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घपले-घोटालो के शोर में पहली सालगिरह

देहरादून। एक साल का अरसा संकट,परेशानी और दबाव में हो तो सदी के सामान लगता है अगर ऐसा न हो तो पता भी नहीं चलता कि कब दूसरा साल आ गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ ऐसा ही हुआ। उनका पहला साल बिना किसी दबाव और तनाव के गुजरा। यह कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। उत्तराखंड के वह पहले मुख्यमंत्री हैं, जिनके पास प्रचंड बहुमत सरकार चलाने के लिए है। बैसाखी की जरूरत नहीं। सबसे ऊपर आला कमान का जबरदस्त भरोसा और साथ। यह सब कुछ पल्ले हो तो फिर सरकार चलाने का मजा ही कुछ और है। इसके बावजूद यह कहा जाए कि उन पर किसी किस्म की अंगुली नहीं उठी तो, सही नहीं होगा। नौकरशाहों को हद में रखने में वह सफल रहे, लेकिन कुछ का जलवा इस तरह छा चुका है कि कमल के फूल वाले भी इस पर नाखुश हैं। भ्रष्टाचारियों पर वह लगाम लगाने का बार-बार ऐलान करते रहे। इसके बावजूद कई मामलों में वह कुछ कर नहीं पाए या फिर न कर पाने को विवश दिखे। दरअसल, घपले और घोटालों के आरोपों में साल का दूसरा हिस्सा गुजर गया। फिर भी सबसे अच्छा उनके लिए यह रहा कि 12 महीने में एक भी ऐसा निजी आरोप उन पर नहीं लगा, जो दाग की तरह चिपके जो लगे वह प्रशासनिक क्षमताओं को लेकर हैं।

