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चिंताजनक है संसद का न चलना

हाल में वित्त विधेयक आनन-फानन में पारित कर दिया गया। ऐसे अनेक विधेयक हैं, जो चर्चा के बिना पारित हो गये। यह जान लीजिए कि संसद की कार्यवाही हमारे आपके द्वारा जमा किये टैक्स से चलती है। इसके संचालन में जो लंबा-चौड़ा खर्च आता है, उसकी पूर्ति हमारे आपके टैक्स से की जाती है। संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर औसतन ढाई लाख रुपये खर्च आता है और कार्यवाही न चलने की स्थिति में यह खर्च बचता नहीं है, बल्कि सारी राशि पानी में चली जाती है। इस सत्र के 24 में से अधिकांश दिन हंगामे की भेंट चढ़ चुके हैं और लगता नहीं बाकी बचे दिनों में कुछ विधायी काम हो पायेगा। आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा आपका कितना पैसा अब तक पानी में जा चुका है।

संसदलोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है। संविधान निर्माताओं ने ऐसी परिकल्पना की थी कि संसद के माध्यम से कानून बनेंगे और उनके द्वारा जनता की अपेक्षाओं को पूरा किया जायेगा। सदन सार्थक चर्चा और जनता की समस्याओं के निराकरण का मंच भी है। संसद में गर्मागर्मी होना एक सामान्य प्रक्रिया है। विभिन्न विचारधाराओं और राजनीतिक दलों के नेताओं का किसी मुद्दे पर नजरिया अलग हो सकता है। इसकी वजह से थोड़े समय के लिए संसद की कार्यवाही बाधित हो सकती है। यह तो समझ में आता है लेकिन पिछले कुछ समय से संसद के दोनों सदनों – लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही हंगामे के कारण ठप पड़ी है। यह हम सबके लिए चिंता का विषय है. देश की सबसे बड़ी पंचायत में देशहित से जुड़े मुद्दों पर कोई चर्चा ही नहीं हो पा रही है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। पिछले दो सत्रों में संसद में काफी कम कामकाज हो पाया है। मॉनसून सत्र के पहले हिस्से में लोकसभा में जरूर कुछ काम हुआ लेकिन, इस दौरान राज्यसभा में महज 8.5 घंटे काम हो पाया। विधेयकों के लंबे समय तक लटके रहने से देश की निर्णय व्यवस्था प्रभावित होती है। कई विधेयक तो कई-कई सत्रों तक संसद में लटके रहते हैं।
अक्सर देखने में आया है कि व्यवधान के बाद जब कार्यवाही शुरू होती है, तो विधेयकों को समयाभाव के कारण बिना चर्चा के जस के तस पारित कर दिया जाता है। यह और चिंताजनक बात है। विधेयक पर चर्चा हो, उन पर कोई आपत्तियां हों, तो उन्हें दर्ज किया जाये। हाल में वित्त विधेयक आनन-फानन में पारित कर दिया गया। ऐसे अनेक विधेयक हैं, जो चर्चा के बिना पारित हो गये। यह जान लीजिए कि संसद की कार्यवाही हमारे आपके द्वारा जमा किये टैक्स से चलती है। इसके संचालन में जो लंबा-चौड़ा खर्च आता है, उसकी पूर्ति हमारे आपके टैक्स से की जाती है। संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर औसतन ढाई लाख रुपये खर्च आता है और कार्यवाही न चलने की स्थिति में यह खर्च बचता नहीं है, बल्कि सारी राशि पानी में चली जाती है। इस सत्र के 24 में से अधिकांश दिन हंगामे की भेंट चढ़ चुके हैं और लगता नहीं बाकी बचे दिनों में कुछ विधायी काम हो पायेगा। आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा आपका कितना पैसा अब तक पानी में जा चुका है।
संसद में कुछ विधेयक तो ऐसे लंबित हैं, जो लोगों को सीधे प्रभावित करते हैं। राज्यसभा में कम से कम 10 ऐसे विधेयक लंबित हैं जिन्हें लोकसभा पारित कर चुकी है। अगर राज्यसभा से उन्हें मंजूरी मिल जाये तो ये विधेयक कानून बन जायेंगे और इनका फायदा जनता को मिलेगा। ऐसा ही ग्रेच्युटी से जुड़ा एक विधेयक राज्यसभा में अटका हुआ था। यह विधेयक किसी तरह विपक्ष के सहयोग से पारित हुआ। यह विधेयक हर नौकरीपेशा शख्स से जुड़ा हुआ है। इसके तहत 20 लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी को करमुक्त कर दिया गया है।
