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चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और सियासत

सियासी दलों को समझना चाहिए कि आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके खिलाफ इस तरह का मोर्चा खोलना लोकतंत्र और इसकी प्रक्रिया को कमजोर करेगा। ईवीएम को हैक करने की बात आज तक विपक्ष सिद्ध नहीं कर सका है। आयोग को भी गोपनीय सूचना के लीक होने पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा। इस मामले को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। जहां तक अमित मालवीय के खिलाफ आयोग द्वारा कार्रवाई का सवाल है तो वह संभव नहीं दिख रहा है। ऐसा कोई चुनाव कानून नहीं है, जिसके आधार पर चुनाव की तारीख लीक होने पर कार्रवाई की जा सके।
चुनाव आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार कर्नाटक में होने वाले चुनाव की तारीखों के लीक होने का मामला उजागर हुआ है। तिथियों के आधिकारिक ऐलान से कुछ घंटे पहले भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने इन तिथियों को ट्वीट कर दिया था। इस ट्वीट में कर्नाटक में मतदान की तारीख वही निकली, जिसकी घोषणा आयोग ने कई घंटे बाद की। इसके बाद कांग्रेस समेत अन्य सियासी दलों ने आयोग को निशाने पर ले लिया है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। अहम सवाल यह है कि आखिर आधिकारिक घोषणा होने से पहले भाजपा को यह गोपनीय जानकारी मिली कैसे? क्या आयोग के किसी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत के बिना इतनी गोपनीय जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है? क्या ऐसी घटनाएं आयोग की साख को गहरा नुकसान नहीं पहुंचाएंगी? क्या सियासी दलों की मांग पर आयोग कोई ठोस कदम उठाएगा? क्या आयोग की विश्वसनीयता की रक्षा के लिए इसके अधिकारों को बढ़ाने पर सरकार गौर करेगी? क्या केवल सियासी लाभ के लिए आयोग को निशाना बनाना उचित है?
पिछले कई सालों से चुनाव आयोग विपक्ष के निशाने पर है। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद विपक्ष ने ईवीएम मशीन को लेकर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। सबसे पहले यह सवाल बसपा प्रमुख मायावती ने उठाया। इसके बाद से सियासी दलों ने इस मामले को खूब तूल दिया। यही नहीं विपक्ष ने चुनाव आयोग से बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। यह मांग आज भी जारी है। हालांकि इस मामले पर तब आयोग ने सख्त तेवर अपनाते हुए विपक्ष को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी थी लेकिन किसी ने चुनौती को स्वीकार नहीं किया। अब तो हर चुनाव के पहले और बाद में चुनाव आयोग के खिलाफ सियासी दलों द्वारा मोर्चा खोलना आम होता जा रहा है। इस बार कर्नाटक चुनाव की तिथियों के लीक होने के मामले में चुनाव आयोग फंसता दिख रहा है। हालांकि ट्वीट की गई मतदान की तिथि ही सही है लेकिन मतगणना की तिथि लीक तारीख से अलग है। यही बात आयोग के पक्ष में जाती है। इस मामले में अमित मालवीय ने भी अपनी सफाई दे दी है और कहा है कि यह तिथियां उन्हें एक चैनल के जरिए मिली थीं। बावजूद इसके सियासी दलों को इसने भाजपा के साथ आयोग को भी घेरने का मौका दे दिया है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और भाजपा से उसका मुकाबला है। जाहिर है कांग्रेस इस मुद्दे को खूब उछालेगी। कांग्रेस के एक नेता ने तो तिथियों के लीक होने के मामले में उसे सुपर इलेक्शन कमीशन तक करार दे दिया। बावजूद इसके सियासी दलों को समझना चाहिए कि आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके खिलाफ इस तरह का मोर्चा खोलना लोकतंत्र और इसकी प्रक्रिया को कमजोर करेगा। ईवीएम को हैक करने की बात आज तक विपक्ष सिद्ध नहीं कर सका है। आयोग को भी गोपनीय सूचना के लीक होने पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा। इस मामले को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। जहां तक अमित मालवीय के खिलाफ आयोग द्वारा कार्रवाई का सवाल है तो वह संभव नहीं दिख रहा है। ऐसा कोई चुनाव कानून नहीं है, जिसके आधार पर चुनाव की तारीख लीक होने पर कार्रवाई की जा सके। हालांकि आयोग अपने अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई जरूर कर सकता है, जिस पर सूचना को गोपनीय रखने की जिम्मेदारी थी। कुल मिलाकर सियासी दलों को अपने लाभ के लिए कम से कम संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाने से गुरेज करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होगी।

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