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भाजपा पर भारी पड़ सकता है सपा-बसपा गठबंधन

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा सियासी बदलाव दिख रहा है। कभी एक-दूसरे का विरोध कर सत्ता में आने वाली सपा-बसपा अब भाजपा को चुनौती देने के लिए एकजुट हो गई हैं। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त देने के बाद अब दोनों पार्टियां 2019 में मोदी के विजय रथ को रोकने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के नहीं जीतने से पार्टी को झटका लगा है बावजूद मायावती ने साफ कर दिया है कि इससे संभावित गठबंधन पर कोई असर नहीं पडऩे वाला है। वहीं सपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी बसपा के अलावा अन्य छोटी पार्टियों को साथ लेकर भाजपा के लिए चक्रव्यूह रच रहे हैं। सपा और बसपा का अपना-अपना वोट बैंक है और यदि दोनों पार्टियों ने मिलकर आम चुनाव लड़ा तो भाजपा को 2014 की जीत दोहराना मुश्किल हो जाएगा।

सपा-बसपा की दोस्ती की बुनियाद एक दिन में नहीं रखी गई। इसकी बुनियाद उसी दिन रखी जा चुकी थी जब लोकसभा के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। सपा और बसपा को भाजपा ने बुरी तरह शिकस्त दी थी। लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 73 सीटें जीती थी जबकि विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल किया था। भाजपा की इस विजय ने दोनों के सामने अस्तित्व का सवाल खड़ा कर दिया। सबसे अधिक अस्तित्व का सवाल बसपा प्रमुख मायावती के सामने खड़ा हो गया। देश के अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह सपा-बसपा को भी यह समझ आने लगा कि यदि भाजपा को रोकना है तो दोस्ती करनी होगी। आखिरकार सपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने दोस्ती का ऐलान कर दिया। उपचुनाव में शामिल नहीं होने के बावजूद बसपा प्रमुख मायावती ने गोरखपुर व फूलपुर की दो लोकसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में सपा प्रत्याशी को समर्थन देने का ऐलान किया। इसका परिणाम आशा के अनुरूप मिला। सपा ने बसपा के समर्थन सेे न केवल फूलपुर की सीट जीत ली बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर की सीट भी अपनी झोली में डाल ली। इन सीटों पर मिली विजय ने यह भी साफ कर दिया कि भाजपा को रोकने के लिए बसपा का वोट बैंक सपा से समझौते को सही मानता है। इसके बाद राज्यसभा चुनाव में भी दोस्ती परवान चढ़ती दिखी। विधायकों की संख्या के आधार पर सपा और बसपा को राज्यसभा में दो सीटें मिल सकती थी। सपा ने एक सीट पर जया बच्चन और दूसरे पर बसपा ने भीमराव अंबेडकर को उम्मीदवार बनाया। वहीं भाजपा ने अपने 28 अतिरिक्त वोटों के बूते नौवीं सीट पर एक और उम्मीदवार को समर्थन दे दिया। इससे बसपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के पक्ष में खुद बसपा के एक विधायक ने क्रास वोटिंग की। इस हार के बाद यह कयास लगाया जाने लगा कि मायावती अब शायद ही सपा से गठबंधन करें लेकिन बसपा प्रमुख ने इन अटकलों पर विराम लगाते हुए कह दिया कि सपा-बसपा की दोस्ती से भाजपा बौखला गई है और वह दोनों को लड़ाना चाहती है लेकिन भाजपा यह समझ ले कि उसकी यह मंशा सफल नहीं होगी और दोनों पार्टियां मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेगी। हालांकि सीटों को लेकर अभी भी पेंच फंसा है। मायावती ने कैराना लोकसभा चुनाव से पहले यह कहकर नया दांव चल दिया है कि वह उपचुनाव में किसी भी दल का समर्थन नहीं करेंगी। माना जा रहा है इस बयान के जरिए मायावती सपा मुखिया पर लोकसभा में अधिक सीटें देने का दबाव बना रही हैं। बसपा प्रमुख इस मामले में पहले भी कह चुकी है कि गठबंधन सम्मानजनक सीटों के बंटवारे पर ही किया जा सकता है। जाहिर है अभी मामला पूरी तरह पटरी पर नहीं आया है लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस मामले में लचीला रवैया अपना कर बसपा को गठबंधन करने के लिए मनाने में कामयाब हो सकते हैंं। इसके अलावा इस गठबंधन में एक समस्या और भी है। लोकसभा और विधानसभा, दोनों जगहों पर सीटों के लिहाज से सपा बसपा से बड़ी पार्टी है। ऐसे में सपा बड़ा भाई बनकर रहना चाहेगी और मायावती किसी भी गठबंधन में जूनियर पार्टनर बनकर रहें, यह बेहद मुश्किल है। इतिहास गवाह है कि सपा के साथ 1990 के दशक में और बाद में भाजपा के साथ जैसे ही मायावती ड्राइविंग सीट से हटीं गठबंधन टूट गया था। फिलहाल दोनों की दोस्ती और गठबंधन को अमलीजामा पहनाने की तैयारी चल रही है। यह भी सच है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं यानी केंद्र में सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें चाहिए उसकी करीब एक तिहाई। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 73 सीटें जीती थीं, तभी उसका मिशन 272 प्लस कामयाब हो पाया था। उन चुनावों में बसपा का खाता भी नहीं खुला था। कांग्रेस रायबरेली और अमेठी तक सीमित हो गई थी जबकि सपा सिर्फ अपने परिवार की पांच सीटें जीत सकी थी लेकिन ये नतीजे तब हैं जब सपा, बसपा और कांग्रेस भाजपा के खिलाफ अलग-अलग मैदान में थे। गोरखपुर और फूलपुर में हुए प्रयोग के नतीजों ने सपा-बसपा को उम्मीद से भर दिया है।
ऐसा ही एक प्रयास 1993 में राममंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा लहर को रोकने के लिए कांशीराम और मुलायम सिंह ने किया था। इसका असर था कि भाजपा सूबे की सत्ता में नहीं आ सकी थी। अब दोबारा फिर सपा-बसपा गठबंधन को तैयार हैं और इस बार निशाने पर राज्य की नहीं बल्कि केंद्र की मोदी सरकार है। सपा-बसपा के साथ आने से भाजपा की राह 2019 में काफी मुश्किल हो जाएगी। सूबे में दोनों दलों का मजबूत वोट बैंक है। सूबे में 12 फीसदी यादव, 22 फीसदी दलित और 18 फीसदी मुस्लिम हैं। इन तीनों वर्गों पर सपा-बसपा की मजबूत पकड़ है और इन्हें मिलाकर करीब 52 फीसदी होता है यानी प्रदेश के आधे वोटर सीधे-सीधे सपा और बसपा के प्रभाव क्षेत्र वाले हैं। इनके अलावा बाकी ओबीसी समुदाय का वोट भी इन दोनों दलों के खाते में जा सकता है। ऐसे में भाजपा को सपा-बसपा का यह गठबंधन भारी पड़ सकता है।

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