इस विधेयक के जैसे-तैसे पारित होने के तुरंत बाद विपक्षी दलों के सदस्य सभापति के आसन के समीप आकर नारे लगाने लगे और फिर सारा कामकाज फिर ठप पड़ गया। राज्यसभा में एक और महत्वपूर्ण बिल मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक भी पारित होने के लिए पड़ा है। ये तो चंद मिसाल भर हैं। सांसद प्रश्नकाल के माध्यम से जनहित के मुद्दों को उठाते हैं और सरकार को जवाब देना होता है. यह सारी प्रक्रिया ठप पड़ी है।
संसद की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेवारी जितनी सरकार की है, उतनी ही विपक्ष की भी है. दूसरी ओर विपक्ष को साथ लाने और उसकी आपत्तियों पर गौर करने का दायित्व सरकार का है. विरोध करने के बहुत से तरीके हो सकते हैं। लेकिन, केवल विरोध के लिए संसद को बाधित करना उचित नहीं है. दुर्भाग्य यह है कि अब यह मान लिया गया है किसी बात को रखने का सबसे अच्छा और प्रभावी तरीका हंगामा करना है। जब से संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू हुआ है, संसद भवन को पार्टियों ने प्रचार का अखाड़ा मान लिया है।
संसद के बाहर न्यूज चैनलों की भीड़ से सभी पार्टियों को अपने प्रचार का मौका मिल जाता है। हाल में एक पुरुष सांसद अपने राज्य को विशेष दर्जे की मांग को लेकर महिला का वेश धारण कर संसद भवन परिसर पहुंच गये। यह स्वस्थ परंपरा नहीं है और लोकतंत्र के लिए कतई मुफीद नहीं है। एक दौर था जब संसद में विभिन्न विषयों पर लंबी गंभीर बहसें होती थीं. लेकिन, अब उनका अभाव साफ नजर आता है। जाहिर है कि पक्ष हो या विपक्ष किसी की भी रुचि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने में नहीं है। विधानसभाओं की स्थिति तो और खराब है। विधानसभाओं के सत्र लगातार छोटे होते जा रहे हैं। देखने में आया है कि अनेक विधायक बिना तैयारी के कार्यवाही में हिस्सा लेते हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विधेयक बिना किसी बहस और हस्तक्षेप के विधानसभाओं से पारित हो जाते हैं। एक और चिंतनीय विषय है कि सदन में अमर्यादित आचरण और शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विधानसभा में विधायकों में मारपीट तक की घटनाएं घटित होने लगी हैं। उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू सदन की कार्यवाही को लेकर बेहद गंभीर हैं।
राज्यसभा में लगातार कामकाज न होने के कारण हाल में, उन्होंने सांसदों का भोज स्थगित कर अपनी अप्रसन्नता जाहिर की थी। इसके पहले एक अवसर पर उपराष्ट्रपति नायडू ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि संसद और विधानसभाओं में चंद सदस्यों द्वारा कार्यवाही बाधित करने के कारण जनता की नजरों में विधायिका का सम्मान कम हुआ है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद की अच्छी बहस सरकार को हिला सकती है। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये, जिनमें राज्य विधायिकाओं की रैंकिंग तय करना, विधायिका के सदस्यों के आचरण और योगदान सुनिश्चित करने के मानक तय करना, विपक्षी दलों के सदस्यों का कोरम तय करना, कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने वाले सदस्यों की पहचान करना, सदस्यों का स्वत: निलंबन, स्थायी समितियों का कार्यकाल बढ़ाना, विधायिका के सदस्यों का जनता के साथ मेलजोल बढ़ाना और कार्यवाही के नियमों का पालन सुनिश्चित करना शामिल है। ये सभी सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हर सत्र से पहले सरकार और विभिन्न दलों के बीच संसदीय मर्यादा के पालन पर सहमति बनती है। लेकिन होता इसके उलट है. यह बैठक तो जैसे एक तरह की रस्म बन कर रह गयी है, उसका पालन कोई पक्ष नहीं करता है. लगातार यह हो रहा है कि पूरा का पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया और कोई विधायी कार्य नहीं हो पाया। सदनों की कार्यवाही सुचारु रूप से चले और विधायी कार्य हों, यह स्वस्थ लोकतंत्र और हम सबके लिए जरूरी है।

