए उसको लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है। इसके चलते मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और उनकी सरकार को विपक्ष के ताने और आरोप सहने पड़ रहे हैं। सरकारी खजाने का आलम यह है कि नोटबंदी और फिर जीएसटी ने मिल कर उसका एक किस्म से बाजा बजा डाला है। इसकी उम्मीद कम है कि सरकार जल्द ही खजाने की हालत को दुरुस्त कर पाएगी। ऐसे माहौल में सरकार को एक और बहुत बड़ा झटका लग गया है। छोटा नहीं। पूरे 200 करोड़ रूपये का। आबकारी और वित्त मंत्रालय संभाल रहे प्रकाश पन्त ने साफ स्वीकार कर लिया है कि शराब से राजस्व उगाही का लक्ष्य सिर्फ 21 सौ करोड़ तक पहुंच पाएगा। यह 23 सौ करोड़ से ज्यादा है। इसके पीछे शराब दुकानों के मालिकों की महकमे के अफसरों के साथ मिल कर फर्जी बैंक गारंटी और बैंक गारंटी घोटाले को अंजाम दिए जाने को माना जा रहा है। वीक एंड टाइम्स ने इस घोटाले को लगातार प्रमुखता से छापा। इसके बाद सरकार ने जांच बिठाई। जांच रिपोर्ट में बैंक गारंटी घोटाले की तकरीबन पुष्टि हो गई है। अब देखना है कि जीरो टॉलरेन्स वाली सरकार इसके लिए जिम्मेदार मास्टर माइंड विभागीय अफसर और उसके विश्वासपात्र चेलों पर दंडात्मक कार्रवाई करती है या नहीं।

एक साथ दो रिपोर्ट सामने आई है। एक तरफ मंत्री पन्त ने साफ कह दिया कि सरकार के लिए शराब के कारोबार से 23 सौ करोड़ रूपये से ज्यादा का राजस्व जुटा पाना मुमकिन नहीं है। मार्च का महीना चल रहा है जो वित्तीय वर्ष का आखिरी महीना है। राजस्व अर्जन 21 सौ करोड़ भी नहीं पहुंचा है। अभी ऐसे दुकानों की तादाद असंख्य है, जिन्होंने अभी तक बैंक गारंटी तक जमा नहीं की है। आशंका है कि इसमें से 25 फीसदी भी शायद ही अब बैंक गारंटी या नकद राजस्व सरकार को दें। मतलब सरकार के पास सिर्फ उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का विकल्प रह जाएगा। पैसा नहीं आएगा। जो ज्यादा जरूरी है। इस हालात के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? क्यों ऐसी नौबत आई? वीक एंड टाइम्स इस मसले को न सिर्फ लगातार उठा रहा है बल्कि इस दशा के बारे में पहले भी इंगित कर चुका था। इस मामले में जिम्मेदार अफसरों के बारे में भी जिक्र करता रहा है। यह ताज्जुब की बात है कि सरकार ने इस कदर राजस्व बदहाली के बावजूद किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।
राजस्व वसूली लक्ष्य से बहुत दूर रह जाने के पीछे सिर्फ महकमे के अफसरों का शराब दुकान मालिकों से संग मिल कर बैंक गारंटी घोटाला करना है। सूत्रों के अनुसार घोटाले दो तरह से हुए। एक-अगले साल के फरवरी-मार्च की फर्जी बैंक गारंटी महकमे में जमा कराई गई। कोई कैश जमा नहीं किया गया। दो-बैंक गारंटी ही जमा नहीं कराई गई। साथ ही करोड़ों की कीमत वाली दुकानें भी सौंप दी गई। इसमें बड़ा खेल हुआ। सूत्रों का कहना है कि महकमे के अफसरों ने दुकान स्वामियों को गारंटी जमा न करने की एवज में मोटा माल वसूला। उन्होंने सोचा बाद में जब हालात कठिन हुए तो कैश पैसा जमा करा देंगे। यह पैसा दुकान की लॉटरी निकलने के डेढ़ महीने के भीतर जमा कर देना होता है। ऐसा न करने पर दुकान का आवंटन निरस्त करने और उसको फिर किसी और को देने का प्रावधान है।
