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हंगाम हैं क्यूं बरपा…

  • निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए  सियासी दल कर  रहे है  खेल
  • संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाने  की साजिश

संजय शर्मा

देश की सियासत में गिरावट का दौर जारी है। अपनी-अपनी रोटी सेंकने के लिए राजनीतिक दल अब संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को भी चोट पहुंचाने से बाज नहीं आ रहे हैं। एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सियासी दलों ने सडक़ से संसद तक हंगामा काटा। कांग्रेस ने अन्य पार्टियों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक लाने की कोशिश की। चुनाव आयोग को भी निशाने पर लिया गया। ईवीएम को लेकर चुनाव में धांधली तक के आरोप चुनाव आयोग पर लगाए गए। यही नहीं भाजपा के मीडिया सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने आयोग के ऐलान से पहले कर्नाटक चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। इससे आयोग की गोपनीयता पर सवाल उठे। कुल मिलाकर सियासी दल संविधान द्वारा गठित इन संवैधानिक संस्थाओं पर चोट पहुंचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

पिछले कई वर्षों से सियासी दल संवैधानिक संस्थाओं पर निशाना साध रहे हैं। यह प्रवृत्ति केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद काफी बढ़ गई है। लोकसभा और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में शिकस्त खाने के बाद सबसे पहले ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग पर आरोप लगाए गए। बसपा प्रमुख मायावती ने चुनाव परिणामों के तत्काल बाद कहा था कि ईवीएम में धांधली की गई है। लिहाजा बसपा का वोट भी भाजपा के खाते में चला गया। बसपा प्रमुख ने इसकी जांच और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी आयोग से की। इसके बाद तो जैसे आयोग पर आरोपों की बरसात होने लगी। आप नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में बाकायदा ईवीएम का डैमो दिखाया। इस डैमो के जरिए यह सिद्ध किया गया कि ईवीएम को आसानी से हैक कर वोटों में धांधली की जा सकती है। बाद में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। मामला आयोग तक पहुंचा और आयोग को अपनी इज्जत बचाने के लिए सियासी दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती देनी पड़ी। हालांकि किसी दल ने भी आयोग की इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया। लेकिन यह मुद्दा हर चुनाव के बाद अपेक्षित परिणाम नहीं आने के बाद सियासी दल उठाते रहे हैं। हालांकि अपने पक्ष में रिजल्ट आने के बाद ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा इन दलों ने शायद ही कभी उठाया हो। इसी तरह कर्नाटक चुनाव की तिथियों का ऐलान होने के पहले भाजपा के मीडिया सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने इसकी तिथियां घोषित कर दीं। इसके 12 घंटे बाद चुनाव आयोग ने अपनी तिथियां घोषित कीं। इसमें मतदान की तिथि वही निकली, जिसकी घोषणा अमित मालवीय ने अपने ट्विटर अकाउंट में की थी। हालांकि मतगणना की तिथि बताई तिथि से मेल नहीं खाती थी। बावजूद कांग्रेस ने भाजपा और आयोग को निशाने पर ले लिया। कांग्रेस ने भाजपा को सुपर इलेक्शन कमीशन करार दिया और साथ ही आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। साफ है सियासी दल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए चुनाव आयोग को निशाने पर ले रहे हैं। इसके पीछे उनकी मंशा केंद्र की मोदी सरकार को बदनाम करना भी है। ऐसे आरोप लगाने में क्षेत्रीय दल काफी आगे हैं। दरअसल, भाजपा के बढ़ते प्रभाव और राज्यों में लगातार हो रही उसकी जीत से इन क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। ऐसी स्थिति में वे ऐसे आरोप लगाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में सियासी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाए। एससी-एसटी ऐक्ट में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का विरोध किया गया जिसमें कहा गया था कि अब बिना जांच के इस ऐक्ट के तरह आरोपी की सीधी गिरफ्तारी नहीं हो सकेगी। सात दिनों के भीतर डीएसपी स्तर का एक अधिकारी इस केस की जांच कर अपनी रिपोर्ट पेश करेगा। इसके बाद ही संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने या न करने का निर्णय लिया जाएगा। लेकिन इस फैसले को लेकर सियासी दलों और दलित संगठनों ने अपनी रोटियां सेंकनी शुरू कर दी। दलों ने दलित संगठनों के साथ मिलकर भारत बंद का आह्वïान किया। इस दौरान राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए। यूपी के मेरठ में आंदोलनकारियों ने पुलिस चौकी फूंक दी। हापुड़ में एक दुकानदार को गोली मार दी। मुजफ्फरनगर, आगरा और वाराणसी समेत कई स्थानों पर आगजनी की घटनाएं घटी। कई यात्री बसों को आग के हवाले किया गया। पूरे देश को बंधक बनाने की कोशिश की गई। यही नहीं आंदोलनकारियों ने एंबुलेंस से जा रहे मरीजों और उनके परिजनों से मारपीट की। महिलाओं से छेड़छाड़ की गई। सियासी दलों ने दलित समुदाय को यह कहकर भी गुमराह किया था कि सरकार एससी-एसटी को मिलने वाला आरक्षण खत्म करने जा रही है। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक भारत बंद आंदोलन में हिंसक प्रदर्शन सुनियोजित था और इसके लिए बाकायदा लोगों को प्रशिक्षण दिया गया था। यह मामला संसद तक पहुंचा। कांग्रेस ने अन्य दलों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाने तक का प्रस्ताव पेश करने की कोशिश की। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कह दिया कि वह एसटी-एसटी ऐक्ट के खिलाफ नहीं है। उसने बस इसकी व्याख्या की है। उसकी चिंता निर्दोष को फंसाने से बचाने की है। बहरहाल सियासी हितों की पूर्ति के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर चोट करने की यह प्रवृत्ति बेहद घातक है। जनता को सत्ता पक्ष के खिलाफ करने और चुनाव जीतने के लिए इन संस्थाओं को अपना साधन बनाना किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है। यदि इसी तरह की सियासत जारी रही तो भारतीय लोकतंत्र गर्त में चला जाएगा। इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकना होगा। इसके लिए खुद सियासी दलों को आगे आना होगा। वैसे भी देश की जनता जागरूक है। वह सियासी दलों की चालों को बखूबी समझने लगी है। लिहाजा सियासी दलों को इस तरह के आत्मघाती कदम उठाने से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

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