राज्यसभा में कम से कम 10 ऐसे विधेयक लंबित हैं जिन्हें लोकसभा पारित कर चुकी है। अगर राज्यसभा से उन्हें मंजूरी मिल जाये तो ये विधेयक कानून बन जायेंगे और इनका फायदा जनता को मिलेगा।

सद लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है। संविधान निर्माताओं ने ऐसी परिकल्पना की थी कि संसद के माध्यम से कानून बनेंगे और उनके द्वारा जनता की अपेक्षाओं को पूरा किया जायेगा। सदन सार्थक चर्चा और जनता की समस्याओं के निराकरण का मंच भी है। संसद में गर्मागर्मी होना एक सामान्य प्रक्रिया है। विभिन्न विचारधाराओं और राजनीतिक दलों के नेताओं का किसी मुद्दे पर नजरिया अलग हो सकता है। इसकी वजह से थोड़े समय के लिए संसद की कार्यवाही बाधित हो सकती है। यह तो समझ में आता है लेकिन पिछले कुछ समय से संसद के दोनों सदनों – लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही हंगामे के कारण ठप पड़ी है। यह हम सबके लिए चिंता का विषय है. देश की सबसे बड़ी पंचायत में देशहित से जुड़े मुद्दों पर कोई चर्चा ही नहीं हो पा रही है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। पिछले दो सत्रों में संसद में काफी कम कामकाज हो पाया है। मॉनसून सत्र के पहले हिस्से में लोकसभा में जरूर कुछ काम हुआ लेकिन, इस दौरान राज्यसभा में महज 8.5 घंटे काम हो पाया। विधेयकों के लंबे समय तक लटके रहने से देश की निर्णय व्यवस्था प्रभावित होती है। कई विधेयक तो कई-कई सत्रों तक संसद में लटके रहते हैं।
अक्सर देखने में आया है कि व्यवधान के बाद जब कार्यवाही शुरू होती है, तो विधेयकों को समयाभाव के कारण बिना चर्चा के जस के तस पारित कर दिया जाता है। यह और चिंताजनक बात है। विधेयक पर चर्चा हो, उन पर कोई आपत्तियां हों, तो उन्हें दर्ज किया जाये। हाल में वित्त विधेयक आनन-फानन में पारित कर दिया गया। ऐसे अनेक विधेयक हैं, जो चर्चा के बिना पारित हो गये। यह जान लीजिए कि संसद की कार्यवाही हमारे आपके द्वारा जमा किये टैक्स से चलती है। इसके संचालन में जो लंबा-चौड़ा खर्च आता है, उसकी पूर्ति हमारे आपके टैक्स से की जाती है। संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर औसतन ढाई लाख रुपये खर्च आता है और कार्यवाही न चलने की स्थिति में यह खर्च बचता नहीं है, बल्कि सारी राशि पानी में चली जाती है। इस सत्र के 24 में से अधिकांश दिन हंगामे की भेंट चढ़ चुके हैं और लगता नहीं बाकी बचे दिनों में कुछ विधायी काम हो पायेगा। आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा आपका कितना पैसा अब तक पानी में जा चुका है।
संसद में कुछ विधेयक तो ऐसे लंबित हैं, जो लोगों को सीधे प्रभावित करते हैं। राज्यसभा में कम से कम 10 ऐसे विधेयक लंबित हैं जिन्हें लोकसभा पारित कर चुकी है। अगर राज्यसभा से उन्हें मंजूरी मिल जाये तो ये विधेयक कानून बन जायेंगे और इनका फायदा जनता को मिलेगा। ऐसा ही ग्रेच्युटी से जुड़ा एक विधेयक राज्यसभा में अटका हुआ था। यह विधेयक किसी तरह विपक्ष के सहयोग से पारित हुआ। यह विधेयक हर नौकरीपेशा शख्स से जुड़ा हुआ है। इसके तहत 20 लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी को करमुक्त कर दिया गया है।
इस विधेयक के जैसे-तैसे पारित होने के तुरंत बाद विपक्षी दलों के सदस्य सभापति के आसन के समीप आकर नारे लगाने लगे और फिर सारा कामकाज फिर ठप पड़ गया। राज्यसभा में एक और महत्वपूर्ण बिल मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक भी पारित होने के लिए पड़ा है। ये तो चंद मिसाल भर हैं। सांसद प्रश्नकाल के माध्यम से जनहित के मुद्दों को उठाते हैं और सरकार को जवाब देना होता है. यह सारी प्रक्रिया ठप पड़ी है।