त्रिवेंद्र की तारीफ होनी चाहिए कि उन्होंने खुद को माफिया तत्वों से दूर रखा। दलालों और कमीशनखोरों को भी आसपास फटकने नहीं दिया। पिछली सरकारों में चतुर्थ तल, जिस पर मुख्यमंत्री सचिवालय है, में सिर्फ कमीशनखोर तथा नाना किस्म के दलाल दिखाई देते थे। वे इतने प्रभावी होते थे कि सरकारी कर्मचारियों को आदेश तक देते थे। घंटों वहां पसरे रहते थे। अपनी लैंड यूज,खनन, स्टोन क्रशर, रियल एस्टेट, बैंक गारंटी, जमीनों पर कब्जों से जुड़ी फाइलों को क्लीयर कराते नजर आते थे। साथ ही बड़ी कम्पनियों और पार्टियों को मुख्यमंत्री और उनके करीबी से मिलवा कर डील करवाते दिखाई देते थे। यह किसी भी उस शख्स से छिपा नहीं है, जो सत्ता पर शीर्ष नजर रखता है। इनसे मुताल्लिक फाइल या लोग अब दिखाई नहीं देते हैं। चतुर्थ तल ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय में भी घूमते नहीं दिखते ऐसे लोग।
पहाड़ से पलायन बहुत बड़ा मुद्दा है। त्रिवेंद्र ने पहाड़ की इस भीषण समस्या और दर्द को समझा। इसको थामने के लिए उन्होंने पलायन आयोग का गठन किया। उन पर पिछली बीजेपी सरकार में कृषि मंत्री रहते ढेंचा बीज घोटाला करने का आरोप लगा था। यह आरोप कभी पुष्ट तरीके से उन पर साबित नहीं हुआ। इसने उनको हमेशा बहुत परेशान जरूर किया। यह अलग बात है कि उनके मुख्यमंत्री रहते ही यह आरोप खारिज हुआ। साथ ही फाइल भी बंद कर दी गई। तबादलों को लेकर मुख्यमंत्री और चतुर्थ तल पर खूब आरोप लगते थे। नौकरशाह हो या आईपीएस और आईएफएस अफसर या फिर महकमों के अफसर, मलाईदार पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री को सीधे या फिर उनके दाएं-बाएं को पकड़ लेते थे। पिछली सरकारों में न जाने कितने भ्रष्ट होने के आरोपों से घिरे विवादित अफसरों ने बेहतरीन कुर्सियां पाई थीं। इसमें खूब पैसा भी चलता था। त्रिवेंद्र ने इस पर काफी सख्ती से रोक लगाई।
त्रिवेंद्र ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का माद्दा भी दिखाया, शुरू में। उन्होंने एनएच-74 घोटाले की जांच सीबीआई से कराने के लिए केंद्र सरकार को चिट्ठी तक लिखी थी। उनको झटका तब लगा जब उनकी इस मुहिम को केंद्र सरकार ने कोई मदद नहीं दी। उलटे केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्य को चिट्ठी भेज दी कि ऐसा करना राज्य के लिए उचित नहीं होगा। इससे राज्य में विकास कार्य प्रभावित होंगे। आल वेदर रोड और कंडी रोड पर काम किया। जम कर। तबादला एक्ट बना दिया। पहाड़ों में डॉक्टर्स को चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विधायकों पर भी वह अंकुश लगाने में काफी हद तक सफल रहे।
खास तौर पर चैम्पियन के तौर पर चर्चित प्रणव सिंह को उन्होंने काबू कर लिया है। आज प्रणव की दशा यह हो गई है कि वह इधर-कुआं, उधर खाई के दौर से गुजर रहे हैं। उनको हद में ले आए त्रिवेंद्र। अब वह शांत दिखते हैं। कांग्रेस में रहने के दौरान प्रणव पर कोई लगाम नहीं होती थी। त्रिवेंद्र देहरादून को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने में सफल रहे। पिछली कांग्रेस सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद यह नहीं कर पाई थी।
अब त्रिवेंद्र की खामियों पर भी बात हो। उनके राज में कामकाज की गति बहुत धीमी हो गई। ऐसा बीजेपी के लोग तक कहते हैं। उनको लगता है कि विकास कार्यों की रफ्तार ऐसी ही रही तो लोकसभा चुनावों में पार्टी को दिक्कत हो जाएगी। नौकरशाह हों या महकमे के अफसर, फाइलों को रफ्तार नहीं देते। उनको लगता है कि इससे ज्यादा तेज तरीके से काम तो कांग्रेस वाली हरीश रावत सरकार करती थी। बीजेपी के लोगों के भी काम नहीं हो रहे हैं। मंत्री परिषद में दो कुर्सी खाली है। विधायकों में इस बात की नाराजगी है कि सीट खाली होने के बावजूद विधायकों को मंत्री नहीं बनाया जा रहा है। यह भी आरोप लगते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और खुद से जुड़े करीबियों को वह सरकारी महकमों में किसी न किसी मलाईदार कुर्सी पर फिट कर रहे हैं। मंत्रियों में भी इस बात को लेकर नाखुशी झलकती रहती है कि मुख्यमंत्री उनके महकमों में गैर वाजिब दखल देते हैं।
वित्त मंत्री की तरह जिस तरफ खुद मुख्यमंत्री राज्य के बजट को लेकर लोगों की राय लेते रहे, उससे वित्त मंत्री प्रकाश पन्त खुश नहीं हैं, ऐसा कहा जाता है। कुछ नौकरशाहों को वह हद में नहीं रख पा रहे हैं। जो वे चाहते हैं, मुख्यमंत्री वही करते हैं। ऐसा माना जाता है। नौकरशाहों में कार्य विभाजन सही नहीं कर पा रहे हैं। कई अफसरों को कामकाज खूब दिया है जो उनके वश से बाहर दिखता है। दूसरी तरफ बहुत से अफसर काम न होने के कारण दफ्तर तक बामुश्किल आ रहे हैं। त्रिवेंद्र पर ऊंगली कुछ मामलों में बहुत उठ रही है। इनमें शराब महकमे में फर्जी बैंक गारंटी घोटाला सामने आने के बावजूद कुछ कठोर कदम न उठा पाना,सिडकुल में तमाम घोटाले सामने आने पर भी किसी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई न होना, हवाई यात्रा बहुत ज्यादा करना शामिल है। दस महीने में ही हवाई यात्रा पर निजी एयरलाइन्स का छह करोड़ का बिल आ जाने पर बहुत आपत्ति जताई जा रही है। सरकार की माली दशा और खराब हुई है। सातवां वेतन आयोग लागू होने से खजाने में जबरदस्त बोझ पड़ा। फिर जीएसटी और नोटबंदी ने राजस्व को बहुत चोट पहुंचाई। पैसे की किल्लत के कारण विकास योजनाओं को वह रफ्तार नहीं दे पाए।
एनएच-74 घोटाला भले उनके वक्त का नहीं है, और केंद्र सरकार से उनको मदद मिलती तो सीबीआई जांच होती, लेकिन उन पर आरोप हैं कि एक भी राजनेता पर इस मामले में कोई मुकदमा पूरे साल नहीं हो पाया। जो हैरतनाक है। आलोचकों का कहना है कि इतना बड़ा घोटाला हो गया और एक भी राजनेता या आला नौकरशाह इसमें जुड़ा न हो, कैसे मुमकिन है। घोटाले की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया गया, लेकिन उसने सिर्फ निचले स्तर के पीसीएस अफसर, कर्मचारी, पटवारी और किसानों को ही गिरफ्त में लिया। यह मन जा रहा है कि जो राजनेता घोटाले से जुड़े हैं, वे अब बीजेपी में हैं। नियुक्ति में भी उनकी सरकार पर ऊर्जा निगम और दिल्ली में अपर स्थानिक आयुक्त की कुर्सियों पर विवादित चेहरों को बिठाने के आरोप लगे। निगम में प्रबंध निदेशक बीसीके मिश्र और अपर स्थानिक आयुक्त की कुर्सी पर मृत्युंजय मिश्र को बिठाने के उनके फैसले की खूब आलोचना हुई।
सरकार ने सातवां वेतन आयोग लागू किया। जिससे उसके खजाने में जबरदस्त बोझ पड़ा। फिर जीएसटी और नोटबंदी ने राजस्व को बहुत चोट पहुंचाई।

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