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घोटालों का गढ़

देहरादून। शराब महकमा, जिसको आबकारी कहते हैं, महाघोटाले और साजिश का तगड़ा गढ़ बन चुका है। जाने क्या मजबूरी है सरकार की। सब कुछ जानते-बूझते भी घोटालेबाजों पर कार्रवाई करने की सरकार की हिम्मत नहीं हो रही है। अपने कर्मचारियों को भत्ते नहीं दे पा रही। विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं है। तय लक्ष्य को हासिल नहीं कर पा रही है। एक से एक घोटाले आए दिन सामने आ रहे हैं। फर्जी बैंक गारंटी हो या फिर बिना बैंक गारंटी दुकान आवंटित करने का मामला। यह बहुत बड़ा घोटाला है। एक के खिलाफ भी कार्रवाई अभी तक तो नहीं हुई है। ऐसा लग रहा, मानो यह आम बात है। साधारण। क्या जरुरत है किसी के खिलाफ कार्रवाई करने की। सरकार के खजाने को चूना लगता है तो लगे। बला से। निजी नुकसान नहीं होना चाहिए। विपक्ष क्या कर रहा है? कुछ नहीं। गाल तक नहीं बजा रहा। विधानसभा का बजट सत्र डांवाडोल कर सकती थी कांग्रेस। कुछ नहीं किया। बस थोड़ा हंगामा किया जो हमेशा होता है। इसमें नया कुछ नहीं था। फिर वापस देहरादून लौट आए उसके नेता। आबकारी के साजिशकर्ता और घोटालेबाज आखिर उनकी भी तो सेवा करते हैं। उनके चेले हैं। अब ऐसा कहा जा रहा है। ऐसे करेगी कांग्रेस सत्ता में वापसी? ऐसे बेनकाब करेगी वह बीजेपी सरकार को?

फर्जी बैंक गारंटी और बिना बैंक गारंटी के दुकान सौंप देने का मुद्दा अब जोर पकड़ चुका है। बिना नकद जमा किये ही दुकान सौंपने की भी अनगिनत मिसाल सामने आ चुकी हैं। यह जघन्य घोटाला है। अपराध है। फिर भी सरकार कान में उंगली डाले-आंखों में पट्टी के ऊपर काला चश्मा लगाए बैठी है। वीक एंड टाइम्स ने खुलासा किया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तक बात पहुंची तब जाकर अपर मुख्य सचिव (आबकारी) डॉ. रणवीर सिंह ने जांच बिठाई। उसकी रिपोर्ट भी दबाने की कोशिश की जा रही है। अभी यह सब चल ही रहा था। फिर ताजा खेल सामने आ गया जो दुकानें अधिभार का करोड़ों दबाकर बैठी थी। उनको फिर एक महीने और दुकान चलाने का हक दे दिया गया। अब यह उन पर है कि वे चलाना चाहते या नहीं। जिस साजिश का ताना-बाना बुना गया है। उसमें तो दुकान चलाना खजाने को भरने का बेहतरीन अवसर है। कोई नहीं छोड़ेगा मौका।

