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गोरखपुर में योगी ही जीतते हैं और योगी ही हारते हैं

एक बार फिर देश की सियासत में हलचल मच गई है। उत्तर प्रदेश की दो सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने सबको हैरान कर दिया है। परिणाम से जितना भाजपा अचंभित है उससे ज्यादा विपक्ष हैरान है। इस जीत से विपक्ष को जहां संजीवनी मिली है वहीं भारतीय जनता पार्टी सोचने को मजबूर हो गई है कि आखिर गलती कहां हुई। हालांकि फूलपुर सीट को लेकर भाजपा आश्वस्त नहीं थी लेकिन गोरखपुर को लेकर उसे कोई संदेह नहीं था। संदेह न होने के कई कारण भी हैं। माना जाता है कि गोरखपुर में योगी ही जीतते हैं और योगी ही हारते हैं और इस बार ऐसा ही हुआ। पिछले पांच लोकसभा चुनाव योगी जीतते आए हैं और इस बार भले ही भाजपा प्रत्याशी को हार मिली हो, लेकिन यह हार योगी की मानी जा रही है। योगी की हार से सवाल उठ रहा है आखिर ऐसा क्या हो गया कि गोरखपुर की जनता ने योगी को नकार दिया। वहीं योगी जिन्हें कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्टार प्रचारक बनाकर चुनाव प्रचार के लिए भेजा और उन राज्यों में भाजपा ने भगवा भी फहराया, फिर गोरखपुर में योगी का जादू क्यों नहीं चला। अनेक सवाल हैं जो लोगों के जेहन में कौंध रहे हैं। फिलहाल इन सवालों का जवाब अभी तो किसी के पास नहीं है लेकिन आने वाला वक्त खुद ब खुद सारे सवालों का जवाब दे देगा।