संसद की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेवारी जितनी सरकार की है, उतनी ही विपक्ष की भी है. दूसरी ओर विपक्ष को साथ लाने और उसकी आपत्तियों पर गौर करने का दायित्व सरकार का है. विरोध करने के बहुत से तरीके हो सकते हैं। लेकिन, केवल विरोध के लिए संसद को बाधित करना उचित नहीं है. दुर्भाग्य यह है कि अब यह मान लिया गया है किसी बात को रखने का सबसे अच्छा और प्रभावी तरीका हंगामा करना है। जब से संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू हुआ है, संसद भवन को पार्टियों ने प्रचार का अखाड़ा मान लिया है।
संसद के बाहर न्यूज चैनलों की भीड़ से सभी पार्टियों को अपने प्रचार का मौका मिल जाता है। हाल में एक पुरुष सांसद अपने राज्य को विशेष दर्जे की मांग को लेकर महिला का वेश धारण कर संसद भवन परिसर पहुंच गये। यह स्वस्थ परंपरा नहीं है और लोकतंत्र के लिए कतई मुफीद नहीं है। एक दौर था जब संसद में विभिन्न विषयों पर लंबी गंभीर बहसें होती थीं. लेकिन, अब उनका अभाव साफ नजर आता है। जाहिर है कि पक्ष हो या विपक्ष किसी की भी रुचि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने में नहीं है। विधानसभाओं की स्थिति तो और खराब है। विधानसभाओं के सत्र लगातार छोटे होते जा रहे हैं। देखने में आया है कि अनेक विधायक बिना तैयारी के कार्यवाही में हिस्सा लेते हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विधेयक बिना किसी बहस और हस्तक्षेप के विधानसभाओं से पारित हो जाते हैं। एक और चिंतनीय विषय है कि सदन में अमर्यादित आचरण और शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विधानसभा में विधायकों में मारपीट तक की घटनाएं घटित होने लगी हैं। उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू सदन की कार्यवाही को लेकर बेहद गंभीर हैं।
राज्यसभा में लगातार कामकाज न होने के कारण हाल में, उन्होंने सांसदों का भोज स्थगित कर अपनी अप्रसन्नता जाहिर की थी। इसके पहले एक अवसर पर उपराष्ट्रपति नायडू ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि संसद और विधानसभाओं में चंद सदस्यों द्वारा कार्यवाही बाधित करने के कारण जनता की नजरों में विधायिका का सम्मान कम हुआ है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद की अच्छी बहस सरकार को हिला सकती है। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये, जिनमें राज्य विधायिकाओं की रैंकिंग तय करना, विधायिका के सदस्यों के आचरण और योगदान सुनिश्चित करने के मानक तय करना, विपक्षी दलों के सदस्यों का कोरम तय करना, कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने वाले सदस्यों की पहचान करना, सदस्यों का स्वत: निलंबन, स्थायी समितियों का कार्यकाल बढ़ाना, विधायिका के सदस्यों का जनता के साथ मेलजोल बढ़ाना और कार्यवाही के नियमों का पालन सुनिश्चित करना शामिल है। ये सभी सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हर सत्र से पहले सरकार और विभिन्न दलों के बीच संसदीय मर्यादा के पालन पर सहमति बनती है। लेकिन होता इसके उलट है. यह बैठक तो जैसे एक तरह की रस्म बन कर रह गयी है, उसका पालन कोई पक्ष नहीं करता है. लगातार यह हो रहा है कि पूरा का पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया और कोई विधायी कार्य नहीं हो पाया। सदनों की कार्यवाही सुचारु रूप से चले और विधायी कार्य हों, यह स्वस्थ लोकतंत्र और हम सबके लिए जरूरी है।

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