अफसरों ने न तो बैंक गारंटी ली न ही दुकान आवंटन निरस्त ही किया। बस मोटा खेल खेलते रहे। ताज्जुब की बात यह है कि इस मामले में उन्होंने अपने अपर मुख्य सचिव डॉ. रणबीर सिंह को भी अंधेरे में रखा। महकमे के आयुक्त षणमुगम को अंदरखाने के खेल का बिल्कुल भी पता नहीं चल पाया। इसकी एक बड़ी वजह इस घोटाले और साजिश के मास्टरमाइंड की सत्तारूढ़ बीजेपी के एक बड़े नेता संग करीबी रिश्ता और मंत्री पर उसके खिलाफ कार्रवाई न करने की मजबूरी बताई जा रही है। सरकार और महकमे के अफसरों में खलबली तब मची, जब वीक एंड टाइम्स ने इस घोटाले को प्रमुखता से उठाया। इसके बाद डॉ. सिंह ने पूछताछ शुरू की। तब उनको इस घोटाले के बारे में पता चला। उन्होंने फिर सख्ती करने की कोशिश की और जांच बिठा दी। सूत्रों के मुताबिक जांच रिपोर्ट भी आ गई है। साजिशकर्ता और घोटालेबाज अफसरों ने फर्जी बैंक गारंटी की फाइल ही गायब कर दी है। अब इस मामले को बैंक गारंटी ही जमा न करने वाले घोटाले में तब्दील कर दिया है। यह खुद भी अपने आप में बहुत बड़ा घोटाला है।
अब अंदरखाने की ताजी रिपोर्ट यह है कि सरकार और बीजेपी का का दुलारा मास्टर माइंड अफसर नया खेल करने में जुट गया है। वह इस घोटाले को मातहतों पर डालने और उनको फंसाने की एक और साजिश रच रहा है। जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय और संबंधित निरीक्षकों पर दबाव बना कर धमका रहा है कि वह फंसे तो बचेंगे वे भी नहीं। ऐसे मामले पूरे प्रदेश में चल रहे हैं। नैनीताल में तो फर्जी बैंक गारंटी घोटाला साबित हो चुका है। सच्चाई यह है कि मौजूदा सरकार में एक तो इस मास्टर माइंड की इच्छा के बगैर पत्ता नहीं खडक़ता। ऐसे में मातहतों पर नाजायज दबाव बनाए जाने से महकमे में असंतोष पनप रहा है। कुछ निरीक्षक तो हाल ही में तबादले पर आए हैं। उनको फटाफट अपने इलाके की दुकान से राजस्व वसूलने का कहा जा रहा है। उन्होंने इसमें एक किस्म से असमर्थता जता दी है। महकमे में मुख्यालय स्तर पर भ्रष्टाचार का आलम यह है कि एक निरीक्षक ने अपने इलाके के सभी देनदारों के नामों की सूची भेज कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संस्तुति की। इस रिपोर्ट को मास्टर माइंड के इशारे पर दबा दिया गया।
सूत्रों के अनुसार जांच रिपोर्ट में यह पुष्टि हो गई है कि अनेक दुकानों ने बैंक गारंटी जमा नहीं कराई है जिससे सरकार को भारी राजस्व घाटा हुआ है जो करोड़ों में है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब राजस्व और बैंक गारंटी जमा ही नहीं हुई थी तो दुकान कैसे सौंप दी गई? फिर साल भर तक भी मुख्यालय कान में रुई डाल कर बैठे रहे। क्यों राजस्व वसूली या फिर दुकान निरस्त करने की कार्रवाई नहीं की गई। साफ है कि जीरो गारंटी का दावा करने वाली त्रिवेंद्र सरकार के लिए गैरसैण में विपक्ष के इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं होगा। उम्मीद जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस मामले को गंभीरता से लेंगे। उनको इस घोटाले की जानकारी होने के बाद ही जांच बिठाई गई थी। यह देखना दिलचस्प होगा कि वह बिना किसी दबाव के दोषी मास्टर माइंड पर कार्रवाई कर पाते हैं या नहीं।

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