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मूर्तितोडक़ सियासत : आखिर कब तक

लोकतंत्र में विरोधी विचारधाराओं को समान महत्व दिया जाता हैं। लोकतंत्र का आधार ही यही है, लेकिन पिछले कुछ सालों से भारत में जिस तरह बदले की राजनीति में महापुरुषों को निशाने पर लिया जा रहा है वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। त्रिपुरा में लेनिन और तमिलनाडु में परियार की मूर्ति का तोड़ा जाना इसी सियासी गिरावट का नतीजा है। इतिहास गवाह है जब भी देश में मूर्तितोडक़ सियासत हुई है परिणाम दुखद रहे हैं। राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि मूर्तियों के तोडऩे से विचारधाराएं नहीं मरती लेकिन राजनीति के बदलते परिवेश में मूर्तियों को तोडक़र सियासी दल अपनी तुच्छ मानसिकता का परिचय जरूर दे रहे हैं। देश में मूर्तितोडक़ सियासत लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। यदि दलों ने इसे गंभीरता से नही लिया तो परिणाम बेहद घातक होंगे। इस सिलसिले को जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए।

पिछले दिनों त्रिपुरा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और कोलकाता में देश के महापुरुषों की मूर्तियां तोड़ी गई। आखिर इन मूर्तियों को तोडऩे के पीछे का मकसद क्या है। विशेषज्ञों की माने तो मूर्तियों के तोडऩे का मकसद पहले के दौर की सोच को मिटाना है। उस दौर के प्रतीकों का खात्मा करना ताकि जैसे-जैसे वक्त बीतेगा, आने वाली नस्लों के दिमाग से ये तस्वीरें धुंधली होती जाएंगी। इसीलिए कहा जाता है कि अगर आप किसी देश को समझना चाहते हैं, तो यह मत देखिए कि उन्होंने कौन से प्रतीक लगाए हैं। यह देखिए कि उन्होंने कौन से प्रतीक मिटाए हैं।
ऐसा नहीं है कि महापुरुषों की मूर्तियों को विध्वंस करने का काम सिर्फ भारत में हुआ है। अन्य देशों में भी मूर्ति विध्वंस करने का काम हुआ है। अगस्त 2017 में अमेरिका में कुछ लोग उन्नीसवीं सदी में हुए गृहयुद्ध के कुछ बड़े जनरलों के बुतों को हटाना चाहते हैं। बुतों को हटाने की वकालत करने वाले लोग खुद को तरक्की पसंद कहते थे। इन्हें लगता था कि गृहयुद्ध में गुलाम प्रथा या दास प्रथा के समर्थकों की मूर्तियां अब देश में नहीं रहनी चाहिए। हालांकि कुछ अमरीकी इन्हें अपना असली लीडर भी मानते हैं। उन्हें लगता है कि ये नस्लवादी लोग उनकी सोच के नुमाइंदे थे। खुद अमरीकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने भी सवाल उठाया है कि क्या मूर्तियां हटाकर लोग इतिहास मिटाना चाहते हैं? ट्रंप पर भी गोरे नस्लवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा है। ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका के पहले अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने भी दास रखे थे, तो क्या कल को उनके बुत भी पूरे अमरीका से हटाए जाएंगे। ऐसा ही यूके्रन और सीरिया में हुआ। जब सोवियत गणराज्य का विखंडन हुआ तब अलग होने वाले राज्यों ने लेनिन और स्टालिन की मूर्तियों को सार्वजनिक रूप से तोड़ दिया। यूक्रेन में तो अधिकांश चौराहों पर लगी लेनिन की मूर्तियों को उखाड़ फेका गया। इसके पूर्व इटली में तानाशाह मुसोलिनी की मूर्तियों को वहां की जनता ने तोड़ दिया था। ये कुछ ऐसे उदाहरण है जहां पर जनता के अपने बदले जनमानस और विचारधारा विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया। कई बार दूसरे विचारधारा के लोगों को भावनात्मक ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से भी मूर्तियां तोड़ी जाती रही है। मसलन भारत में अंबेडकर की मूर्ति सबसे ज्यादा निशाने पर रही है।
ऐतिहासिक प्रतीकों को गिराना या बनाना दोनों ही इंसान की सोच में आए बदलाव के प्रतीक हैं। वैसे प्रतीक या मूर्तियां गिराने की सबसे पुरानी मिसाल सन 1357 की है, जब इटली के टोस्काना सूबे के सिएना शहर में बीच चौराहे पर लगी वीनस की मूर्ति को लोगों ने हटा दिया था। वीनस रोम के लोगों की देवी थी। उसे ख़ूबसूरती और सेक्स की देवी मानकर पूजा जाता था। वीनस का बेहद ख़ूबसूरत बुत सिएना में एक फव्वारे पर लगा था। वहां के लोग इसे बहुत पसंद करते थे लेकिन एक जंग में हारने के बाद उन्हें लगा कि इस नग्न मूर्ति के चलते ही भगवान उनसे नाराज हो गए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद स्थानीय लोगों ने इस मूर्ति को हटा दिया। भारत में पिछले कुछ सालों में जिस तरह से बदलाव हो रहा है उससे यही लग रहा है कि इतिहास बदलने की कोशिश हो रही है। सत्ता में जो पार्टी होती है वह अपने हिसाब से सडक़ के नाम से लेकर किताबों के सलेबस बदल देती है। होता क्या है कि राजनीतिक दल जिस महापुरुष की विचारधारा को लेकर राजनीति करते हैं उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा बातें जनता तक ले जातेहैं। महापुरुषों के नाम पर सडक़, मूर्ति लगना आम बात है। त्रिपुरा में जिन लोगों ने लेनिन की मूर्ति तोड़ी उन लोगों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि किताबों से भी उनका नाम हटा देंगे। इसे हम क्या कहेंगे। इतिहास बदलने की कोशिश, या फिर से लिखने की कोशिश…

सत्ता में जो पार्टी होती है वह अपने हिसाब से सडक़ के नाम से लेकर किताबों के सलेबस बदल देती है। होता क्या है कि राजनीतिक दल जिस महापुरुष की विचारधारा को लेकर राजनीति करते हैं उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा बातें जनता तक ले जातेहैं। महापुरुषों के नाम पर सडक़, मूर्ति लगना आम बात है।

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