मिसाल देता हूं। अभी से। जो होने वाला है। दुकानों को अब दैनिक अधिभार के आधार पर सौंपा जाएगा। 30 अप्रैल तक। वैसे 31 मार्च को खत्म हो रहा था उनका कब्जा। रायवाला (हरिद्वार सीमा पर-देहरादून) की अंग्रेजी-देसी शराब की दुकानें रोजाना 12 लाख रूपये अभी दे रही हैं। जब अप्रैल शुरू होगा तब देखना कितने में छूटती हैं। इससे कहीं कम पैसे देने पड़ेंगे। दुकान स्वामी को। ऐसा कई दुकानों के मालिकों के साथ अफसरों के नापाक गठबंधन के कारण होना तय है। यह पक्के सूत्रों ने बताया। महकमे के ही एक अफसर ने बताया-ज्यादातर बड़ी दुकानों और बार में संयुक्त आयुक्त-जिला आबकारी अधिकारी स्तर के लोगों का शेयर है। यही वजह है कि उनसे अधिभार जमा कराने के लिए इंस्पेक्टर दबाव अधिक नहीं डाल पाए।
इतना ही काफी नहीं और सुनिए। सरकार ने दुकानों को मौजूदा मालिकों को ही सौंपने का संदिग्ध फैसला किया तो दुकानों ने भी मौजूदा दर पर ज्यादा से ज्यादा माल उठा कर जमाखोरी शुरू कर दी है। अप्रैल में इनको नई कीमत पर बेचा जाएगा। अधिभार में रोजाना लाखों बचायेंगे। फिर दारू में भी मोटा कमाएंगे। वाह री जीरो टॉलरेन्स सरकार। साजिश-घोटालों पर खामोश बैठी है। नई आबकारी नीति में एक और बड़ा खेल हो चुका है। लॉटरी की जगह ऑनलाइन बोली लगेगी अब। दुकानों की यानि,जिसकी अंटी में ज्यादा सफेद पैसे का दम, वह ले जाएगा दुकानें। हमारे पहाड़ के उन लडक़ों या कारोबारियों का दम फूल जाएगा। अब, जो शराब के धंधे में उतरे हुए हैं। जो कुछ लोगों का समूह बनाकर लॉटरी लगाते थे। खुद भी कमा रहे थे और पुलिस, पॉलिटिशियन, पत्रकारों का भी ख्याल रखते थे। सरकार ने अब दुकानों का ग्रुप बनाने का फैसला किया है यानि चार-पांच दुकानों की बोली एक साथ लगेगी। एक ही आदमी या कम्पनी को दी जाएगी ये दुकानें।
ग्रुप हासिल करना हंसी-खेल नहीं। इसके लिए सफेद में तकरीबन 20 करोड़ रूपये की बैंक गारंटी, एफडीआर और हैसियत प्रमाण पत्र जरूरी होंगे। राज्य के ज्यादातर की औकात से बाहर होगा यह सब कर पाना। सरकार की नई शराब नीति को डिजाइनर कहा जा रहा है। शराब सिंडीकेट को माफिक आने वाली। उसके लिए डिजाइन की गई है नीति। सिंडीकेट के लिए बड़ी से बड़ी राशि का बंदोबस्त करना बाएं हाथ का खेल होगा। मरहूम पोंटी चड्ढा ग्रुप के लोग तभी से सचिवालय-आबकारी दफ्तरों में लम्बी चमकदार लग्जरी गाडिय़ों में घूमते देखा जा सकता है। देहरादून का जिला आबकारी कार्यालय उनसे हर वक्त गुलजार दिखता है तो ऐसी है त्रिवेंद्र सरकार की नई आबकारी नीति। अपने बाहर-बरसों से बाहर सिंडीकेट का साम्राज्य फिर कायम होगा तो यह है उपलब्धि मौजूदा बीजेपी सरकार की। अब कहानी सामने आ रही है कि पूरा प्रदेश थोक में सिंडीकेट को सौंपने का रास्ता तेजी से तलाशा जा रहा। देहरादून के लिए सिंडीकेट ने 537 करोड़ एकमुश्त देने की पेशकश की है।
पिछले वित्तीय वर्ष में सरकार शराब से राजस्व बटोरने के लक्ष्य में फेल हो गई। यह बहुत बड़ी नाकामयाबी थी। सरकार की। ऐसा कभी हुआ नहीं। जब महकमे और सरकार में लोग माफियाओं के हाथों खिलौना बन जाएंगे। घोटालों को मिलकर अंजाम देंगे तो और यही होना था। पूरी साजिश के पीछे संयुक्तआयुक्त और जिला आबकारी अधिकारी को देखा जा रहा है। ताज्जुब है कि सरकार ने दोनों से अभी तक नहीं पूछा है कि साल भर दुकानें करोड़ों दबा के बैठी रही। तुम लोगों ने क्या किया? अब पता चला कि जिन लोगों ने साल भर बाद पैसे दे भी दिए तो उनसे ब्याज ही नहीं लिया गया। ब्याज घोटाला तैयार। ऐसा होता है कहीं? पहली बार देखा-सुना। इस सबके बावजूद आप ताज्जुब करेंगे। घोटालों से जुड़े अफसर सीना तान के चल रहे हैं। कहीं से परेशान नहीं दिखते न जी। कोई कंधे नहीं झुके हैं उनके..सैय्यां भये कोतवाल..।
घोटालों और साजिश के खुलासों से महकमे के अफसर बिलबिलाए हुए हैं। जब देहरादून के जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय से कारण पूछा गया तो वह तकरीबन बिफरते हुए बोले-मैं पत्रकारों के प्रति जवाबदेह नहीं हूं। वह शायद जानते नहीं कि जवाबदेह तो हर आम आदमी के प्रति हैं। फिर यह तो बीजेपी और त्रिवेंद्र सरकार की जीरो टॉलरेन्स वाली पारदर्शी सरकार है। सुन रहे हैं न मुख्यमंत्री जी! अपने अफसर का जवाब। ऐसे अफसर ही बीजेपी के मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को बर्बाद करने के लिए काफी हैं। फिर एक संयुक्त आयुक्त तो है ही। पूरे प्रदेश को तबाह करने के लिए। सरकार और संगठन के लाडले। शार्प शूटर..।
विपक्ष का काम होता है सरकार की खामियों को तलाशना। उस पर सवाल करना। कांग्रेस अपनी भूमिका में नाकाम हो चुकी है। सिडकुल में लुटेरों के खेल, पेयजल निगम में भ्रष्टाचार सामने आ जाने और आबकारी महकमे में इतना बड़ा घोटाला हो जाने के बावजूद उसने विधानसभा का बजट सत्र यूं ही गुजर जाने दिया। नेता विपक्षी दल डॉ.इंदिरा हृदयेश को देख के लगता है अब वह गुजरे जमाने की बिना आंच वाला चूल्हा हो चुकी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी लगता है सरकार के साथ गलबहियां कर रहे। एक भी घोटाले पर वह नहीं बोल रहे। बाकियों से क्या उम्मीद रखें। हो सकता है। जनक्रांति का संकेत हो, यह सब..।

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