गोरखपुर को भाजपा की पारंपरिक सीट मानी जाती है। सीएम योगी आदित्यनाथ पिछले पांच लोकसभा चुनाव यहां से जीते हैं। योगी सिर्फ गोरखपुर तक सीमित नहीं है। योगी की धमक पूरे पूर्वांचल में है। उनकी धमक का ही नतीजा था कि न चाहते हुए बीजेपी शीर्ष नेतृत्व को प्रदेश की कमान योगी को देनी पड़ी थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पूरा पूर्वांचल खुशी से झूम उठा था, खासकर गोरखपुर। एक साल पहले 18 मार्च को जब सीएम के लिए योगी आदित्यनाथ के नाम की घोषणा हुई थी तो पूरा पूर्वांचल झूम उठा था। 19 मार्च 2017 को योगी ने सीएम की शपथ ली और उस दिन गोरखपुर के लोगों ने दिवाली न होते हुए भी दिवाली मनायी थी। उस समय कहा गया था कि गोरखपुर के मुस्लिम तक उनके सीएम बनने से आह्लïादित थे। फिर ऐसा क्या हो गया कि एक साल में परिस्थितियां इतनी बदल गई कि उन्हें घर से बेदखल कर दिया गया। ऐसा भी नहीं है कि सीएम बनने के बाद योगी से गोरखपुर से अपना नाता तोड़ लिया हो। वह लगातार गोरखपुर जाते रहे और वहां के लोगों से मिलते रहे। विभिन्न योजनाओं का उन्होंने शिलान्यास भी किया। गोरखुपर का विकास करने का वह वादा भी करते रहे हैं। उन्होंने दिवाली अयोध्या में मनायी तो होली गोरखपुर मनाने गए। ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने अपनी छवि से समझौता कर लिया हो। कुछ दिनों पहले विधानसभा में उन्होंने कहा था कि मैं ईद नहीं मनाता, मैैं हिंदू हूं इसका मुझे गर्व हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनी छवि को लेकर वह सतर्क हैं। दरअसल राजनीति में लेनदेन की प्रथा शुरू से हावी रही है और दूसरी सबसे बड़ी बात कोई किसी का नहीं होता। जनता भी नहीं। नेता जनता की उम्मीदों पर तभी खरा उतरता है जब वह उसकी उम्मीदों को पूरा करता है। योगी के सीएम बनने के बाद गोरखपुर की जनता को लगा कि अब तो योगी सीएम बन गए हैं तो वहां का विकास होने से कोई रोक नहीं पायेगा। इसके अलावा उनके सिपहसालार जो कई सालों से उनके साथ काम करते आए है वह नाउम्मीद हुए। सीएम योगी ने लोगों को मनचाहे काम नहीं दिए। यह सबसे घातक रहा। जाहिर है इससे पहले वह सत्ता में नहीं थे इसलिए कार्यकर्ताओं और उनके शुभचिंतकों को उनसे कोई लाभ की उम्मीद नहीं थी, लेकिन जब वह उत्तर प्रदेश की सत्ता के मुखिया बने तो उम्मीदे बढ़ गई। इसीलिए कहा भी जाता है कि विपक्ष में रहकर जनता को आश्वासन देना और सरकार की आलोचना करना आसान है लेकिन कुर्सी पर बैठकर जमीनी स्तर पर काम करना और सबकी उम्मीदों पर खरा उतरना मुश्किल होता है। ऐसा ही गोरखपुर में हुआ। योगी कई बार कह चुके हैं कि लोग उन्हें जिताते हैं। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता उनको जिताते आए हैं। तो क्या इस बार उनके सिपहसालार और कार्यकर्ता ही उनकी हार का कारण बने। कहा जा रहा है कि कार्यकर्ता लोगों के घरों तक नहीं गए। लोगों के घरों में पर्ची नहीं पहुंचायी गई। विधायकों ने कोई खास प्रयास नहीं किया और सबसे खास बात, निकाय चुनाव व लोकसभा उपचुनाव किसी में योगी के पसंद के प्रत्याशी को तरजीह नहीं दी गई। जो प्रत्याशी घोषित किए गए वह पहले भाजपा से दो-दो हाथ कर चुके हैं। चाहे निकाय चुनाव में मेयर प्रत्याशी सीताराम जायसवाल रहे हो या लोकसभा प्रत्याशी उपेन्द्र शुक्ल। अक्सर राजनीतिक दुश्मनी का असर कुछ सालों बाद ही दिखता है। बाकी रही सही कसर गोरखपुर के डीएम ने पूरी कर दी। गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला सीएम योगी के बहुत खास माने जाते हैं। योगी से नजदीकी का ही नतीजा है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी रौतेला को चुनाव तक हटाया नहीं गया। जानकारों का आरोप है कि राजीव रौतेला इससे पूर्व जिस भी जिले में डीएम रहे विवाद में ही रहे। यही कारण है जिसके आधार पर सकारात्मक चुनाव परिणाम आने के बाद भी विपक्षी दलों के निशाने पर गोरखपुर का जिला और पुलिस प्रशासन निशाने पर है और तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं। इन आरोपों में विपक्ष और मतदान से वंचित रहे मतदाताओं का सबसे बड़ा आरोप वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम गायब किया जाना हैं। जानकारों का आरोप है की निहित कारणों से वोटरलिस्ट पुनरीक्षण के दौरान प्रशासन के इशारे पर ही कराया गया, अन्यथा इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का वोटर लिस्ट से नाम गायब कैसे होता। 11 मार्च को पोलिंग प्रतिशत कम होने के पीछे मुख्य कारण वोटर लिस्ट की इस गड़बड़ी को बताया गया। भारी संख्या में जनरल कैटेगरी के लोग वोट डालने नहीं गए। इसके अलावा भी प्रशासनिक स्तर पर बहुत गड़बड़ी की गई जिसका खामियाजा योगी आदित्यनाथ को भुगतना पड़ा।

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