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अपना विमान और चॉपर, फिर भी 6 करोड़ का बिल

देहरादून। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के साथ ही अन्य अति विशिष्ट लोगों की सेवा में चॉपर इस कदर उड़ान भर रहा है कि एक बारगी तो लगता है जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देने की कवायद चल रही है। भले छोटे स्तर पर। क्या कोई सोच सकता है कि इस पहाड़ी राज्य में जहां कमाई के साधन तो पहले ही बहुत कम थे और अब और सिमट चुके हैं, में दस महीने का बिल पौने छह करोड़ रूपये आ चुका है। हालात ऐसे दिख रहे हैं कि मंत्री और नौकरशाह भी मुख्यमंत्री से खुद को कम समझने को राजी नहीं। यही वजह है कि सरकार का चॉपर या विमान खाली दिखते ही वे कोई न कोई दौरा लगा डालते हैं। यहां तक भी बात ठीक थी। अब बात इससे आगे बढ़ चुकी दिख रही है। वे निजी कम्पनियों के हेलीकॉप्टर में भी जम कर उड़ान भर रहे हैं। जरुरत हो या न हो। राज्यपाल तो चुनिन्दा मौकों पर ही इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल उठाना लाजिमी है कि अपना विमान और हेलीकॉप्टर होने के बावजूद कैसे इतना बड़ा बिल और खर्च आ गया? क्या मंत्रियों ने भी सडक़ मार्ग से सफर को नमस्ते कर दिया है। उनको सिर्फ उडऩा ही पसंद है?

उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था तो बंटवारे में उत्तर प्रदेश से एक हवाई जहाज और एक चॉपर मिला था। दोनों को जल्द ही सेवा से यह कहते हुए फारिग कर दिया गया कि उनकी दशा अच्छी नहीं है और उनके रख रखाव पर बहुत खर्च आ रहा है। इसके बाद नया विमान और नया चॉपर खरीदने की कवायद शुरू हुई। पहाड़ को देखते हुए दोहरे इंजन वाले चॉपर की तलाश शुरू हुई। इस बहाने नौकरशाहों ने विदेश की सैर भी की। एक बार उस वक्त के प्रमुख सचिव (वित्त) इंदु कुमार पाण्डेय और सचिव (नागरिक उड्डयन) पूरण चंद शर्मा भी अन्य अफसरों के साथ यूरोप हो आए थे। शुरू में विमान और चॉपर खरीदने के पीछे पहाड़ी राज्य होना और जल्दी से कहीं पहुंच कर समय को बचाना मकसद बताया गया था। यह भी कि इनका इस्तेमाल मुख्यमंत्री और राज्यपाल ही आम तौर पर बहुत जरूरी होने पर करेंगे। इनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान हुआ। अलबत्ता, निजी हवाई सेवा लेने से दोनों सरकार ज्यादातर बचती रहीं। वे बहुत जरूरी होने पर ही इसका इस्तेमाल करते थे।
मौजूदा सरकार में लगता है कि सिर्फ हवाई यात्राएं ही हो रही हैं। मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ ही मंत्री ही नहीं बल्कि अफसर भी चॉपर ही मांगते हैं। उनको दिए भी जा रहे हैं। जहां विमान चाहिए वहां विमान और जहां चॉपर चाहिए वहां चॉपर। यहां तक भी बात होती तो ठीक थी। सरकार मंत्रियों, अफसरों और मुख्यमंत्री को निजी एयर लाइन्स से भी चॉपर लेकर दे रही है। सिर्फ 10 महीने के भीतर ही 5.85 करोड़ का भारी भरकम बिल जब जमा हो गया तब इस दिशा में नजर गई। विपक्ष भी इस और आंखें तरेरने लगा है। हो सकता है कि गैरसैण में विधानसभा सत्र के दौरान वह इसको जोर शोर से उठाए। जरूरी काम से मुख्यमंत्री और मंत्री या कभी राज्यपाल और अफसर हवाई सेवाओं का इस्तेमाल बेशक कर सकते हैं। उनको खरीदा भी इसलिए ही गया है। सवाल सिर्फ दुरूपयोग और भ्रष्टाचार की बू के कारण उठ रहा है।
आखिर सरकार को निजी विमान या चॉपर का इस्तेमाल क्यों करना पड़ रहा है? उसके पास अपने बेहद प्रशिक्षित जो पूर्व वायुसेना अधिकारी और पायलट हैं, उपलब्ध हैं। जिनको मोटी तनख्वाह दी जाती है। अपने इंजीनियर हैं। फिर क्यों चॉपर निजी कंपनियों के लिए गए। इस बारे में उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण के मुख्य अभियंता और सालों से महकमे की रीढ़ समझे जाने वाले सितैय्या का कहना है कि अपने चॉपर खराब होने के कारण निजी चॉपर अति विशिष्ट लोगों के लिए किराए पर लेना पड़ा। सरकार का यह तर्क गले नहीं उतरता है। अपना चॉपर या विमान अगर कभी किसी दिक्कत के कारण ग्राउंड हो भी जाता है तो उसको ठीक करने में आखरी कितना वक्त लगना चाहिए। जब भी चॉपर उतरता है या फिर टेक ऑफ करना होता है, उसका भरपूर और तसल्ली के साथ निरीक्षण किया जाता है। इस तरह कमियां हाथों-हाथ तलाशी और ठीक की जाती है। फिर क्यों ऐसी दिक्कत चॉपर में आई कि वह खराब हुआ और ऐसा हुआ कि लम्बे समय तक निजी और महंगे चॉपर लेने पड़े। सितैय्या के मुताबिक एक चॉपर को एक घंटे का 1.70 लाख रूपये का भुगतान किया जाता है।
यह बहुत भारी राशि है। जब भी कोई अति विशिष्ट व्यक्ति चॉपर ले जाता है तो वह कम से कम तीन घंटे उसका इस्तेमाल जरूर करता है। ऐसे में उसका एक दिन का भाड़ा ही लाखों में पड़ता है। सूत्रों के मुताबिक सरकार के चॉपर के खड़े हो जाने की जांच होनी चाहिए। अफसर लोग जान बूझ के उसको खराब दिखाते हैं। इससे उनको किराए में निजी चॉपर लेने का मौका मिल जाता है। अगर चुनावों के मौसम की बात न की जाए तो आम तौर पर चॉपर खाली खड़े रहते हैं। दूसरी तरह उनको पायलट और इंजीनियर का वेतन देना ही होता है। ऐसे में चॉपर के मालिक या कम्पनी इस फेर में रहते हैं कि किसी तरह चॉपर सरकार की सेवा में लग जाए। उनको अगर दिन के 6-7 लाख रूपये भी मिल जाते हैं तो वे खुश रहते हैं। महीने में कई बार चॉपर सरकार की सेवा में चला जाए तो उनको मोटी कमाई होती है। इसमें से वह मोटा कमीशन अफसरों को देने के लिए तैयार रहते हैं। इसके चलते वे अफसरों संग मिलीभगत करते हैं और सरकारी विमान या चॉपर को खराब दिखा कर और उसको जल्द ठीक कराने के बजाए निजी चॉपर लेते रहते हैं। उत्तराखंड में भी ऐसा ही हुआ, यह माना जा रहा है।
एक कैबिनेट मंत्री ने हवाई सेवा पर इतना बड़ा खर्च आने को राज्य के हिसाब से अनुचित ठहराया। उनका कहना था कि अपना विमान और चॉपर दुरुस्त रखना चाहिए और उसी का इस्तेमाल हो। तब दोनों के खरीदे जाने का औचित्य भी पूरा होगा। फिर पायलट और इंजीनियर को तनख्वाह तो दे ही रहे हैं। सिर्फ ईंधन पर खर्च आता है। जो चंद हजार होता है। कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना हवाई सेवाओं के इस्तेमाल और इतना बड़ा बिल आने को पहाड़ी और गरीब राज्य के लिए बेहद नाइंसाफी ठहराते हैं। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री और मंत्री सडक़ मार्ग से ज्यादा चले तो उनको राज्य की तस्वीर सही और जल्दी समझ आएगी। गरीब राज्य का खर्च भी कम होगा। वित्त मंत्री प्रकाश पन्त के मुताबिक सरकार की कोशिश हर तरह के खर्चों को कम और सीमित करने की है। हवाई सेवाओं पर खर्च को उन्होंने ज्यादा माना लेकिन तर्क दिया कि बहुत जरूरी होने पर ही निजी सेवाओं का इस्तेमाल करना पड़ा है।

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